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ओजस्विनी व्यूज

शब्दों के अपने खेल हैं!

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एक मस्जिद में एक सुबह एक आदमी प्रविष्ट हुआ। उसने अपने बहुत कीमती जूते, जिन पर सोने की कारीगरी की गई थी, मस्जिद के बाहर छोड़ दिए। लौट कर पीछे भी नहीं देखा और अंदर चला गया। मस्जिद के द्वार पर खड़े लोग चकित रह गए। उन्होंने कहा, कितना अदभुत आदमी है, इतने कीमती जूतों को मस्जिद के बाहर छोड़ गया, जिनकी चोरी भी हो सकती है। बड़ा धार्मिक, बड़ा विश्वासी आदमी मालूम होता है। इसके मन में किसी के प्रति चोर होने का भाव ही नहीं उठता है मालूम होता है।
उसके ही पीछे एक दूसरा आदमी आया, जिसके फटे-पुराने जूते थे। उसने जूते उतारे, दोनों को जोड़ा, बगल में दबाया और मस्जिद के भीतर प्रविष्ट हुआ। वे सारे लोग कहने लगे,बड़े हैरानी की बात है, इस पागल को यह नहीं दिखाई पड़ता,इतने कीमती जूते यहां रखे हुए हैं, और यह अपने फटे-पुराने जूतों को दबा कर अंदर ले गया है।
फिर वे दोनों आदमी बाहर निकले। कीमती जूतों वाला आदमी बाहर आया, तो उन लोगों ने पूछा, क्या हम पूछ सकते हैं आप इतने कीमती जूते बाहर क्यों छोड़ गए? उस आदमी ने कहा, इसका एक कारण है। मैंने जूते इसलिए बाहर छोड़े, ताकि अगर कोई उनकी चोरी करना चाहे, तो कम से कम प्रार्थना करते समय मैं उसे बाधा तो न दे सकूं। और तो बाधा देता हूं चैबीस घंटे, लेकिन प्रार्थना के समय में तो कम से कम कोई अगर चोरी करना चाहे तो मैं बाधा न बनूं इसलिए। और इसलिए भी कि अगर किसी का चोरी करने का मन हो इन जूतों पर और वह अपने चोरी करने की कामना पर विजय पा ले, तो इसमें भी मैं उसके धार्मिक, इस कृत्य में भी सहयोगी बन सकूं।
किसी के जूते चुराने का टेंप्टेशन हुआ और फिर उसने विजय पा ली, तो उसने एक महान कार्य किया साधना का, मैं उसका साथी हो सकूं। इसलिए भी जूते मैं बाहर छोड़ गया। वे सारे लोग चकित, आश्चर्य से, आदर से भरे हुए देखते रहे।
वह आदमी गया था कि फटे-पुराने जूते वाला आदमी बाहर आया। उन्होंने पूछा कि मित्रा, क्या हम आपसे पूछ सकते हैं कि इतने कीमती जूते बाहर थे और आप अपने जूते मस्जिद के भीतर ले गए। उसने कहा, दो कारणों से भाई। एक तो इस कारण से कि फटे-पुराने जूते मेरे पास होते हैं तो मुझे अपनी दरिद्रता, अपनी ह्युमिलिटी, अपनी विनम्रता का बोध रहता है कि मैं एक साधारण, अत्यंत दरिद्र, दीन आदमी हूँ। प्रार्थना करते समय जिसके मन में दीनता का भाव नहीं,उसकी प्रार्थना तो कभी सफल नहीं हो सकती। इसलिए मैं जूते भीतर ले गया था। और इसलिए भी कि कहीं मेरे जूते बाहर पड़े रहे और किसी का मन चोरी करने का हो जाए, तो उसके मन को पाप में ले जाने में मैं भी सहयोगी हुआ, मैंने भी पाप किया। इसलिए मैं जूते बाहर नहीं छोड़ गया था।
उसके अनुयायी भी मिल गए। वे उसकी धन्यता की प्रशंसा करने लगे कि यह आदमी भी बहुत अदभुत है। वह आदमी भी चला गया। तब एक बूढ़ा वहां हंसने लगा जो उस भीड़ में खड़ा था और उसने कहा, पागलों, इन दोनों आदमियों को मैं भलीभांति जानता हूं। जिस आदमी ने जूते बाहर रखे, ये जूते इसने मस्जिद पहन कर आने के लिए खास तौर से बनवाए हुए हैं। और यह आदमी, मैं बहुत दिनों से परिचित हूं, इसकी औरत मर गई थी तो घर में तो शांत रहता था, चैरस्ते पर खड़े होकर आंसू बहाता था। यह आदमी एक्झीबीशनिस्ट है, प्रदर्शन करने में इसको बड़ा आनंद है। और तुम यह मत सोचना कि यह जूते छोड़ गया, जो दलीलें इसने दीं, उनके कारण यह अंदर बैठा हुआ जूतों के बाबत ही सोचता रहा।
