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ओजस्विनी व्यूज

निर्णय का अधिकार मेरा है

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‘‘चाहे हो अग्नि परीक्षा चाहे हो चैपड़ की बिसात
हर सदी में दाँव पर है नारी की जिन्दगी’’
कितनी भी पवित्रा हो और चाहे कितनी भी निष्ठावान. हर युग व सदी में हर समाज व देश में आज भी सुबह से शाम तक जाने कैसी-कैसी अग्नि परीक्षाओं से गुजरने को विवश की जा रही है नारी। वस्तु की तरह खरीदी और बेची जा रही है। प्रदर्शित की जा रही हैं। दाँव पर लग रही है या बिछ रही है। त्याग के नाम पर, हवस मिटाने के लिए, परायों की भी और स्वजनों की भी।
उदार मातृ सत्तात्मक समाज से लेकर वर्तमान कट्टर पितृसत्तात्मक समाज बनने तक का इतिहास स्त्राी के ऊपर अपनी प्रभुता स्थापित करने, वर्चस्व जताने, उसे तरह-तरह से उत्पीड़ित करने का इतिहास है. मर्यादा के नाम पर सुरक्षा की आड़ में. काम के बँटवारे की ओट में। इस का परिणाम है दिन ब दिन का घटता स्त्राी-पुरुष अनुपात. समाज में बढ़ता असंतुलन। अविकसित बच्चे कुपोषण के शिकार बच्चे व माताएँ। बढ़ती जनसंख्या, आपराधिक प्रवृत्तियाँ और सामाजिक विकृतियां, मादक द्रव्यों का प्रचलन। स्त्राी का घटता सम्मान। बढ़ता महिला उत्पीड़न।
इसलिए चिंतित हैं समाजशास्त्राी, चिंतक और उदार हृदय पुरुष, विचारवान स्त्रिायाँ और उठाई जा रही है हर ओर से नारी सशक्तिकरण की आवाज। की जा रही है नारी उत्थान व विकास की बात। इसलिए ज़रूरी है बार-बार ये सवाल उठाने चर्चाएँ। इसलिए माघ और फाल्गुन में तो जैसे इन चर्चाओं से पूरा विश्व सुलगने लगता है, जैसे सुलगते हैं बसन्त के आगमन पर पलाश के फूल. आने वाली गर्मी की तपन का अहसास कराते। 8 मार्च अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के आगाज और आँच में तपने लगता है पूरा विश्व भी गोष्ठियों, परिचर्चाओं की तपन। वर्ष भर के लिए नारी विकास की योजनाएँ बनाने, उन्हें क्रियान्वित करने के लिए बैठकों का दौर। यह सारी चिंता, परेशानी अच्छी है. शुभ है। इनका कोई विशेष सार ही निकलता हो, ऐसा भी नहीं है। किन्तु आवाज उठ रही है, शोर है तो कहीं न कहीं असर भी होता है। सवाल है कि इस असर की अपेक्षा किस पर है। दंभी पुरुषों पर या हीनभावना से ग्रस्त स्त्रिायों पर। प्रकृति से स्वच्छन्द और समाज से परम्परागत सुविधा, छूट पाता आया, स्त्राी का शोषण करने का आदि पुरुष मन इतनी आसानी से हाथ में आए अधिकार, क्या गोष्ठियों, परिचर्चाओं से प्रभावित होकर छोड़ देगा। और वह भी तब, जब ऐसे कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी शून्य के बराबर होती है। ऐसे पुरुषों की संख्या नगण्य है जो स्त्राी के आगे बढ़ने से खुश होते हैं। उल्टे उनका अहं किसी न किसी रूप में खीझ बनकर, स्त्राी के ऊपर ही तरह-तरह की प्रताड़ना, अपमान के रूप में उतरा करता है। ‘ये क्या बन गई, बड़ी इतराने लगी हो, बहुत अहंकारी हो गई हो।’, अपने आपको बहुत समझने लगी हो’ जैसे हल्के वाक्यों से चलकर बात, चरित्राहनन तक और आए दिन की मार-पिटाई, से लेकर हत्या तक पहुँच जाती है।
दूसरी ओर स्त्राी सशक्तिकरण के सारे प्रयास इसलिए बेमानी हो जाते हैं, कि स्त्राी असंगठित है। अशिक्षित और गाँवों में रहने वाली तो क्या सभी प्रबुद्ध महिलाएँ तथा महिला संगठन तक एकमत नहीं हैं। न उद्देश्य स्पष्ट है और न लक्ष्य निर्धारित। अनेक स्त्राी संगठन पूर्ण नग्न रह सकने की स्वतंत्राता को, नारी अधिकार मानते है, जबकि कुछ स्त्राी को वस्तु मान कर सौन्दर्य प्रतियोगिताओं में होने वाले प्रदर्शन के खिलाफ खड़े हैं। कुछ के लिए शराब का गिलास हाथ में जाम, धुएँ के छल्ले उड़ाना ही स्वतंत्राता का परिचायक है, जबकि कुछ स्त्रिायों के अश्लील प्रदर्शन, पोस्टर्स के खिलाफ जंग के पक्षधर हैं।
