LOADING

Type to search

ओजस्विनी व्यूज

राम जन्मभूमि मंदिर के स्तम्भ पर प्राप्त हिन्दू प्रतीक

Share

रामकोट अथवा ‘रामदुर्ग’ के प्राचीन हिन्दू गढ़ के पश्चिमी हिस्से पर स्थित तथाकथित मुगलकालीन बाबरी मस्जिद नाम से विख्यात मस्जिदी ढाँचे के अंदर 14 काले पत्थर (कसीस) के अलंकृत स्तम्भ स्थित हैं जो बाबरी ढाँचे में गुम्बदों का भार वहन करने वाले स्तम्भों के रूप में प्रयुक्त हैं। ये स्तम्भ मर्यादा पुरुषोत्तम के उस प्राचीन राम मंदिर के अस्तित्व के साक्षी हैं जिसके भग्नावशेषों पर वर्तमान ढाँचे की निर्जीव दीवारें खड़ी हैं। ऐसे ही दो स्तम्भ सैयद मूसा आशिकान की मजार के पास उल्टे स्थापित हैं जो कि मस्जिदी ढाँचे से बाहर हैं। ये स्तम्भ आज भी प्राणवान प्रतीत होते हैं इसलिये कि उन पर भारतीय धर्म, दर्शन व तत्वचिंतन को एक बारगी उद्घाटित करते हुए पूर्णघट कल्पलता, माला, हंस, यक्ष, देवकन्या, शालभंजिका, द्वारपाल तथा गण आदि अलंकरणीय प्रतीक शोभायमान हैं। इन्होंने भारतीय कला को समृद्ध व अमर बनाया है तथा स्थायी व शाश्वत सौंदर्य से मंडित किया है।
बाबरी मस्जिद के अन्दर तथा मजार के पास स्थित लगभग सभी स्तम्भों पर इस प्रकार के प्रतीक मिले हैं। भारतीय साहित्य व कला की बारहखड़ी के आधार ये प्रतीक हैं, जो वैदिक काल से लेकर संपूर्ण भारतीय कला इतिहास में भारतीय विचारधारा के अद्वितीय संवाहक तथा सज्जा के माध्यम रहे हैं।
पूर्णघट-दोनों ओर से निकलती लतावल्लरियों से मुख तक आच्छादित ‘पूर्ण कुंभ’ भारतीय कला के सुन्दरतम् प्रतीकों में से है। यह प्रकृति द्वारा प्रदत्त पूर्णता, समृद्धि आदि सभी प्रकार के आध्यात्मिक व भौतिक सुखों व आनन्दरूपी उपहारों से जीवनरूपी घट को रूपायित करता है-
‘आपूर्णो अस्य कलशः स्वाह। सिक्तेव कोशं सिसि´्चे पिबध्ये’
(ऋग्वेद, 3.32.15)
पूर्ण कुंभ की कल्पना के मूल में उपनिषदों का यह सूत्रा वाक्य है-
‘पूर्णमदः पूर्णमिदम पूर्णात् पूर्णमदुच्यते’
अर्थात् वह पूर्ण है, यह पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण उद्भूत होता है। यहाँ अदः (वह) तथा इदम् (यह) जीवन क्रम को शासित करने वाले शाश्वत विपरीत ध्रुव हैं। सृष्टि में कार्यरत जीवन-मरण, सत-असत्, ज्योति-तम, अमरत्व-मृत्यु, जन्म-जरा, यौवन-बुढ़ापा इत्यादि विरोधी शक्तियों गुणों से आप्लावित मानव शरीर का प्रतिनिधित्व करता हुआ वैदिक प्रतीक है, जो भारतीय कला में विभिन्न रूपों में प्रारंभिक काल से लेकर अंत तक मिलता है। भरहुत से लेकर 6वीं-7वीं शती तक इसका अनेक रूपों में विकास हुआ और संपूर्ण उत्तर भारत व दक्षिण भारत में सभी ओर यह समान रूप से स्वीकृत हुआ। 10वीं-11वीं शती तक इसका अत्यधिक विकसित व अलंकृत रूप दिखता है। भरहुत, साँची, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, कपिश, मथुरा के स्तूपों के स्तंभों से लेकर ग्यारसपुर, नीलकंठेश्वर मंदिर, केकिंद (राजस्थान) तथा उदयेश्वर मंदिर, उदयपुर, मध्यप्रदेश में सर्वत्रा यही दृष्टिगोचर होता है।
