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ओजस्विनी व्यूज

एकता यात्रा

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सागर, भोपाल, बिलासपुर व उज्जैन में दिये गये भाषणों का सार,
दिसम्बर 1991
मित्रों, अब डाॅ. मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा प्रदेश में आ चुकी है। एकता यात्रा पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगाए गए हैं। इसलिए कि विपक्षी दलों की चिंता भाजपा का बढ़ता प्रभाव है। प्रत्येक दल को अपने तरीके से यात्रा एवं संघर्ष कर अपनी पहचान बनाने का अधिकार है। राष्ट्रीयता के माध्यम से यदि देश का हित होता है तो क्या बुराई है और यही तो दलों का उद्देश्य है।
इस यात्रा की आवश्यकता इसलिए है कि कश्मीर में मेरे देश का अपमान होता है। देश के गणतंत्रा दिवस का बहिष्कार होता है और इस एकता यात्रा की आवश्यकता इसलिए आन पड़ी है कि मेरे ढाई लाख हिन्दू भाई-बहनों को बेघरबार कर दिया गया है। काश्मीर से उठी यह आग कब पंजाब, आसाम, तमिलनाडु होती हुई मेरे घर को झुलसा देगी, मुझे नहीं मालूम।
ऊपर की ओर से आने वाले दुश्मन की आहटों को पहचानिए। दक्षिण में लिट्टे व नक्सलाइट आंदोलन के रूप में आने वाले शत्राुओं के कदमों की चापों को सुनिए। पूर्व से आने वाले विद्रोही स्वरों को समझिए। और पश्चिम में पाकिस्तान से आने वाले खतरों को भाँपिए और एकजुट हो इन खतरों को सामना कीजिए।
यह एकता यात्रा इस देश को अग्निशामक बनाने के लिए है, व्यक्तिगत द्वेष की लपटों से जनसाधारण को झुलसाने के लिए नहीं। यह अभियान समता के बीज बोने के लिए है, भाई-भाई के बीच विद्वेष उत्पन्न करने के लिए नहीं। यह यात्रा है भारत देश में आस्था रखने वालों के अपनी गौरवमयी परम्पराओं के प्रति स्वाभिमान जागृत करने के लिए। भारत की अनेकता में एकता का विराट रूप दिखाने के लिए है यह एकता यात्रा। घातक परतुष्टीकरण नीति से होते आ रहे विनाशकारी परिणामों से भारत की सोई जनता को चेताने के लिए। यह बताने के लिए है कि कोई सरकार रहे ना रहे भारत एक है और एक रहेगा। भारत वोटों का समूह मात्रा नहीं। यह प्रयाण है भारतीय गरिमा की, भारतीय मूल्यों की पुर्नस्थापना के लिए खड़ी सुसज्जित सेना का।
एकता यात्रा पर शंका की गई थी कि दंगे होंगे। किन्तु यह यात्रा सफलतापूर्वक भारत के दिल दिल्ली तक पहुंची है। एक विरोध का स्वर नहीं उठा। एक दंगा नहीं हुआ। कहीं कोई फसाद नहीं हुआ। ढूंढ रहे हैं कि कोई कुछ कहें। पर विरोध में सच्चाई नहीं। इसलिये न ओज है न तेज।
‘साहस को बल दिया है मृत्यु ने मारा नहीं है,
राहें हारी हैं सदा, राही कभी हारा नहीं है।
बिजलियाँ काली घटाओं के, रोके रूकी हैं कभी।
डूबती देखी भँवर ही, डूबती धारा नहीं है।’
