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ओजस्विनी व्यूज

हम संकल्प कब लेंगे?

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11 सितम्बर 2001, अमेरिका की शान न्यूयार्क स्थित वल्र्ड टेªड सेंटर के ट्विन टाॅवर्स, आन पैंटागन तथा मान व्हाइट हाउस पर हमला। आतंकवाद की चरम परिणिति। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, 21वीं सदी के प्रथम वर्ष की प्रथम त्रासदी। स्वयं-भू महाशक्ति के अभेद समझे जाते रहे रक्षा कवच का भेदन। सभी संवेदनशील देशों को इस घटना पर गहरा क्षोभ था और अमेरिका से सहानुभूति थी। किन्तु पीड़ित अमेरिका ने इस दुःख को क्रोध में और क्रोध को आतंकवाद को विश्व से नेस्तनाबूद करने के संकल्प में परिवर्तित कर डाला, साम-दाम- दण्ड-भेद से, रणनीति से। आर्थिक प्रतिबंधों से। घेराबंदी से। दबाकर। धमका कर। फुसला कर। प्रलोभन देकर। चाहे जैसे। आहत और घायल अमेरिका ने पूरा कर दिखाया अपना संकल्प 1 मई 2011 को 40 मिनट के अंदर आतंकवाद के मुखिया ओसामा बिन लादेन को गोलियों से भूनकर!
यह घटना न अप्रत्याशित है और न ही प्रथम और न अंतिम। यह होना ही था। इससे बहुत-सी बातें स्पष्ट हुईं। प्रथमतः यह कि कोई राष्ट्र, व्यक्ति या धर्म जब अपने को स्वयं-भू समझने लगता है तो आमंत्रित करता है विनाश को। हिटलर हो या लादेन, अमेरिका हो या जापान, इसाईयत हो या इस्लाम, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, सर्वशक्तिमान अथवा सर्वज्ञ समझने के, घनीभूत घमण्ड के कारण ही जेहादों तथा विश्वयुद्धों में उलझा है विश्व। इस जेहादी मानसिकता से निपटना सरल नहीं है। इसलिए वे सभी प्रयास अभिनन्दनीय हैं जो आतंकवाद के विरुद्ध हैं। यही कारण है कि जुट गये थे इस लड़ाई में विश्व के अधिकांश देश, अमेरिका का सहयोग करने के लिए। आतंकवाद से पीड़ित भारत ने भी दिया समर्थन, जिसके 53000 से भी अधिक नागरिक मार दिये गये, 4 लाख से भी अधिक कश्मीरी पंडित शरणार्थी बनने पर विवश किये गये और फिर भी जिसकी गुहार पर अमेरिका सहित किसी भी देश के कानों में जूं नहीं रेंगी।
निश्चय ही अमेरिका ने बिना बौखलाये, गरल का घूंट पीकर, अवसर की गंभीरता के अनुरूप, सुविचारित और सुनियोजित ढंग से इस सामरिक अभियान को संचालित करने के लिए शतरंज के मोहरे बिछाये थे। किन्तु प्रश्न है कि क्या आतंक के जनक पाकिस्तान को साथ लेकर आतंकवाद खत्म करने का संकल्प पूरा हो सकेगा? 11 सितम्बर की तर्ज पर पहले जम्मू-कश्मीर विधानसभा भवन और फिर मुम्बई हमलों के रणनीतिकार पाकिस्तान को सजा देने, जैस-ए-मोहमद, लश्करे तैयबा जैसे गुटों को प्रतिबंधित करने, खूंखार आतंकवादी अजहर मसूद को भारत को सौंपने का दबाव बनाने के बजाए पाकिस्तान को नित नये आर्थिक पैकेजों से पुरस्कृत करके क्या दुनिया से आतंकवाद समाप्त करने की सारी घोषणाएं, संकल्प, अभियान बेमानी नहीं हो जाते? क्या भेदभाव और नस्ल भेद पर आधारित युद्ध के सार्थक परिणाम हो सकते हैं?
अमेरिका की अवसरवादिता, दोमुंहापन, स्वार्थीपन जागजाहिर है। यदि बुद्ध की प्रतिमाएँ तोड़ने वाले तालिबान और लादेन मानवता के दुश्मन हैं तो यह भुलाया नहीं जा सकता कि उसको बढ़ावा अमेरिका ने ही दिया है और वह केवल इसलिए कि अमेरिका की दादागिरी कायम रहे। वैश्वीकरण के इस दौर में किसी को भी दादागिरी का इतना आग्रह क्यों हो? सभी लोकतांत्रिक देशों की संप्रभुता की सुरक्षा, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद की चिंता का विषय क्यों नहीं है? संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य देश क्यों श्रीनगर, भारतीय संसद और मुम्बई हमलों पर चिंतित नहीं हुए और किसी क़ा बयान पाकिस्तान के विरुद्ध नहीं आया। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि अमेरिका और पश्चिमी देशों के स्वार्थ पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं।
किन्तु क्या हम भारतीयों की चिंता का विषय भी यह नहीं होना चाहिए? क्या केवल बयानबाजी और यह गीदड़ भभकी देने से कि हमारे सब्र का प्याला भर रहा है, पाकिस्तान जैसे बर्बर जेहादी मानसिकता वाले देश डर जाएंगे? क्या उन्हें सबक सिखाने की आवश्यकता नहीं है? वह अहिंसा और सहिष्णुता जो और अधिक हिंसा और असहिष्णुता को जन्म देती हो, औचित्यहीन है। निरर्थक है वह सहनशीलता जो अफजल गुरू और कसाब को फाँसी देने में कोताही बरतती है।
क्या कोई भी देश किसी दूसरे देश पर निर्भर रहकर आगे बढ़ सका है? अपनी रक्षा कर सका है? वह केवल गुलाम हुआ है। जैसे कि हम होते रहे हैं। आवश्यकता है हमें भी इन निर्मम हत्याकांडों पर दुःखी होने की, दुःख को क्रोध में और क्रोध को संकल्प में बदलने की। तभी मिल सकती है आतंक से मुक्ति और हो सकती है शांति की स्थापना।
देश के व्यापक हित में कहीं ज्यादा कठोर निर्णयों की आवश्यकता है। जो स्वयं अपनी रक्षा करते हैं भगवान भी उन्हीं की रक्षा करता है। उन्हीं के साथ विश्व भी खड़ा होता है, कायरों के साथ नहीं। यदि निकृष्ट धार्मिक संवेदनाओं को महिमा मंडित करके जेहाद के नाम पर नरसंहार किये जा रहे हैं तो देश के निर्दोष नागरिकों और सीमाओं की सुरक्षा हेतु शस्त्रा उठाने के संकल्प का समय भी आया गया है।

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