हंस-दो-तीन स्तम्भों में हंसों का सुन्दर अंकन मिलता है। भारतीय संकल्पना के अनुसार हंस क्षीर-नीर-विवेक का प्रतीक है। राजा भोजविरचित समरांगणसूत्राधार में क्रीड़ारत हंसों से मंदिरों की दीवारें सुशोभित करने का निर्देश है। एक स्तम्भ में अत्यधिक अलंकृत अनेक पंखयुक्त सुन्दर हंस का चित्राण मिलता है जो कि पूर्ण कुंभ से प्रस्फुटित होते कमलनाल पर स्थित ब्रह्मा।
कमल-कमलपर्ण अथवा डंठल सृष्टि की योनि या गर्भाधान की शक्ति का प्रतीक है और कमल अगाध तलों के ऊपर तैरते समनिष्टगत प्राण का द्योतक है। अधिकांश स्तम्भों में कमल का अंकन मिलता है। कहीं वह पूर्णकलश अथवा पूर्णघट से निकलता हुआ दिखाया गया है, कहीं स्तम्भ के निचले अथवा ऊपरी भाग पर। एक स्तम्भ में कमल पर देवकन्या नृत्यरत् है। कमल को विभिन्न अलंकृत रूपों में अंकित किया गया है।
यक्ष-स्तम्भ के भारवाहक के रूप में स्तम्भ के ऊपरी भाग में अथवा कंधों पर कलश उठाये हुए, आधार पट्टिका में उत्कीर्णित हो-यक्ष हिन्दू मंदिरों के स्तम्भों के लगभग अनिवार्य अंग हैं। राम मंदिर के काले स्तम्भों में भी इनका अंकन दोनों रूपों में मिलता है।
कल्पलताएँ-नारी यष्टि के समान लचीली तथा कोमल भावों की प्रतीक लहराती हुई कल्पलताएँ, विभिन्न रूपों में स्तम्भों पर बड़े पद्मकों व पुष्पकों के रूप में अथवा द्वारशाख पर सम्पूर्ण स्क्रोल के रूप में अंकित हैं। राम जन्मस्थान में रखे द्वारशाख में लतावल्लरियों का सुन्दर चित्राण है।
वैष्णव द्वारपाल-नए राम जन्मस्थान मंदिर के प्रांगण में काले रंग का अलंकृत पंचशाखीय द्वारशाख में नीचे के आले में वैष्णव द्वारपाल मूत्र्यांकित है जिसका दाहिना हाथ वक्षस्थित है। बाएँ हाथ में संभवतः गदा है। मस्तक पर करण्डमुकुट है। इसकी एक शाख की छोटी रथिकाओं में विभिन्न भंगिमाओं में नायिकाएँ हैं तथा अन्य शाखाओं में लतावल्लरियाँ हैं।
स्तम्भ वास्तुशिल्प के विकास के सभी रूप भी इन स्तम्भों में दृष्टिगोचर हैं। स्तम्भ के अष्टकोणीय पहलों पर विभाजन पर विभाजन पट्टियों से गिरती हुई मालाओं की अभियोजना, नीचे से चतुष्कोणीय स्तम्भों का, ऊपर की ओर अधिकाधिक पैनल अथवा (रिब्स) पहलों अथवा अष्टकोणीय स्तम्भों में विकास भी दृष्टव्य है। मंदिरों के पंचशाखी, सप्तशाखी अथवा नवशाखी द्वारशाखाओं की विभिन्न शाखाओं में लतावल्लरी, मिथुन युगल, नायक, नायिकाएँ, नर्तकियाँ, नृत्यरतगण तथा नीचे की ओर रक्षक द्वारपाल अथवा द्वाररक्षिका नदी देवियों का अंकन भी भारतीय कला के सज्जात्मक व प्रतीकात्मक पक्ष के अभिन्नतम भाग हैं।