भारतीय जनता पार्टी के समर्थित कार्यकर्ताओं तथा युवा मोर्चा, महिला मोर्चा तथा किसान मोर्चा, की यह चतुरंगिणी कहां से कहां जा पहुंचेगी, और क्या से क्या कर गुजरेगी, आपकी यही आँखें देखंेंगी और चमत्कार का अनुभव करेंगी। इतिहास निर्माण के नवीन क्षण को लिखने के लिए निकली हैं यह केसरियावाहिनी। भारतीय इतिहास बदलने के लिए, इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठों में नाम अंकित करने के लिए बसंती चोला पहनकर निकली यह केसरिया वाहिनी देशभर में एकता को बढ़ायेगी और युग परिवर्तन की इस गाथा के आप साक्षी होंगे।
दुश्मन ध्यान से गिन लें ये सारे बाजू
ये सर, खेले जब अपनी जान पे।
अखंडता के स्वरों से आकाश गुंजायमान करेगी। आप इतनी तकलीफें सहकर जा रहे हैं। संकट होंगे और हड्डियाँ कँपाती सर्दी भी। किन्तु उफ नहीं करेंगे तकलीफ सह जाएंगे। जरूरत पड़ेगी तो प्राण न्यौछावर कर देंगे।
जिए तो जिएंगे शान से, मरे तो मरेंगे आन पे।
सीमाओं की रक्षा जवान करते हैं और हम घरों में बैठकर उनके जीवन की मंगलकामना करते हैं। देश की सुरक्षा की जवाबदारी हमारे सीमा रक्षकों के हाथ में रहती है। आज समय ने यह अवसर दिया है कि हम राष्ट्र की अखंडता की रक्षा में सक्रिय भागीदारी निभाएँ। इस ऐतिहासिक अध्याय को रचने में हमारा योगदान का सौभाग्य हमें मिला है। चैंकिए मत, प्रत्येक व्यक्ति अपने में विराट की शक्ति रखता है, और अपना विस्तार सम्पूर्ण में कर सकता है। आवश्यकता है अपने आप में बल भरने की। चाहिए दृढ़ इच्छाशक्ति, अटूट संकल्पशक्ति। जो यहां से जा रहे हैं वो तो देश की सेवा तन से धन से कर ही रहे हैं। जो नहीं जा रहे, वो धन से सहायता करें और मन से दुआएं करें। हमें आपकी भी आवश्यकता है और आपकी भी, इनकी भी और उनकी भी। बुजुर्गों के आशीर्वाद की अपेक्षा है, माताओं की आशीषों की भी कामना है और बहनों की मंगलकामनाओं की भी। वीरों की जरूरत है और वीरांगनाओं की भी। बाहुबल की भी आवश्यकता है और धनबल की भी और साथ ही भारी मनोबल की भी। राणाप्रताप भी चाहिए और भामाशाह भी।
रणजीत सिंह को याद करिए, शहीद भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरू, बटुकेश्वर दत्त, वीर सावरकर की कुर्बानियों को स्मरण करिए। सुभाषचन्द्र बोस की ललकार को ताजा करिए। सरदार पटेल की हुंकार को गुनिए। पंजाब केसरी लाला लाजपतराय की दहाड़, विपिनचन्द्र पाल के गर्जन, लोकमान्य तिलक की याद ताजा करिए।
आज तक होठों पर बेनाम अनचाही खामोशी के ताले थे। आँखों में विवशता की बेचारगी थी। नेतृत्व की तलाश थी पर दिशाहीनता थी। डाॅ. जोशी ने आपको यह स्वर्णिम अवसर दिया है। देश पर मर मिटने की दिशा दी है। राष्ट्रीय पहचान कायम रखने के लिए आपकी भागीदारी का आह्वान किया है। देश की अखंडता के महायज्ञ में आहूति के लिए आपके पौरूष को ललकारा है और नतीजा आप देख रहे हैं। अब हमारी आवाजें बुलंद हैं। आँखों में वीरानी की जगह चमक है। दिल में जोश है और मन में कुछ कर गुजरने की ललक है।
