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ओजस्विनी व्यूज

ऐतिहासिक अन्याय पर न्याय की विजय

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ का निर्णय ऐतिहासिक न्याय की दिशा में मील का पत्थर है। आज पुनः राष्ट्र में न्याय करने, न्याय देने व न्याय सिद्धान्तों की रक्षा करने, न्यायप्रणाली में विश्वास करने की बात की जा रही है यही अपने आप में शुभ संकेत है। न्याय की बात यह देश कर सके, इसके नागरिकों के प्रति न्याय हो सके, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
निर्णय लेने के लिए न्यायालय के समक्ष राम मंदिर के पक्ष में अनेक तथ्य 6 दिसम्बर के पहले व बाद में मौजूद थे। ये साक्ष्य पुनः आज देश को स्मरण कराया जाना प्रासंगिक है। विवादित ढांचे में 14 काले कसौटी पत्थर के मंदिर के स्तम्भ विशुद्ध हिन्दु प्रतीकों के साथ सुशोभित थे। ढांचे की जगह-जगह उखड़ी दीवारों में उल्टे लगे हुए अलंकृत पत्थर प्राचीन मंदिर की साक्षी देते थे। 1875 में प्रोफेसर बी.बी. लाल द्वारा की गई खुदाई में स्तम्भों के आधार मिले। 18 जून 1882 में समतलीकरण के दौरान जमीन की खुदाई से प्राचीन मंदिर के 40 वास्तुखण्ड, शिखरखण्ड, आमलक, चक्रपुरूष युक्त मूर्तियां इत्यादि साक्ष्य मिले। 6 दिसंबर 1882 को मंदिर की प्रतिष्ठा संबंधी 12वीं सदी का 5 फुट व 2 फुट का 20 पंक्तियों का उत्कृष्ट संस्कृत में नागरी लिपि में उत्कीर्णित प्रस्तर अभिलेख मिला जो मंदिर के निर्माण का अमिट साक्ष्य है। इस अभिलेख की फोटोग्राफी, छाप, बनाने से लेकर इसका विशेषज्ञों से शुद्ध पाठ पढ़वाने और उसे न्यायालय में मुख्य साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने की कथा रोमांचक व लंबी है। संक्षेप में केवल इतना कि 6 व 7 दिसंबर को इनके जो छायाचित्रा मैं लेकर आयी वे विशेषज्ञों द्वारा पढ़े जाने पर्याप्त योग्य नहीं थे। उनके लिये कफ्र्यू के दौरान खतरों की परवाह न करते हुए 13 दिसंबर को वापस अयोध्या जाकर छायाचित्रा लिये व छाप बनायी, तब कहीं जाकर विशेषज्ञ इसे पढ़ पाये। गहन अध्ययन व अन्वेषण से इसका पूरा पाठ व अनुवाद डाॅ. के.वी. रमेश द्वारा किया गया।
इसके अनुसार वहां 12वीं शती में महाराज मेघसुत ने जो कि साकेत मण्डल के मांडलिक राजा थे, अयोध्या में जन्मभूमि पर विष्णुहरि (राम) का पर्वत शिखर के समान ऊँचा, विशाल, भव्य एवम् अद्भुत मंदिर बनवाया था। स्वर्ण कलश की सुनहरी आभा मंदिर को देदीप्यमान करती थी। अनेक शिखरों की व्यूह-रचना के साथ पाषाण का ऐसा अति अद्भुत मंदिर पूर्व में किसी नृपति ने नहीं बनवाया था।
टंकोत्खात्-विशालशैलशिखर श्रेणीशिलासंहति व्यूहैर्विष्णुहरेर्हिरण्य कलश-श्रीसुन्दरंमन्दिरं।
पूव्वैप्यर््कृतं नृपतिर्भियेनमित्युद्भुतं………………………………….।। (15वीं पंक्ति, 21वां श्लोक)
यह ‘विष्णुहरि’ वह देवता था जिसने वामन अवतार रूप में त्रिविक्रम रूप धारणकर बलि राजा का मान भंग तथा राम अवतार रूप में दुष्ट दशानन अर्थात् रावण का संहार किया था।
कुर्वाणो बलिराज बाहुदलनं कृत्वा च भूव्र्विक्रमान्। कुव्र्वन्दुष्ट दशानन–
राजा मेघसुत महाराज सल्लक्षण के पौत्रा एवं अल्हण के भतीजे थे। इन्हें महाराजाधिराज गोविंदचंद्र की गुरुकृपा से साकेत मंडल का राज्य प्राप्त हुआ था:
तत्रा सल्लक्षण्-आख्ये प्रतिवपुर्-इव तस्य प्राप्य सद्योऽनवद्यं सुतम्-उदित-…….।।
(11वीं पंक्ति, 15वां श्लोक)
अल्हणः प्रणंय-पेशलः ……………। (12वीं पंक्ति, 16वां श्लोक)
तद्-भातृजो जगति मेघसुतः श्रुताढ्य श्रीमान्-भूद-अनयचन्द्र-पद्-आभिलंघ्य।
गोविन्दचंन्द्र-धरणींद्रगुरू-प्रसादत्-साकेत-मंडल-पतित्वम्-लंभियेन।।
(13वीं पंक्ति, 18वां श्लोक)
मेघसुत के बाद अल्हण के कनिष्ठ पुत्रा आयुष्चंद्र अयोध्या के राजा बने जिन्होंने इस लेख की रचना अपने पितरों के तर्पण के समय की।
गोविन्दचंद्रक्षितिपालराज्य-स्थैर्याय निस्तद्रं-भुजार्गलस्य।
अथ प्रपेदेऽस्य पदं कनीयान्-आयुष्य चंद्रोऽल्हण-सूनुर्-एव।। (16वीं पंक्ति, 22वां श्लोक)
आयुष्यचंद्र ने ‘साकेतमण्डल’ में स्थित ऊँचे-ऊँचे भवनों से युक्त अयोध्या में अनेक गहरे कुएँ खुदवाये थे और सहस्रों तालाबों का निर्माण करवाया था:
उद्दाम-सौध-विबुधालयनीम्-अयोध्याम-अध्यास्य तेन नयनिन्हुत-वैशसेन ।।
साकेतमंडलम्खंडमकारि कूपवापीप्रतिश्रय-तडागसहश्र(स्त्रा)मिश्रं ।। (17वीं पंक्ति, 24वां श्लोक )
आयुषचंद्र ने अनेक बार उसने पश्चिम दिशा की ओर से आने वाले यवनों के आक्रमणों से देश को, अपने बाहुप्रताप से भयमुक्त किया था।
तो निहंति पाश्चात्य भीतिम्-अपि भीषण बाहुदंडःतेजःप्रभाव—-
बाबरी मस्जिद उसी राम जन्म भूमि स्थल पर निर्मित प्राचीन विष्णु हरि के विशाल मंदिर को तोड़कर बनायी गयी। मिस एनेट बेवेरीज ने भी बाबरनामा के अंगे्रजी अनुवाद (1820) में कहा है कि बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने सैयद मूसा आशिकान के निर्देश से ‘फरिश्तों के उतरने की जगह’ (मस्जिद) बनायी। शिलालेख की उपलब्धि ने इसी सत्य को दोहराया मात्रा है। इतिहास की अनेक गुत्थियाँ इसी प्रकार अभिलेखों से सुलझी हैं। इस अमिट साक्ष्य के छायाचित्रा तथा भारत के श्रेष्ठ पुरालिपी विशेषज्ञ डाॅ. के.वी. रमेश के द्वारा पढ़ा गया मूल पाठ, अनुवाद सहित न्यायालय के समक्ष रखा जा चुका है। 2003 में न्यायालय के आदेश से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खुदाई की रिपोर्ट से खुदाई में प्राप्त अनेक प्रमाण व तथ्य वहां राम मंदिर होने का पुष्टि करते हंै जिसमें ईटों के स्तंभ आधारों के अतिरिक्त यज्ञ कुण्ड मूर्तियां आदि हैं।
न्याय होने का अर्थ है शोषण तथा अन्याय की समाप्ति। रामजन्म स्थल सम्पत्ति विवाद मात्रा नहीं है। आक्रान्ताओं तथा लुटेरों द्वारा, भारतीय समाज के साथ किया गया ऐतिहासिक अन्याय भी उसके साथ जुड़ा है। उस अन्याय को जिसे आज न्याय में बदलने के लिये, न्यायपालिका ने ऐतिहासिक निर्णय दिया। आशा है इस निर्णय से इस विवाद की निर्णायक समाप्ति होगी और देश की ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की उस भावना की पुष्टि हो सके, जो कहती हैः
लगाओ न बुतपरस्ती का इल्ज़ाम मुझ पर कि हर बुत में नूरे-खुद़ा देखता हूँ
न पूछो ये मुझसे मैं क्या देखता हूँ मैं तेरी नज़र से खुद़ा देखता हूँ।
एकात्मक समाज की रचना के लिये आवश्यक है देशवासी यह समझें जैसा कि गाँधी जी ने भी कहा था कि ‘राम हिन्दु व मुसलमान दोनों के पूर्वज हंै और इकबाल के अनुसार ‘ईमामे हिंद’। यह समझ ही सद्भावना बनाये रखने में सहायक होगी।

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