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ओजस्विनी व्यूज

अयोध्या प्रसंग: साक्ष्य क्या कहते हैं

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प्रतीक्षारत था पूरा देश ऐतिहासिक न्याय के लिए, क्योंकि इसका संबंध एक ओर प्राचीन और अर्वाचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति से भी है तो दूसरी ओर भारतीय समाज के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से भी। इसलिए सबके कान सुनने को आतुर थे एक ऐतिहासिक निर्णय। स्वतंत्रा भारत के पश्चात प्रत्येक भारतीय ने संविधान के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करते हुए न्यायपालिका के प्रति प्रतिबद्धता अपेक्षित है।
निर्णय हो चुका है इलाहाबाद उच्च न्यायालय की विशेष लखनऊ की खंडपीठ के सम्मुख लंबित राम जन्मभूमि के विवाद के प्रकरण का। उससे संबंधित साक्ष्य और प्रमाण उपलब्ध थे 6 दिसम्बर 1992 की घटना के पूर्व भी और उसके बाद भी पर्याप्त मिले। विवादित ढांचे में लगे देव कन्या, पूर्ण कलश, पूर्ण घट आदि से युक्त 14 अलंकृत कसौटी के स्तंभ, जिसके बारे में ब्रिटिश इतिहासकारों ने एक मत कहा कि वे मस्जिद की स्थापत्य का हिस्सा न होकर मंदिर के ही स्तंभ थ;े 18 जून 1992 को समतलीकरण के दौरान सरकार द्वारा अधिग्रहीत 2.77 एकड़ भूमि से निकले, पूर्व में तोड़े गए मंदिर के 40 अलंकृत वास्तु अवशेष; तथाकथित मस्जिद की दीवारों में उल्टे करके लगाए गए हिन्दू मंदिरों के अलंकृत वास्तुखंड; 1526 में बाबर के सिपहसालार मीर बाकी के द्वारा सैयद मूसा आशिकान के निर्देश पर राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़ कर 1528 में निर्मित बाबरी मस्ज़िद के बाहर के प्रांगण में स्थित राम चबूतरा और उस पर होता निरंतर अखंड कीर्तन और पूजा; राम जन्मभूमि के लिए 77 बार हुए हिन्दु मुस्लिम संघर्ष।
योरोपीय यात्रियों विलियम फिंच (1608-11ई.) टाइफनथेलर (1745-1785 ई.) आदि के यात्रा विवरण जिसमें उन्होंने कहा कि वहां राम चबूतरे पर बार-बार हिंदू आकर परिक्रमा व दण्डवत प्रणाम करते हैं, और राम नवमी मनाते हैं, राम जन्मस्थान मन्दिर तोड़कर उसके स्तम्भों का प्रयोग करते हुए वहां मस्जिद बनाई गई है। मुस्लिम इतिहासकारों के सभी वर्णनों में जन्म स्थान और उस पर बने मन्दिर को तोड़कर मस्जिद बनाने का उल्लेख है।
सहीफा-ए-चहल नसाइह बहादुरशाही में औरंगजेब की पुत्राी का हुक्म है कि (बा फरमाने बादशाही ) के आधार पर जो मस्जिदें बनाई गई उन्हें नमाज अदा किए जाने और (उनमें) खुतबा पढ़े जाने से छूट नहीं दी गई है। मथुरा, बनारस अथवा आदि स्थानों पर स्थित हिन्दुओं के देवालयों यथा-कन्हैया के जन्म का स्थान, सीता रसोई स्थान, हनुमान का स्थान पर हिन्दुओं (कुफ्र) को बहुत श्रद्धा है। बाबरी मस्ज़िद के मुअज्ज़िन मुहम्मद असगर की 30 नवम्बर 1858 में फैजाबाद के जिलाधीश को लगायी गयी याचिका, जिसमें उसने कहा कि यहां मस्जिद पर हिन्दुओं ने कब्जा कर लिया है, और दीवारों पर राम का नाम लिख दिया है। बार-बार हिंदू आते हैं, पूजा करते हैं, और संघर्ष करते हैं, उनको रोका जाए। फैजाबाद के जिलाधीश (1885) का दिया गया निर्णय कि जो भी कुछ 358 वर्ष पूर्व हिंदुओं के मंदिर को तोड़कर मस्ज़िद को बनाने का कार्य बहुत गलत हुआ, और बहुत दुखद है। मिर्ज़ाजान (1855) जो कि वाज़िद अली शाह के राज्य काल में अमीर अली अमेठवी के नेतृत्व में राम चबूतरे पर कब्जे के लिए किये गये जिहाद का प्रत्यक्षदर्शी था, का कथन-कि जहां ‘जन्मस्थान’ पर राम का मंदिर था वहां बड़ी मस्जिद और छोटे मंडप के स्थान पर मस्जिदे मुख्तसरी-कनाती बनायी। शहंशाह बाबर ने 923 हिजरी में सैयद मूशा आशिकान के कहने से खूबसूरत मस्जिद बनाई और वह सब जगह ‘सीता की रसोई-मस्जिद’ कही जाती है। ब्रिटिश रेवेन्यू रिकार्ड्स और गजेटियर्स में इस पूरे स्थान का मस्ज़िद-ए-जन्मस्थान के रूप में उल्लेख है।
6 दिसंबर 1992 को जब विवादित ढांचा ढहा तब उसमें से प्राचीन मंदिर के जो अवशेष मिले, उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण संबंधी 12वीं शताब्दी का अभिलेख जिसमें मंदिर बनवाने वाले राजा और उसकी वंशावली का उल्लेख है। बाबरी ढाँचे की पीछे की दीवार में लगा मंदिर की प्रतिष्ठा संबंधी 12वीं शती का 5 फुट व 2 फुट का 20 पंक्तियों का लाल बलुआ पत्थर उत्कृष्ट संस्कृत में नागरी लिपि में उत्कीर्णित प्रस्तर अभिलेख मंदिर के निर्माण का अमिट साक्ष्य है। इस अभिलेख की फोटोग्राफी, छाप, बनाने से लेकर इसका विशेषज्ञों से शुद्ध पाठ पढ़वाने और उसे न्यायालय में मुख्य साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने की कथा रोमांचक व लंबी है। संक्षेप में केवल इतना कि 6 व 7 दिसंबर को इनके जो छायाचित्रा मैं लेकर आयी वे विशेषज्ञों द्वारा पढ़े जाने पर्याप्त योग्य नहीं थे। उनके लिये कफ्र्यू के दौरान खतरों कि परवाह न करते हुए 13 दिसंबर को वापस अयोध्या जाकर छायाचित्रा लिये व छाप बनायी, 13 दिसम्बर को 11 बजे से 2 बजे तक 4-4 कैमरों के साथ उन सब साक्ष्यों के फोटोग्राफ लेना और अनाड़ी हाथों से उनकी छाप बनाना मेरे लिए आसान नहीं था। न ही सरल था संगीनधारी सैनिकों के साए में और स्थानीय प्रशासकों की बार-बार पूछ-परख के बीच वह कार्य सम्पन्न करना। किंतु किसी तरह यह कार्य सम्पन्न हुआ और 14 दिसम्बर को इन्हें लेकर मैं दिल्ली पहुँची। 1996 में न्यायालय के आदेश से इसकी पुनः छाप बनायी गई। तब कहीं जाकर विशेषज्ञ इसे पढ़ पाये। गहन अध्ययन व अन्वेषण से इसका पूरा पाठ व अनुवाद डाॅ. के.वी. रमेश द्वारा किया गया।
इस अभिलेख के अनुसार 12वीं शती में महाराज मेघसुत ने जो कि साकेत मण्डल के मांडलिक राजा थे, अयोध्या में जन्मभूमि पर विष्णुहरि (राम) का पर्वत शिखर के समान ऊँचा, विशाल, भव्य एवम् अद्भुत मंदिर बनवाया था। स्वर्ण कलश की सुनहरी आभा मंदिर को देदीप्यमान करती थी। अनेक शिखरों की व्यूह-रचना के साथ पाषाण का ऐसा अति अद्भुत मंदिर पूर्व में किसी नृपति ने नहीं बनवाया था।
टंकोत्खात्- विशालशैलशिखर श्रेणीशिलासंहति व्यूहैर्विष्णुहरेर्हिरण्य कलश-श्रीसुन्दरंमन्दिरं।
पूव्वैप्यर््कृतं नृपतिर्भियेनमित्युद्भुतं………………………………….।। (15वीं पंक्ति, 21वां श्लोक)
यह ‘विष्णुहरि’ वह देवता था जिसने वामन अवतार रूप में त्रिविक्रम रूप धारणकर बलि राजा का मान भंग तथा राम अवतार रूप में दुष्ट दशानन अर्थात् रावण का संहार किया था।
कुर्वाणो बलिराज बाहुदलनं कृत्वा च भूव्र्विक्रमान्। कुव्र्वन्दुष्ट दशानन–
राजा मेघसुत महाराज सल्लक्षण के पौत्रा एवं अल्हण के भतीजे थे। इन्हें महाराजाधिराज गोविंदचंद्र की गुरुकृपा से साकेत मंडल का राज्य अनयचंद्र से प्राप्त हुआ था। गढ़वाल वंश का पंचम राजा था, जो सुविख्यात चन्द्रदेव (लगभग 1090-99 ई.) का पौत्रा तथा मदनपाल का पुत्रा था। उसका राज्य लगभग 1114 ई. से 1154 ई. तक था और कान्यकुब्ज तथा आसपास के एक बड़े भू-भाग तक विस्तृत था।
तत्रा सल्लक्षण्-आख्ये प्रतिवपुर्-इव तस्य प्राप्य सद्योऽनवद्यं सुतम्-उदित-…….।। (11वीं पंक्ति, 15वां श्लोक) अल्हणः प्रणंय-पेशलः ……………। (12वीं पंक्ति, 16वां श्लोक)
तद्-भातृजो जगति मेघसुतः श्रुताढ्य श्रीमान्-भूद-अनयचन्द्र-पद्-आभिलंघ्य।
गोविन्दचंन्द्र-धरणींद्रगुरू-प्रसादत्-साकेत-मंडल-पतित्वम्-लंभियेन।। (13वीं पंक्ति, 18वां श्लोक)
मेघसुत के बाद अल्हण के कनिष्ठ पुत्रा आयुष्चंद्र अयोध्या के राजा बने जिन्होंने इस लेख की रचना अपने पितरों के तर्पण के समय की।
गोविन्दचंद्रक्षितिपालराज्य-स्थैर्याय निस्तद्रं-भुजार्गलस्य।
अथ प्रपेदेऽस्य पदं कनीयान्-आयुष्य चंद्रोऽल्हण-सूनुर्-एव।। (16वीं पंक्ति, 22वां श्लोक)
आयुष्यचंद्र ने ‘साकेतमण्डल’ में स्थित ऊँचे-ऊँचे भवनों से युक्त अयोध्या में अनेक गहरे कुएँ खुदवाये थे और सहस्रों तालाबों का निर्माण करवाया था:
उद्दाम-सौध-विबुधालयनीम्-अयोध्याम-अध्यास्य तेन नयनिन्हुत-वैशसेन ।।
साकेतमंडलम्खंडमकारि कूपवापीप्रतिश्रय-तडागसहश्र(स्त्रा)मिश्रं ।। (17वीं पंक्ति, 24वां श्लोक )
आयुषचंद्र ने अनेक बार पश्चिम दिशा की ओर से आने वाले यवनों के आक्रमणों से देश को, अपने बाहुप्रताप से भयमुक्त किया था।
तो निहंति पाश्चात्य भीतिम्-अपि भीषण बाहुदंडःतेजःप्रभाव—-
पुरातत्व के अध्ययनों में अभिलेख अंतिम साक्ष्य होता है। इससे स्पष्ट होता है कि बाबरी मस्जिद के पहले राम जन्म भूमि स्थल पर प्राचीन विष्णुहरि का विशाल मंदिर था। मिस ए.एस. बिवरीज द्वारा किये गये बाबरनामा के अनुवाद (1920) में भी कहा है कि बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने सैयद मूसा आशिकान के निर्देश से ‘फरिश्तों के उतरने की जगह’ (मस्जिद) बनायी। शिलालेख की उपलब्धि ने इसी सत्य को दोहराया मात्रा है। इतिहास की अनेक गुत्थियाँ इसी प्रकार अभिलेखों से सुलझी हैं। इस अमिट साक्ष्य के छायाचित्रा तथा भारत के श्रेष्ठ पुरालिपी विशेषज्ञ डाॅ. के.वी. रमेश के द्वारा पढ़ा गया मूल पाठ, अनुवाद सहित न्यायालय के समक्ष रखा जा चुका है। हाल ही में अयोध्या महात्म्य पर नेपाल से एक प्राचीन पांडुलिपि की प्राप्ति हुई है। उसमें 11 विष्णुहरि मंदिरों का उल्लेख है। 10 विष्णुहरि मंदिरों की खोज की जा चुकी है और विष्णु हरि का 11वां मंदिर अयोध्या में स्थित था।
जनवरी 2003 में जापानी कंपनी ने अयोध्या मामलों की सुनवाई कर रही लखनऊ हाईकोर्ट बेंच के आदेशानुसार अयोध्या विवाद को सुलझाने हेतु वहां हिन्दू मंदिर के अस्तित्व की संभावना का पता लगा अपनी रिपोर्ट मार्च 2003 में न्यायालय व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंप दी थी। इस कंपनी की रिपोर्ट में भी यह बताया गया कि ढांचे के नीचे बड़े पत्थर या चट्टानें नहीं बल्कि कोई निर्मित किए हुए मंदिर के अवशेष हैं। अदालत नेे पुनः अप्रैल 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को आदेश दिया कि रामलला के मंदिर के वर्तमान परिसर को छोड़कर चारों ओर तीन माह के भीतर खुदाई की जाए। इतने कम समय में खुदाई पूरी करके, साक्ष्यों को संजोकर, पूरी रिपोर्ट लिखना अपने आप में असाध्य कार्य है। किन्तु भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने ये पूरा कर दिखाया।
इस खुदाई की रिपोर्ट के अनुसार खुदाई में 50 स्तंभों के आधार, सात कालखण्डों की सामग्री, विभिन्न स्तरों की निरंतरता, पत्थर और सजावटी सामग्री, खंडित देवी-देवताओं की मूर्तियां, अलंकृत वास्तुवशेषों, वास्तुखण्डों, लतावल्लरी, आमलक, कर्पूरबल्ली युक्त वास्तुखंड एवं अर्धस्तंभों से युक्त शाखाएं, कसौटी स्तंभों के अवशेष, मकरमुखी नाली, वृत्ताकार शिव मंदिर, पुष्किरणी (छोटी बाबड़ी) 9वीं 10वीं शती के मंदिर तथा 12वीं शती निर्मित जन्मभूमि मंदिर की दीवार आदि पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इनसे स्पष्ट सिद्ध होता है कि बाबरी ढांचा मंदिर के अवशेषों पर निर्मित था और वहां कोई उत्तर भारतीय मंदिरों के समान विशाल मंदिर विद्यमान था।

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