इस विशाल केसरिया वाहिनी के आज यहां एकत्रित होने के कारण किसी राजनैतिक लक्ष्यों की सिद्धि नहीं है वरन् उसके मूल में छिपा वह तथ्य, वह सत्य है जो देश में हमारी निष्ठा व आस्था को प्रकट करता है। देश पर कुर्बान होने को आतुर इन दीवानों की प्राणवान ऊर्जा, हमारे लक्ष्य की सच्चाई है। आप हमारे अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने की संकल्पशक्ति हैं। कार्य कठिन लगता है किन्तु एक टिमटिमाता दीपक समस्त अंधकार को चुनौती देता है, अकेले भागीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर उतारा था। अकेले हनुमान ने समूची लंका को उजाड़ा था।
आज तक हम में कुछ कर गुजरने की इच्छा थी, पर इच्छा रहते हुए भी कुछ न कर पाने की छटपटाहट थी, कसमसाहट थी। डाॅ. मुरली मनोहर जोशी ने वही संकल्प लिया है। मनोहर की मुरली अब देश भर में विषमता तथा अलगाववाद के विष को समाप्त करते हुए कालिया नागों का मर्दन करने के लिए जोश से बज उठी है-
‘सुनो व्रत ले लिया हमने, तिरंगा लाल चैक में फहरायेंगे।
और नन्दन कानन की धरती को मुक्त हम करायेंगे।
मनुष्य के सो गए सौहाद्र्र को जगायेंगे।
बँट गए आँगनों में प्यार की तुलसी उगायेंगे।
केसर की क्यारियाँ फिर से महकायेंगे।
झेलम के लाल पानी में प्रेम के शिकारे तैरायेंगे।
धारा 370 हटा, जब समता की गंगा हम बहायेंगे।
अनन्तनाग के बंद शिवालयों की घंटियाँ फिर से बजायेंगे।
अमरनाथ के औघड़ को फिर से जगायेंगे।
सुनो व्रत ले लिया हमने तिरंगा, लालचैक में हम फहरायेंगे।
इस देश का इतिहास साक्षी है कि जब-जब कोई महत्वाकांक्षी योद्धा, विश्व विजय की आकांक्षा लिए इस देश में आया, उसने इस देश को या तो लूटा खसोटा और चला गया। फिर इस देश को गुलाम बना लिया। कैसी विडम्बना है हम लोग कुछेक अपवादों को छोड़कर तभी तक आजाद रहे, जब तक कि कोई अन्य महत्वाकांक्षी योद्धा यहां आया नहीं। क्या कारण है, कि इस देश की कोटि-कोटि जनता देश के विभिन्न भागों में हो रही घटनाओं से निर्विकार रहती है? सीमाओं पर क्या होता है, हमें उससे कोई सरोकार नहीं रहता।
इतिहास में इस बात के ज्वलंत साक्ष्य है कि जब-जब हम टूटते रहे, क्षणिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय हितों की आहूति देते रहें, तब-तब राजनैतिक क्षुद्र स्वार्थों के सम्मुख राष्ट्र बौना होता रहा। हम खंड-खंड होते रहे, देश लुटता रहा, जलता रहा, गुलाम होता रहा। हमारे धर्मस्थलों पर प्रहार होता रहा, हम आपस में लड़ कर शक्ति बर्बाद करते रहे। गांव-गांव उजड़ते रहे, दुश्मनों की चालें सफल हुईं और हम एक दूसरे की काट करते रहे। जब तक हम एक होकर स्वयं को कश्मीरी, पंजाबी, मद्रासी, बिहारी, गुजराती से ऊपर होकर भारतीय नहीं मानेंगे, तब तक इस देश की अस्मिता पर इसी प्रकार प्रहार होता रहेगा। इस देश की अखंडता खतरे में पड़ती रहेगी।
इतने दुःख के साथ कहना पड़ता है कि ऐसा कोई देश नही है कि जिसकी अस्मिता व प्रभुसत्ता पर इतने प्रहार हुए फिर भी जिस देश के लोग अपनीे सीमाओं की सुरक्षा व स्वतंत्राता की रक्षा से तटस्थ व निर्विकार हों। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लोग प्रहार करते हैं। किन्तु राष्ट्र भक्ति को समर्पित संघ, इसी शक्ति को बर्बाद होने से बचाना चाहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी राष्ट्रीयता के भाव को जगाना चाहता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसी तटस्थता को समाप्त करना चाहता है।
त्वरित लाभ, क्षुद्र व छोटे स्वार्थ, तात्कालिक राजनैतिक हितों की पूर्ति व रक्षा के लिए किए गए समझौते और तुष्टीकरण कभी लाभप्रद नहीं होते। बिना समस्या के मूल में जाए, देश के हितों को ध्यान में न रखते हुए, अदूरदृष्टि से किए गए समस्या के तात्कालिक निदान, देश को विनाशकारी प्रलय के ज्वालामुखी में झोंक देते हैं। उसके सीने में शांति व सुख का संदेश नहीं, लाखों लोगों की समस्याएं, पीड़ाएं व आहें छिपी होती हैं। वो कब जागृत हो शोले बन सबको सर्वनाशी ग्रास में लील सकते हैं, यह कोई नहीं जानता। आतंकवाद की ये लपटें शीघ्र बुझने वाली नहीं हैं। आने वाले समय की भयावहता से बचने के लिए एकता यात्रा चेतावनी है।
इस देश ने कभी किसी दूसरे देश पर विश्व विजय की आकांक्षा से अभियान नहीं किया। हां, ‘धम्मविजय’ इस देश में अवश्य हुईं सांस्कृतिक अभियान के झंडे इस देश ने अवश्य गाड़े क्योंकि इस देश का धर्म किसी पूजा पद्धति, उपासना पद्धति से संबंधित नहीं। इस देश का धर्म जीने का तरीका है। इस देश का धर्म एक ही रहा है भले ही भिन्न रूपों में प्रकट होता रहा हो। वह है ‘जियो और जीने दो’। हम जीते हैं और दूसरों को जीने देते हैं।
किन्तु याद रहे कि जब-जब हमारी सहिष्णुता, कायरता में बदलती रही और सहनशीलता, आलस्य का रूप धारण करती रही, देशहित कुर्बान हुए। जब-जब हमारी मानवीय सहानुभूतियां, पड़ोसी के दुःख-दर्द से निरपेक्ष, तटस्थता में परिवर्तित होती रही, तब-तब इस देश को बहुत-बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। इसी तटस्थता के कारण काश्मीर के सारे हिन्दू बेघरबार कर दिये गये और सरकारों के कानों पर जूँ नहीं रेंगी। इतिहास आखिर हमें क्या बताता है? क्या वह नहीं बताता कि यदि इस प्रकार की घटनाएं होंगी तो अमुक परिणाम होंगे? इतिहास केवल उन तथ्यों का लेखा-जोखा व विवरण मात्रा नहीं है कि मनुष्य ने क्या खाया पिया, क्या किया और क्या पहना। वह तो इसलिए है कि हम उससे सीखें। इतिहास बताता है कि हमारे पूर्वजों ने बुद्धिमानी से काम लिया और देश को एकसूत्रा में बांधा तो इस देश की समृद्धि बढ़ी। धन धान्य तथा वैभव में वृद्धि हुईं कला व धर्म का विकास हुआ और यह देश सोने की चिड़िया कहलाया। किन्तु इतिहास यह शिक्षा भी देता है जब-जब हम आपस में बंटते रहे, खंड-खंड होते रहे, यह देश पतन के गर्त में जाता रहा। यह एकता यात्रा इसलिए है कि कोई हमारी सहिष्णुता को कायरता ना समझें।
यह देश एक कैसे है, इसका सर्वाधिक पुष्ट प्रमाण हमें भारतीय कला व धर्म से मिलता है और मिलता है प्रत्येक हिन्दू के घर से। भले ही वह किसी भी जाति का हो, ब्राह्मण हो या क्षत्रिय, वैष्णव हो या शैव, गणपत्य हो या शाक्त, हर घर में शिव का चित्रा भी है और विष्णु का भी। सरस्वती का भी और विष्णुप्रिया लक्ष्मी का भी। महिषा मर्दिनी दुर्गा का भी और शिवा का भी। यह तथ्य पूर्व से पश्चिम तक तथा उत्तर से दक्षिण तक सर्वविदित है। जैन घरों में शिव, विष्णु के चित्रा पूजाघरों में अवश्य न मिलते हों, शेष घर में उनके कैलेण्डर लगाने, मूर्तियां लगाने में कोई आपत्ति उन्हें नहीं होती। दीपावली पर गणेश व लक्ष्मी की मूर्तियां वे भी पूजते हैं।
बड़ा आश्चर्यजनक है यह तथ्य कि दक्षिण में वाकाटकों के काल में अजंता एलोरा महाराष्ट्र में जो चित्रा व मूर्तियां बनीं उसी समय, उसी प्रकार की बाघ, (धार) मध्यप्रदेश में भी बन रही थी। ग्यारसपुर, खजुराहो आदि के जैन मंदिरों की बाह्य भित्तियों पर ब्रह्मा, विष्णु, महेश की मूर्तियां, रथिकाओं में सप्त मातृकाओं की प्रतिष्ठा इसी एकता का प्रतीक है। जब शैवों वैष्णवों का संघर्ष होने की नौबत आई तो आचार्यों ने हरिहर की कल्पना कर ली। सूर्योपासकों व शैवों में झगड़ा हुआ तो रूद्रभास्कर की परिकल्पना हो गईं शिव के मंदिर में ब्रह्मा व विष्णु बैठे और विष्णु के मंदिर में ब्रह्मा व शिवजी।
देशभक्ति, देशप्रेम क्या है। एक भावना ही तो जिसका कोई निश्चित रूप रंग, आकार नहीं होता। ठीक फूलों की खुशबू और बहती हवाओं की तरह, वह मन में बस जाता है। माँ के पुत्रा के प्रति अकारण, निश्चल स्वार्थहीन प्रेम की तरह, देश प्रेम भी अकारण व स्वार्थरहित होता है। और जिस प्रकार ममत्व के कारण यह सृष्टि कायम है देशप्रेमियों की निष्ठा से ही भौतिक जगत के कार्य व्यापार को चलाने के लिए कोई देश-देश रहता है। बहुत विचित्रा है यह देशप्रेम जो कोई ठोस वस्तु तो है नहीं कि कोई देश को पकड़ ले, छू ले। ना ही वह कोई एक घटना है कि इतिहास पुस्तकों में वर्णित हो, पर देश तो ऐसी याद है जो व्यक्तिगत् नहीं, जो किसी एक व्यक्ति या एक जीवन तक सीमित नहीं बल्कि, उन सभी पिछले जन्मों तक उसी धरती पर विस्तृत है जहां हमारे पूर्वज रहे। इन सबके प्रयासों के साथ वह देश हमारा देश होता है। देश की नदियों से लगाव, पहाड़ों से प्रेम, इंच-इंच माटी से प्यार, पत्थरों से स्नेह यह केवल एक देश में ही संभव है। एक अजीब सी पवित्राता होती है देशपे्रम के भाव में। और यह भाव समर्पण से आता है। अनन्य भक्ति से आता है। देशभक्ति का भाव इसीलिए काव्यमय, गंभीर तथा अपने प्रभाव में अत्यधिक समृद्ध होता है।
देशभक्ति की भावना क्यों कर, कैसे और कब जन्म लेती है नहीं मालूम। जब पहली बार तिरंगे का महत्व जाना, मन में सम्मान हुआ। जब सुखदेव, राजगरू और भगतसिंह के गले में डलते फंदों को देखा और जब पढ़ा कि गांधीजी को प्रथम श्रेणी में टिकट रहने पर भी उतार दिया गया क्योंकि गोरी नहीं काली चमड़ी वाले थे तो कैसे उनकी हिम्मत हुई, यह सोचकर खून खौल जाता था। या जब ये सुनते थे कि मेरठ में, कम्पनी बाग की इस सड़क से भारतीय गुजर नहीं सकते थे। रगों में उबाल आने लगता था। या जब काली पल्टन का मंदिर जहां मंगल पांडे ने प्रथम स्वतंत्राता संग्राम का सूत्रापात किया था, के बारे में सुनते थे। यह क्या बात है? क्या यह वह तरंग है जो फिल्मों में वृत्तचित्रों (कवबनउमदजंतपमे) में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को ऊपर जाते तथा यूनियन जैक को नीचे उतरते देखकर हृदय में उठती है। क्या यह वह भाव है जो 26 जनवरी, गणतंत्रा दिवस के अवसर पर सेना के तीनों अंगों को सलामी देते हुए, उनकी कवायद देखकर दिल में उत्पन्न होती है, या यह वह आह्लादित करने वाला भाव है जब स्कूल के बच्चे अपने हाथों में लिए तीन रंगों के झंडों के द्वारा इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं कि भारत का नक्शा बन जाता है। ये भावनाएँ सबके मन में निश्चय ही एक प्रकार से उठती हैं वह कश्मीरी, मद्रासी हो या पंजाबी, गुजराती हो या बिहारी। यदि इन भावनाओं को कोई रूप या रंग दिया जाता तो यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि इसका एक ही रंग होता और एक ही स्वरूप। क्योंकि वह देशप्रेम की भावना है। वह राष्ट्रीयता है, राष्ट्रभक्ति है। जिस व्यक्ति में यह भावना उत्पन्न नहीं होती वह राष्ट्र से प्रेम नहीं करता। उसे इस राष्ट्र से भरण पोषण पाने का अधिकार नहीं है। वह इस माटी से अन्नजल ग्रहण करने का अधिकार नहीं। यह भाव कि इस पुण्य भूमि-मातृभूमि में पुनः पुनः जन्म लें और मरकर पुनः उसी माटी में बिखर जाएं ; सभी में होना चाहिए।
क्या कश्मीर को या कश्मीर के किसी भी अंग को, उसके अतीत से अलग किया जा सकता है? क्या विस्मृत किया जा सकता है कि कश्मीर में शैव सम्प्रदाय अपने चरम विकास पर पहुंचा? सम्राट ललितादित्य की उपलब्धियों को क्या भूला जा सकता है? एक देश केवल उन लोगों से नहीं बनता है जो आज जीवित है बल्कि उनसे भी, जो आज हमारे मध्य नहीं है। कैसे भूल जायेंगे कलहण की राजतरंगिणी। कैसे भूल जाएं इस सबको? कैसे न याद रखें उन सारे शैवाचार्यों को, जो कश्मीर की भूमि में जन्में? अभिनवगुप्ताचार्य को, नागार्जुन को। क्या भूलें और क्या याद रखें?
कोई भी राष्ट्र युद्ध में प्राप्त की गई विजयों से ऊँचा नहीं उठता। ऊँचा उठता है अपने जीवन मूल्यों से। आदर्शों से, प्रखर राष्ट्रीयता की भावना से। अमेरिकी स्वतंत्राता का युद्ध एक ही नारे पर लड़ा गया था-डल ब्वनदजतलए तपहीज वत ूतवदहण् अमेरिका ज्वलंत उदाहरण है अनेक प्रकार की जातियों, नस्लों के एक स्थान पर मिलने का। विविध धर्मों की सहिष्णुता का। ना वहां समान भाषा थी, ना एक इतिहास था। न ही समान संस्कृति और ना ही समान पूर्वज। किन्तु वह देश जन्मा उस समान विचार से, जो व्यक्तिगत स्वतंत्राता तथा सहनशीलता से उपजा था।
अपने समय का सिकंदर, नेपोलियन 1812 में केवल इसलिए नहीं हारा था, कि उसकी उच्चतर होती महत्वाकांक्षाओं के पर आसमान छूने लगे थे वरन् इसलिए भी कि उसे एक नई ताकत का सामना करना पड़ा था। वह थी राष्ट्रवाद की भावना। जिसका प्रचार स्वयं नेपोलियन की सेनाओं ने किया था। जो बात उन्हें 1789 की फ्रांस की क्रांति नहीं सिखा सकी, वह बात उन्हें नेपोलियन ने सिखाईं राष्ट्रीयता, जो कि संगठित शक्ति का प्रतीक थी। महत्वपूर्ण है वह जो हमें जोड़ता है न कि वह जो हमें तोड़ता है। राष्ट्र पृथक्तावादी सिद्धांतों पर नहीं, संगठित शक्ति पर जीवित रहते हैं। रूस की शक्ति आज आधी भी नहीं रह गई है।
मित्रों, आज झेलम का पानी खून से लाल है, कभी जहां मनमोहक शिकारे चलते थे। अनंतनाग शमशान की तरह खामोश है, जहां कभी शिव मंदिरों की घंटियाँ बजती थी। अमरनाथ के रास्ते बंद हो गए हैं-उसका विवाद बढ़ता जा रहा है। कश्मीर की बर्फीली उच्च चोटियाँ जो दूरस्थ के यात्रियों को निमंत्राण देती थी, आज संगीनों के साए में गिरफ्त है। डलझील में खड़े खूबसूरत हाउस बोटों में, जो कभी आप-हम सबके कहकहों से आबाद रहते थे, अब सन्नाटा है।
अजब यंत्राणाओं से गुजर रही है चन्दन कानन की वादियां। केसर की क्यारियां उजड़ गई हैं। मेरे काश्मीर में मौत का सन्नाटा है। आपको याद दिलाना चाहती हूं कि काश्मीर, भारत माता का मौलिमुकुट काश्मीर आज लगभग हाथों से जा चुका है। सेना के बल पर आज वह आपके साथ है। काश्मीर हमारी शान है। हमारी आन है। हमारा कोहिनूर अंग्रेज ले गए हमने चुपचाप सह लिया। लेकिन भारत माँ के असली कोहिनूर को जाने नहीं देंगे। मत सोचो काश्मीर दूर है, हमारा क्या है, हमसे क्या रिश्ता है। अकेली दिल्ली जीती गई थी और पूरे देश ने हजारों वर्षों की गुलामी भुगती थी। समय आया है कि आप चेते और देखे और कहें कि स्वतंत्रा भारत में नहीं सहा जायेगा यह भेदभाव।
तिरंगे का अपमान हमें मंजूर नहीं।
यह विकृत तुष्टीकरण हमें स्वीकार नहीं।।
तुम्हारी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता हमें भाती नहीं।
हिन्दुस्तान में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे नहीं लगेंगे।
ये हमारा हिन्दुस्तान है पाकिस्तान नहीं।।
धर्म के नाम पर, हिन्दू को छोड़, अन्य कोई कुछ भी कर सकता है। देश रहे ना रहे, उनकी धर्मनिरपेक्षता रहे। काश! कांगे्रस ने कहीं, कभी भी एक यात्रा निकाली होती, ढाई लाख बेघरबार हिन्दुओं के पक्ष में। वोटों के सौदागरों-
छोड़ो अब यह तुष्टीकरण की नीति।
यदि चाहते हो हिन्दू-मुस्लिम प्रीति।।
तो कह दो सरे आम, समान होगा भारतीय दंड विधान।
काश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है हिन्दुस्तान।।
देश का ध्यान धरो। आह्वान् करती हूँ आप सबका श्रीनगर जाने के लिए। अब तो बस यही कहना है-
‘हर नगर, गाँव, शहर हर गली में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
बहुत सो चुके, बहुत हो चुका,
अब सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में न सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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