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मध्य प्रदेश राज्य

बीमार बताकर 60 साल पुराने सवा लाख पेड़ काटे, मौसम से लेकर सेहत पर पड़ेगा असर

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भोपाल. शहर से करीब 30 किमी दूर कोलार डैम और रातापानी अभयारण्य के बीच 700 हैक्टेयर का हरा-भरा जंगल साफ कर दिया गया है। राज्य वन विकास निगम ने जनवरी से लेकर मार्च तक जंगल सुधार के नाम पर यहां करीब सवा लाख पेड़ों को बीमार बताकर काट दिया। अब मगरपाट और सारस गांव के बीच इस इलाके में सिर्फ पेड़ों के ठूंठ नजर आते हैं। निगम ने 2012 में वन व पर्यावरण मंत्रालय से खराब जंगल को सुधारने का एक्शन प्लान मंजूर कराया था। तभी से हर साल 700 हैक्टेयर में लगे पेड़ काटे जा रहे हैं। पांच साल में यहां 3500 हैक्टेयर में जंगल कटे हैं। 12 जनवरी 2018 से जंगल का सफाया इसी कड़ी में किया गया। इस कटाई का विपरीत असर भोपाल व आसपास की आबोहवा व मौसम पर हो रहा है। अब निगम बारिश में यहां नए पौधरोपण की बात कह रहा है।

कोलार डैम से सटी वीरपुरा रेंज के सारस-मगरपाट गांव के पास 700 हैक्टेयर का हरा-भरा जंगल साफ कर दिया गया है। यह कारनामा जंगल की सेहत सुधारने के नाम पर मप्र राज्य वन विकास निगम ने इसी साल जनवरी से मार्च के बीच किया। काटे गए पेड़ों की तादाद नींद उड़ाने वाली है-एक लाख, 18 हजार 646।

– कोलार डेम और रातापानी अभयारण्य के बीच कभी सागौन, धावड़ा, धिरिया, सेमल, महुआ, कुसुम, तेंदू, अचार का घना जंगल रहा है। दैनिक भास्कर ने एक हफ्ते तक इस इलाके को देखा। पड़ताल में सामने आया कि मगरपाट गांव से आगे सारस गांव के पहले सड़क के दोनों ओर लगे 1 लाख 18 हजार 646 पेड़ों को काटा गया है। यह पेड़ 60 साल पुराने थे, जिनमें 28 हजार पेड़ सागौन के थे।

– इन पेड़ों से निगम को कुल 12 हजार 73 घनमीटर लकड़ी मिली है, जो काटे गए पेड़ों के अनुपात में काफी कम है। यह भी सामने आया है कि खराब जंगल को सुधारने के नाम पर काटे गए सागौन और दूसरी प्रजातियों के अधिकांश पेड़ स्वस्थ थे। सिर्फ इनका डिस्ट्रीब्यूशन विक्रेंदीकृत था। इसके चलते इन पेड़ाें के नजदीक लगे दूसरे पेड़ों की वृद्धि प्रभावित हाे रही थी।

सागौन के एक पेड़ से 2 घनमीटर लकड़ी मिलनी थी आधा घनमीटर भी नहीं मिली, यानी बड़ी हेराफेरी

– रातापानी अभ्यारण्य से सटे सारस – मगरपाट गांव की जंगल कटाई में लकड़ी की हेराफेरी भी सामने आई है। आंकड़ों के अनुसार सागौन के पेड़़ों से ही चौथाई से कम लकड़ी मिली है। भास्कर पड़ताल बताती है कि कई पेड़ों पर कटाई के बाद लगाई जाने वाली सरकारी मुहर (हेमर)गायब है। जो प्राप्त वनोपज को शक के दायरे में लाता है। वन विभाग काटने के बाद पेड़ को एक विशेष नंबर देता है। पेड़ के काटे गए हिस्से पर काले रंग से नंबर लिखने के साथ हेमर (काली रंग की एक मोहर) लगाने का प्रावधान है। इस कारस्तानी से जंगल कटाई के बाद बड़े पैमाने पर लकड़ी चोरी की आशंका है। सागौन के एक पेड़ से औसत दो घन मीटर लकड़ी मिलनी चाहिए, लेकिन वन विकास निगम को आधा घन मीटर भी नहीं मिली।

लकड़ी का गणित: 2 फीट चौड़े और 30 फीट ऊंचे एक पेड़ से निकलती है 2 घनमीटर लकड़ी
– कुल 12 हजार 73 घनमीटर लकड़ी मिली । वन विशेषज्ञों के अनुसार यह काटे गए पेड़ों के अनुपात में काफी कम है।
– सागौन के 2 फीट चौड़े और 20 फीट ऊंचे एक पेड़ से इमारती एवं जलाऊ औसतन 1 से 2 घनमीटर लकड़ी तो निकलती ही है।
– सागौन और दूसरी प्रजातियों के 1.14 लाख पेड़ काटने पर न्यूनतम 1 लाख घनमीटर इमारती एवं जलाऊ लकड़ी निकलेगी।
– बाजार में न्यूनतम 50 हजार रूपए प्रति घनमीटर कीमत है। यानी एक वर्गफीट सागौन एक ग्राम सोने के बराबर।
– वन विकास निगम को सागौन के प्रत्येक पेड़ से 0.35 घन मीटर लकड़ी मिली है। यानी चौथाई से भी कम।