इन सभी स्तम्भों का ध्यानर्वूक अवलोकन व विश्लेषण करने पर यह सिद्ध होता है कि रामकोट में प्राप्त ये स्तम्भ तथा उन पर अलंकृत प्रतीक उस कला शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो लगभग 10वीं-11वीं शती में सम्पूर्ण भारत में प्रचलित थी। इस कला शैली का विकास चाहे उत्तर भारत में कलचुरियों, परमारों, चन्देलों तथा गहड़वालों की छत्राछाया में हुआ अथवा दक्षिण में चोलों अथवा होयसलों के आश्रय में। इसका मूल स्वरूप व प्रतीक एक से ही थे। यह बात और है कि क्षेत्राीय परिवर्तनों, कालगत विशेषताओं, भौगोलिक विशिष्टताओं, से स्तम्भ में प्रयुक्त पत्थर की उपलब्धि, कलाकार की वैयक्तिक क्षमता व कलात्मक प्रतिभा को ध्यान में रखते हुए थोड़े बहुत परिवर्तन हुए हों, विभिन्न कलात्मक अभिप्रायों की यह बारहखड़ी नाना अर्थों को प्रकट करने के लिए एक ही भाषा के रूप में 9वीं से 12वीं शती तक लगभग एक ही प्रकार से सम्पूर्ण हिन्दू कला में स्वीकृत हुई। ये अलंकरणात्मक प्रतीक न तो नए हैं न ही किसी नवीन सत्य का उद्घाटन करते हैं। किस देवी-देवता का मंदिर है या गर्भगृह में सनातन धर्म के कौन से देव प्रतिष्ठित हैं, इस तथ्य से निरपेक्ष काश्मीर से कन्याकुमारी तक, सिंधु से ब्रह्मपुत्रा की घाटी तकसभी मंदिरों की भित्तियों में, स्तम्भों में, रथिकाओं में, द्वारशाखाओं में समान रूप से एक ही भारतीय सांस्कृतिक परम्परा की अजस्त्रा धारा का प्रतिनिधित्व करते हुए शोभायमान हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार राम के मंदिर में चतुर्भुज विष्णु की स्थापना होती है और ललाट बिम्ब में स्थापित महादेव के दोनों ओर ब्रह्मा व विष्णु अधिष्ठित होते हैं। राजिम के राजीवलोचन मंदिर के गर्भगृह में सुदर्शनधारी की प्रतिष्ठा और खजुराहो के आदिनाथ व पाश्र्वनाथ मंदिरों के गर्भगृह में जहाँ वीतराग तीर्थंकर की प्रतिमा अधिष्ठित है, उसकी भित्तियों पर, उसी एक हिन्दू कला के प्रतीकों का अलंकरण इसी तथ्य को प्रतिभासित करता है और हिन्दू संस्कृति में परिलक्षित एकात्मकता का, अनेकता में एकता व एकता में अनेकता का निर्भान्त परिचायक है। आज विवादास्पद रामलला के मंदिर के मूल गर्भगृह में किसकी मूर्ति स्थापित थी, यह कहना कठिन होते हुए भी उपलब्ध साक्ष्यों से सिद्ध होता है कि यह वैष्णव मंदिर था। संपूर्ण भारत में ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हैं जहाँ राम और विष्णु को एक ही मानते हुए राम मंदिर में विष्णु की मूर्ति तथा विष्णु मंदिर में राम की मूर्ति की स्थापना का उल्लेख है।
