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ओजस्विनी व्यूज

न्याय जैसा दिखे वैसा हो भी

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देश के शीर्ष पदों पर बैठी महिलाएँ मुख्य सचिव भी बन चुकीं, प्रमुख सचिव भी बन चुकीं, विदेश सचिव भी बन चुकीं और महानिदेशक पुलिस भी। एस.पी., कलेक्टर की बात तो सामान्य है, लेकिन अब बारी थी प्रशासनिक सेवाओं के शीर्षस्थ पद कैबिनेट सचिव पर किसी महिला के पदस्थ होने की। पूरा देश टकटकी लगाकर देख रहा था कि देखते हैं सोनियाजी महिला हैं, उनकी सरकार है, करेंगी कुछ महिलाओं के लिए। अभी तक तो कहती रही थीं। नहीं कर पाईं। चाहती होंगी शायद, लेकिन राजनैतिक विवशताओं ने सम्भवतः हाथ बाँध दिए होंगे। किन्तु नहीं बना सके प्रशासनिक सेवाओं में आज की तारीख में वरिष्ठतम महिला को केबिनेट सचिव। रह गईं रेवा नैयर। यह आभास बहुत दिनों से बहुत लोगों को था। नहीं बनने देंगे एक महिला को कैबिनेट सचिव ओर स्वतंत्राचेता, निर्भीक, स्पष्टवादिनी रेवा नैयर को तो कतई नहीं। कांगे्रस भले ही कितना भी डंका बजाती रहे कि वो महिलाओं की पक्षधर है, महिलाओं के हितों में काम करना चाहती है, राजीव गांधी ने पंचायतों, स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण दिया आदि-आदि। लेकिन आरक्षण को छोड़कर अभी तक तो और कोई कार्य महिलाओं के लिये हुआ नहीं। इसका कारण सरकार नहीं है। सरकार कोई सी भी हो सकती है। इसका मुख्य कारण है वह मानसिकता जो कहीं न कहीं, किसी न किसी स्तर पर महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकती है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रधानमंत्राी बिरले ही होंगे जिन्होंने चोखिला अय्यर को देश की प्रथम महिला विदेश सचिव बनाने का साहस किया। उन सब तर्कों को परे रखते हुए कि उन्होंने कभी कोई महत्वपूर्ण महकमा नहीं संभाला। ‘कोई संभाले कैसे, जब तक दिया न जाए’ यही उत्तर दिया था और ये उनका दोष नहीं है। यही कहते हुए चोखिला अय्यर चूंकि वे विदेश सेवा में वरिष्ठतम थीं उनकी नियुक्ति विदेश सचिव के पद पर कर दी। लेकिन शायद इस प्रधानमंत्राी में नहीं था यह साहस इसलिए ढूंढ़ लिया बहाना, निकाल लिया रास्ता, दो साल की जगह तीन वर्ष का कार्यकाल कर दिया गया और विवादों से बचने के लिए निवर्तमान होने जा रहे चतुर्वेदी जी को दे दिया एक्सटेंशन एक साल का। कौन पूछे कि न्याय कहाँ है? वरिष्ठता का मतलब क्या है? यही ऐसा ही करना होता है तो वरीयता की आवश्यकता ही क्या है? लोग प्रशासनिक अधिकारियों से राज्य व केन्द्र में जिम्मेदार पद पर बैठे नौकरशाहों से न्याय पाने की आशा रखते हैं। जब इन्हीं लोगों को न्याय न मिले तब औरों को न्याय कहां मिलेगा। अंधेर नगरी और चैपट राजा देखने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। उदाहरण पर्याप्त हैं, और ऐसा नहीं है कि यह अन्याय करना किसी सरकार की बपौती है। सब करते हैं अपने-अपने समय में, अपनी-अपनी सुविधानुसार न्याय हो या न हो। कानूनन दिखना चाहिए कि वो है। पर क्या आवश्यकता केवल इतनी है। आवश्यकता है न्याय वास्तव में और हुआ हुआ दिखे।

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