हमें इतनी ही लकड़ी मिली

– वन विकास निगम के डिवीजनल मैनेजर आदर्श श्रीवास्तव इस बारे में कहते हैं-काटे गए पेड़ डेढ़ फुट की चौड़ाई और अधिकतम 14 फीट की ऊंचाई वाले थे। सामान्यत: सागौन का एक पेड़ 60 से 80 साल में 2 फीट चौड़ा और 14 फीट ऊंचा हो पाता है। औसतन सागौन के प्रत्येक पेड़ से निगम को 0.35 घन मीटर लकड़ी मिली है।

जंगल को सुधारने के लिए पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं थी
सारस और मगरपाट गांव के नजदीक जंगल काटना नियम विरुद्ध है। यह टाइगर मूवमेंट और नर्मदा का कैचमेंट एरिया है। यह जंगल करीब 50 से 60 साल पुराना है। निगम ट्रीटमेंट के नाम पर पेड़ काटकर नए पेड़ लगाएगा, अगर यह सफल होता है तो इस प्लांटेशन को वर्तमान पेड़ों की स्थिति में आने में 50 साल लगेंगे। निगम को चाहिए कि वह वर्तमान जंगल को संरक्षित करे। काटने की जरूरत ही नहीं थी।
-डॉ. सुदेश बाघमारे, रिटायर डिप्टी कंजरवेटर फॉरेस्ट

जंगल सुधार के नाम पर प्लान
बीमार, मृत, टेढ़े-मेढ़े और दूसरे पेड़ की ग्रोथ रोकने वाले पेड़ों को काटकर, नए पौधों को रोपना ताकि अच्छी नस्ल के पेड़ों का घना जंगल विकसित हो सके। यही जंगल सुधार है।

10 गांव समेत पूरा इलाका टाइगर कॉरिडोर में है
सारस-मगरपाट रातापानी अभयारण्य के पास वनग्राम हैं। यहां बाघों का मूवमेंट है। बाघ यहीं से होकर कोलार डेम में पानी पीने के लिए आते हैं। ये गांव टाइगर कॉरिडोर का हिस्सा है। कुल 10 गांव हैं। सभी गांव वीरपुर रेंज में हैं। जानकारों के मुताबिक पेड़ों की यह कटाई आगे बाघों के विचरण में चुनौती खड़ी करेगी।

जंगल… 39 वर्ग किमी से साफ

– दो साल में भोपाल व आसपास 39 वर्ग किमी जंगल घटा
– भोपाल में 9 व सीहोर में 30 वर्ग किमी जंगल कम हुआ

स्रोत- फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया

मौसम… दो डिग्री बढ़ा तापमान

– 10 साल में भोपाल, सीहोर, विदिशा, रायसेन में गर्मी बढ़ी
– औसत अधिकतम तापमान में दो डिग्री का उछाल आया

(मौसम विज्ञानी डॉ. डीपी दुबे के मुताबिक)

पानी… तालाबों में तेजी से घटा स्तर

– पेड़ जड़ों में पानी रोके रखते हैं। मिट्‌टी का कटाव भी रोकते हैं।
– ग्रीन कवर घटने से जलस्रोतों में जलस्तर तेजी से कम हुआ।

-डॉ. सुदेश बाघमारे

सेहत… एलर्जी के मरीज 15% बढ़े

– पेड़ घटने से अल्ट्रा वाॅयलेट रेडिएशन में बढ़ोतरी का असर
– पांच साल में स्किन एलर्जी के मरीजों में 15 फीसदी इजाफा

(स्किन स्पेशिलिस्ट डॉ. अनुराग तिवारी)

#नए पेड़ लगाने का काम भी जारी: आदर्श श्रीवास्तव, राज्य वन विकास निगम के डिवीजनल मैनेजरQ. पेड़ क्यों काटे जा रहे हैं ?

A. बीमार और खराब पेड़ काट रहे हैं। पर्यावरण व वन मंत्रालय से फाॅरेस्ट ट्रीटमेंट वर्किंग प्लान 2012 में मंजूर हुआ है। तभी से कटाई व नए पेड़ लगाने का काम जारी है।

Q. पेड़ बीमार क्यों हुए ?
A. पेड़ पहले से ही बीमार थे। सागौन के कई पेड़ खोखले थे। कुछ झुक गए थे। जबकि कुछ टेढ़े-मेढ़े थे। कुछ उम्र पूरी कर चुके थे। यह प्लांटेशन एरिया नहीं है। सभी पेड़ नेचुरल थे, जिनकी उम्र 60 साल से ज्यादा थी।

Q. काटे गए सभी पेड़ सागौन के हैं अथवा अन्य प्रजातियों के भी पेड़ काटे गए हैं ?
A.काटे गए पेड़ सागौन, शाना, दौड़ा प्रजाति के हैं।

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