इससे मैं भलीभांति परिचित हूं। यह जान कर जूते छोड़ गया था और दूसरे आदमी से मैं भलीभांति परिचित हूं। न तो वह विनम्रता के कारण जूते भीतर ले गया, न कोई चोरी से बच सके इसलिए। क्योंकि यह जूते इस आदमी ने खुद ही चुराए हुए हैं। और इन दोनों ने जो दलीलें दीं, जो तर्क दिए, वे बिलकुल फिजूल हैं, वे कभी घटे ही नहीं। क्योंकि तुम सब खड़े हो, इन्होंने जिस आदमी की बताई कि कोई आदमी निकलेगा वह आदमी निकला। वह इमेजिंड सिनर निकला ही नहीं। वह कल्पित पापी यहां से गुजरा ही नहीं। वह तथ्य तो घटित ही नहीं हुआ।
एक और बात जरूर घटी, तुम इनके जूते की चर्चा में पड़े रहे,इस बीच एक आदमी मस्जिद के भीतर गया। लेकिन उसके पास जूते नहीं थे कि बाहर छोड़ सके, न जूते थे कि भीतर ले जा सके। क्योंकि रास्ते पर एक बूढ़े आदमी को वह अपने जूते भेंट कर आया था। लेकिन वह तुममें से किसी को भी दिखाई नहीं पड़ा।
वह आदमी तुम्हें दिखाई ही नहीं पड़ा जिसकी प्रार्थना स्वीकार हो गई है। लेकिन उसके पास जूते नहीं थे कि छोड़ सके, न जूते थे कि भीतर ले जा सके। क्योंकि मस्जिद आते समय किसी को वह अपने जूते भेंट कर आया है, जिसके पास जूते नहीं थे। वह आदमी तुम्हें दिखाई ही नहीं पड़ा, क्योंकि वह आदमी ने अपने आने के साथ कोई तर्क लेकर भीतर नहीं गया, न कोई तर्क पीछे छोड़ गया। वह चुपचाप आया और चुपचाप निकल गया। उस आदमी का तुम्हें कोई दर्शन ही नहीं हो सका। वह आदमी था जिसकी प्रार्थना स्वीकार हो गई हैं। एक ऐसा जीवन है। जो तर्क का जीवन है, जो प्रदर्शन का जीवन है। जहां हम कुछ सिद्ध करना चाहते हैं।
चाहे हम ईश्वर का होना सिद्ध करना चाहते हों, चाहे हम ईश्वर का न होना सिद्ध करना चाहते हों, चाहे हम सिद्ध करना चाहते हों कि आत्मा है, चाहे हम सिद्ध करना चाहते हों कि आत्मा नहीं है,लेकिन यह दोनों आदमी एक ही बीमारी से ग्रसित हैं, ये कुछ सिद्ध करना चाहते हैं। सिद्ध करने की बीमारी आदमी के अहंकार से पैदा होती है। धार्मिक आदमी कुछ भी सिद्ध नहीं करना चाहता, क्योंकि वह यह कहता है, हमारी यह सामथ्र्य कहां कि हम कुछ सिद्ध कर सकें। मेरा यह बल कहां कि मैं कुछ जान सकूं। मेरी यह बुद्धि कहां कि सत्य को मैं बता सकूं। मैं तो कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकता हूं। इसलिए तर्क की वहां कोई जगह नहीं रह जाती।
आस्तिक कभी धार्मिक नहीं हो सके। और नास्तिक तो हो कैसे सकते हैं? तार्किक वह जो कुछ सिद्ध करने की कोशिश में लगा है, शब्दों से खेल रहा है, इससे ज्यादा नहीं। और शब्दों से खेल कर कुछ भी सिद्ध किया जा सकता है। शब्दों का अपना खेल है। जैसे शतरंज के खेल हैं, जैसे ताश के खेल हैं, उन खेलों के अपने नियम हैं। ऐसे शब्दों के अपने खेल हैं और शब्दों के अपने नियम हैं।-ओशो –

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