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ओजस्विनी व्यूज

स्त्राी क्या है

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स्त्राी क्या है? स्त्राी तो है त्रायी में स्थित ऐसी ‘वह’ अर्थात प्रकृति सत्, रज, तम तीनों गुणों से युक्त त्रिगुणात्मक प्रकृति। स्त्राी स्वयं प्रकृति है। त्रायी जिसमें स्थित है। उत्पत्ति स्त्राी का स्वभाव है। मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक दोनों रूप से स्त्राी पुरूष से एक कदम आगे है।
शोधों ने सिद्ध किया है कि प्रकृति ने मानव को स्त्राी रूप में पैदा किया है। युवावस्था में बालक का मस्तिष्क स्त्राी मस्तिष्क है। जब हारमोन्स तथा गोनड्स का प्रभाव भ्रूण पर पड़ता है तब पुरूष का मस्तिष्क बनता है। प्रकृति के अनुसार मस्तिष्क की मूल प्रकृति स्त्राी रूप है। किसी भी वस्तु में कोई प्रभाव आवेशित अथवा आक्षेपित किया जाये तो उसका मूल रूप नष्ट नहीं होता। स्त्राी के डिम्ब अथवा अंडाशय में ओवरी अंडो (ओवम) की संख्या निश्चित रहती है। सारे जीवन में कितने ओवम स्त्राी में होंगे यह तय है। गिना जा सकता है। पुरूष के साथ ऐसा नहीं होता। पुरूष के शुक्राणुओं की संख्या असंख्य होती है। स्त्राी में एक ओवम होता है जिसका गर्भाधान हो गया तो ठीक नहीं तो नष्ट हो जाता है। स्पष्ट होता है प्रकृति ने स्त्राी पर ज्यादा विश्वास किया है तभी तो दायित्व अधिक है पुरूष पर नहीं। स्त्राी को बताया है इतनी सीमा में काम करना है और पुरूष को तुम जिन्दगी भर करते रहना। हो गया तो ठीक नहीं तो कोई बात नहीं।
नारी के भीतर खालीपन है, आकाश है। इसीलिए वह अधिक उदार है। वह शून्य ही उत्पत्ति का कारण है। इसीसे स्त्राी श्रेष्ठ है। महिला हारमोन्स के कारण स्त्राी में बीमारियों की प्रतिरोधात्मक शक्तियां अपेक्षाकृत अधिक है। प्रत्येक बीमारी में वह ज्यादा सह जाती है। महत्व केवल खाली स्थान का है। शून्य का है कमरे में खाली स्थान हो तभी तो सामान लाकर रख सकते है पर भरे घर में नहीं। यह शून्य स्त्राी में स्थित होता है।
संसार के अनेक दर्शन शून्य से उपजे है किसी ने इसे ‘पूर्ण’ कहा है किसी ने शून्य, कहीं ‘आकाश’, यह शून्यवाद है नागार्जुन, बौद्ध का। यही ‘पूर्ण’ है। शंकराचार्य का। बिना समझे करना है कर्म है कर्म का फल होता है संचित होता है।
प् िलवन कव ेवउमजीपदह लवन हमज ेवउमजीपदहण् प् िलवन कवश्दज कवए लवन हमज दवजीपदह इनज इल हमजजपदह दवजीपदहए लवन हमज मअमतजीपदहण्
यह कर्म भाग्यवाद नहीं है। वरन् कृष्ण का निष्काम कर्म है यहां कुछ नहीं है करने का अर्थ है करते हुए भी नहीं करना और नहीं करता है तो सब कुछ करता है ‘बिना पग चलाए सुनहि बिन कान्हा’ तुलसीदास (रामचरितमानस) उपनिषद् कहते है नहीं सुनते हुए भी सुनता है। नहीं करते हुए भी करने वाला मैं हूँ फल मेरे ऊपर छोड़ दें तो कर्म भी मुझे दे दें। मेरे भीतर कर्ता भाव में क्रिया की प्रतिक्रिया होगी तो फल के उत्तरदायी भी बनते हैं। मैं को केन्द्र बनाया जाये तो परिणाम/दुष्परिणाम दोनों भोगने पड़ते हैं। जब कृष्ण/ईश्वर को सोचकर कर्म किया जाये तो फल भी वही भोगेगा। अर्थात् ईश्वर को समर्पित कर्म परिणाम से प्रभावित नहीं होते। क्योंकि करने और करवाने वाला भी वही है। तो परिणाम होते हुए भी परिणाम नहीं होता। कर्ता ईश्वर को बना दिया तो ‘मैं’ समाप्त हुआ और बच गये। कृष्णापर्ण कर दिया। अच्छा करो तो, बुरा करो तो, करो तो नहीं करो तो।

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