नारीत्व की पश्चिमी व भारतीय अवधारणा में संस्कृति भेद के कारण अंतर होने से भी भारत में स्त्राी आंदोलन सशक्त व संगठित नहीं हो पाए हैं। कारण नारीत्व की भारतीय अवधारणा अंतर्विरोधों का पुलिंदा है, जिससे नारी के विकास एवं उत्थान की प्रक्रिया को न केवल धक्का लगा है अपितु अशिक्षा, अज्ञानता और दासता-अधीनता के अंधकार युग से शिक्षा, समानता के प्रकाश युग में आने के बाद ये विरोधाभास अधिक मुखर हो गए हैं। तभी तो शास्त्रों के निर्देश के बावजूद कि देवी के समान सम्मानित की जानी चाहिए हर जगह, हर क्षण पग-पग पर ऐसे या वैसे अपमानित है। दुर्गा के रूप में बारहों मास पूजी जा रही है. किन्तु व्यावहारिक धरातल पर नितांत शक्तिहीन है। कन्या पूजन, कन्यादान की परम्परा है और कन्याएँ मारी जा रही हैं पैदा होते ही, नहीं तो दहेज़ दहन में। बावजूद बार-बार यह जतलाए जाने के कि वह शक्ति – स्वरूपा है, उसे कमजोर करने के सारे प्रयत्न किए गए हैं। वह तो सृष्टि को जन्म देने वाली है, जन्मदात्राी को मारने के नित नये षड़यंत्रा रचे जा रहे हैं। वह तो पूरे परिवार की पालक है, उसके पालन-पोषण में सबसे अधिक लापरवाही है। गृहलक्ष्मी है, उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता की क्या ज़रूरत है। गृहस्वामिनी है, किन्तु निर्णयों में भागीदारी शून्य है।
पश्चिम की अवधारणा के विपरीत जिसमें नारी प्रेयसी के रूप में पहले सम्मानित है, ‘माँ’ का दर्जा सर्वश्रेष्ठ ठहराए जाने के बावजूद उसके मातृत्व की ही हत्या की जा रही है। बात न मानने पर हल में बैल के समान जोती जा रही है। आपसी रंजिश में सरे-आम गाँव में निर्वस्त्रा घुमाई जा रही है। ‘डायन’ कहकर जिन्दा जला दी जा रही हैं। सुबह शाम जी तोड़ परिश्रम करने के बाद भी जानवरों के समान शराबी पतियों से पीटी जा रही हैं। पति से अधिक कमा कर लाने के बावजूद, मर्जी के द्वारा अपनी कमाई नहीं खर्च कर सकने की विवशता में जी रहा है।
इन सबके पीछे मूल धारणा है स्त्राी के दर्जे की प्राथमिकता व क्रम में अंतर का। स्त्राी के निजी अस्तित्व के महत्त्व को बेमानी समझाने का। मानवी के रूप में उसकी भूमिका की अस्वीकार्यता का। ‘नारी नर की प्रतिछाया है’ की सोच का। यदि पुरुष किसी का पति, पिता, बेटा, भाई, प्रेमी होकर भी पहले मनुष्य है तो स्त्राी केवल माँ, पत्नी, बेटी, बहन, प्रेमिका क्यों? वह मानवी क्यों नहीं। अपनी समस्त कमजोरियों, महत्त्वाकाँक्षाओं के साथ। सारी संभावनाओं व सीमाओं के साथ, उसके मानवीय अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह क्यों? मनुष्य व देश के नागरिक के रूप में पहचान क्यों नहीं? सृष्टि रचना में अधिकतम भागीदारी होने के बाद संसार के विकास में, देश के विकास में उसका योगदान नगण्य क्यों? परिवार के विकास में जीवन होम कर देने पर भी महत्त्वपूर्ण निर्णयों में उसकी भागीदारी क्यों नहीं? उसका स्थान केवल अनुसूचित जातियों के लिए या अछूतोद्धार के लिए कुछ विशेष प्रावधानों जैसा क्यांे? केवल कुछ विशेष योजनाएं क्यों? देश की आधी आबादी होने के बावजूद अल्पसंख्यकों से भी कम महत्त्वपूर्ण क्यों? उपलब्धियों, बुद्धि व मानवीय गुणों में हर क्षेत्रा में पुरुषों से श्रेष्ठ सिद्ध करने के बाद भी पुरुष से कमतर क्यों? दोयम दर्जे की क्यों? केवल पुरुष के उपभोग की वस्तु क्यों? केवल संतान पैदा करने की मशीन क्यों?
ये सारे प्रश्न हैं जो कमोबेश अंतर के साथ शीर्ष पदों पर बैठी, कामकाजी महिला से लेकर पढ़ी-लिखी गृहिणी को भी मथते हैं और अनपढ़ किन्तु मेहनतकश व मजदूर, खेतिहर, बर्तन मांजने वाली और गाँव की चूल्हे पर बैठी औरत को भी। और ये प्रश्न सार्वजनिक हैं, सर्वव्यापी हैं। पूरे विश्व की औरत इन विषयों पर एक है। फिर भी कहीं कोई समाधान नहीं। आवश्यकता है स्त्राी आंदोलनों को आम स्त्राी की सामूहिक आवाज बनाने की। न तो बहुसंख्यक शिक्षिताओं, अर्ध शिक्षिताओं के समान पुरुष संरक्षण अपनी सुरक्षा व बेहतरी समझने से कल्याण होने वाला है और न उनसे बराबरी का नारा बुलंद करते हुए, सभी वर्जनाएँ तोड़ निषिद्ध पुरुष क्षेत्रों में प्रवेश कर अंधेरे में तलवार भांजने से बात बनने वाली है। स्त्राी आंदोलनों की धार को भोथरा करने से इन्हीं की सर्वाधिक भूमिका है।
नारेबाजी, आंदोलनों, चर्चाओं, गोष्ठियों से नहीं, बात बनती है सकारात्मक पहल से। पहले पढ़ी-लिखी, विचारवान, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, महिलाओं की ओर से, जिनके लिए कुछ कर सकने की असीमित संभावनाएँ हैं। जो हो सकती हैं. बिटिया व बेटे की शिक्षा दीक्षा, पालन-पोषण में भेदभाव को दूर करने से। भू्रण हत्या करने, करवाने व प्रेरित करने में सहभागिता से इन्कार से। दहेज़ के लिए बहुओं को प्रताड़ित न करने से। बात बनती है विदा होती बेटी को ‘डोली में बैठकर रोते-रोते जा रही, अर्थी में लौटना, यह घर पराया हुआ, के स्थान पर ‘डोली में जा रही है किसी के कंधों पर नहीं, अपने पैरों पर खड़े होकर खुशी-खुशी आना, यह घर तेरा है, कहने से। परिवर्तन नहीं करने आने वाला ‘स्त्राी हूँ मैं क्या कर सकती हूँ’ कहने से। नूतन प्रभात होगा तभी जब कहेगी, ‘मैं स्त्राी हूँ। सृष्टि की निर्मात्राी,’ धात्राी। मैं, क्या नहीं कर सकती। कोई साथ देगा तो ले लूँगी, नहीं तो अकेली आगे बढ़ चलूँगी। जब यह होगा तभी बन्द हो सकेगी अग्नि परीक्षाएँ और समाप्त होगा दाँव पर लगना।
बाजी अपने हाथ में लेनी होगी। निर्णय का अधिकार अपने हाथ में रखकर अपनी कमजोरियों, शक्तियों की पहचान के साथ। सीमाओं और संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए। दायित्वों व अधिकारों का संतुलन बनाए रखते हुए। मातृत्व का अर्थ घर की चारदीवारी में कैद होना न मानकर परिवार, समाज व देश को सामाजिक स्थिरता देने के रूप में राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर। सामाजिक विसंगतियों को अपनी ही संस्कृति से दूर किया जा सकता है। आते से ही घर तोड़ने की, बात करके, भारत की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था संयुक्त परिवार जिसमें छुपे हैं आज की अनेक समस्याओं पर्यावरण, आवास, सामाजिक विकृतियों के निदान, पर कुठाराघात करके नहीं। विध्वंस का रास्ता अपना कर या मैडोना, माइकल जैक्सन की संस्कृति का पालन करने से नहीं। यह होगा सकारात्मक, रचनात्मक विद्रोह करने से। कबीर के विद्रोह के समान। ऊपर नीचे, दाएँ बाएँ, सब ओर कुरीतियों पर प्रहार करके। समाज के निर्माण के लिए। तभी सफल होंगे आंदोलन. और होगी बाजी उसके हाथ। आएगी उसकी बारी संसार के विकास में सक्रिय योगदान की। देश की उन्नति में सहायक होने की। अपना विकास करने की। अपनी पहचान स्थापित करने की। निर्णायक भारीदारी की।
मार्च 2000

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