किन्तु जब स्वतः सिद्ध सत्य को झुठलाए जाने का दुस्साहस किया जाए, ठोस प्रामाणिक पुरातात्विक साक्ष्यों को नजरअंदाज किया जाए, इधर-उधर की बातें कर, मनगढ़ंत, कपोल-कल्पित समस्याओं के द्वारा झूठे, वकीली दावों में उलझाकर सर्वमान्य स्थापित तथ्यों से ध्यान हटाने की निरर्थक कोशिश की जाए, तो ऐसा करने वालों की प्रमाणिकता पर गहरे प्रश्नचिन्ह लगते हैं। एक ओर सम्पूर्ण भारतीय साहित्य, वैदिक व पौराणिक तथा रचनात्मक साहित्य में उपलब्ध राममंदिर के अस्तित्व के साक्ष्य तथा दूसरी ओर देशी-विदेशी इतिहासकारों, स्वयं मुस्लिम शासकों के मंदिर को तोड़ने के हुक्मनामों और पूजा न करने देने की साक्षी को भी नकारा जाए, असत्य को पुनः-पुनः दोहरा कर लेनिन व गोबेल्स के समान प्रचारित कर सत्य बनाने का प्रयास किया जाए तो सत्य व असत्य की इस लड़ाई में सत्य को भी पुनः-पुनः उद्घाटित करना पड़ता है। बाबरी ढाँचे में खड़े इन स्तम्भों की साक्षी किसी भी अन्य साक्ष्य से अधिक प्रामाणिक व ठोस है कि यहाँ हिन्दू मंदिर था जिसके ध्वंसावशेषों पर, हिन्दुओं के स्वाभिमान को शताब्दियों से आहत करती बाबरी मस्जिद का ढाँचा है, जो आक्रांताओं की सोची-समझी, सुविचारित नीति के चलते भी खड़ा किया गया। इसलिए जिन्हें इतिहास के ये सत्य दृष्टिगोचर नहीं होते उनसे यह दोहराना यहाँ अत्यंत आवश्यक है कि राम जन्मभूमि का इतिहास तथा उससे जुड़ी जनभावना का इतिहास दो अलग बातें नहीं हैं। यूँ भी जब किसी समाज के करोड़ों लोगों की भावना एक ही आस्था से हजारों वर्षों से जुड़ी हो, यह प्रश्न कि उस आस्था की ऐतिहासिकता क्या है तथा उसे प्रमाणित करने के लिए आवश्यकसाक्ष्य उपलब्ध हैं या नहीं, गौण है। महत्वपूर्ण है केवल वह आस्था-जिसके अंतर्गत मर्यादा पुरुषोत्तम महामानव राम भारतीय संस्कृति के सम्पूर्ण गुणों व मूल्यों को समाहित करते हुए वीर-धीर, गुणी आदर्श चरित्रा के रूप में जनमानस में प्रतिष्ठित हैं, जो इतिहास का उतना ही बड़ा सत्य है, जितने कि उपलब्ध अभिलेखों, सिक्कों तथा लिखित सामग्री इत्यादि के द्वारा प्रमाणित कोई ऐतिहासिक सत्य।
मुझे विश्वास है कि रामलला के प्राचीन मंदिर के अस्तित्व तथा अवसान की करुण व्यथा कहते, वर्षों पूर्व के हमारे अपमान की साक्षी आज भी देते ये स्तम्भ, भविष्य में निर्मित होने वाले भव्य राम मंदिर में बहुत शीघ्र प्रमुख भित्ति स्तम्भों के रूप में स्थापित होकर भारतीय सांस्कृतिक पुनरुत्थान तथा हिन्दू समाज के नवनिर्माण के प्रतीक रूप में प्रतिष्ठित होंगे।

gdhfghfghfghfghfbfghgh

admin

gdhfghfghfghfghfbfghgh

  • 1

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *