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ओजस्विनी व्यूज

पार्थसारथी आडवाणी

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यथा नाम तथा गुण को सार्थक करते हुए अतुलनीय यात्राी लालकृष्ण आडवाणी ने जिस प्रकार अटलजी को भाजपा का अर्जुन बनाकर, स्वयं सारथी बनना स्वीकार किया है, वह स्वतंत्रा भारत की राजनीति में अद्वितीय है। इस महारथी ने ही पार्टी के रथ को, अपने कुशल नेतृत्व तथा दूरदृष्टि के चलते, दुरूह रास्तों तथा उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर संचालित करते हुए, 2 से 86, 86 से 120 और 120 से 161 तक की यात्रा करके सत्ता के निकट लाकर खड़ा किया है। और इसका माध्यम बनी हैं, आडवाणी जी की वे यात्राएं, जिन्होंने भाजपा का जनाधार बढ़ाया . . . सत्ता से निरपेक्ष साक्षी भाव से बढ़ता रहा है यह रथी। अर्जुन को इन्द्रप्रस्थ के सिंहासन पर बिठाने के लिए। अर्जुन तब भी कृष्ण से अभिभूत था और आज के अर्जुन को भी सारथी के महत्व का अहसास है . . .
भ्रष्टाचार की अतिवृष्टि तथा राजनैतिक अस्थिरता में डूबते हुए सारा देश जिस प्रकार घबरा कर भारतीय जनता पार्टी की ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगा है, तो इसका अधिकांश श्रेय भारतीय जनता पार्टी के (मई 1984-1990 तथा अगस्त 1993 से 1998 तक) अध्यक्ष रहे लालकृष्ण आडवाणी को है। दृढ़ निश्चयी, सिद्धान्तप्रिय आडवाणी जी की छवि एक कट्टरवादी हिन्दू के रूप में भले ही उभरती रही है। किन्तु हृदय से नवनीत से कोमल आडवाणी की यही छवि भाजपा की आधारभूत शक्ति है।
भाजपा का रथ जब-जब संकटों में फंसा है, तब-तब लालकृष्ण आडवाणी ही उसके उद्धारक के रूप में अवतरित हुए हैं। दोहरी सदस्यता के विरूद्ध पारित प्रस्ताव, 12 मार्च 1980, के विरोध में जनता पार्टी से अलग होकर जनसंघ गुट ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की थी। 6 अप्रैल 1980 को मुंबई में भाजपा के प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने कट्टर हिन्दुत्व दृष्टिकोण को त्याग कर गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया था।
किन्तु ढुलमुल उदारवादी छवि भाजपा को रास नहीं आईं इंदिरा गांधी की असमय हत्या से उपजी सहानुभूति लहर ने रही-सही कसर पूरी कर दी। 1985 के आम चुनाव में वह बमुश्किल 2 सांसद ही संसद में भेज पायी। मई 1984 में अध्यक्ष बने, लालकृष्ण आडवाणी पार्टी की रीति-नीति पर पुनर्विचार कर और अनेक लोगों की मान्यता के अनुरूप पुराने हिन्दुत्व के स्वरूप पर लौटने को बाध्य हुए।
मार्च 1985 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आडवाणी जी की सलाह पर अगले पांच वर्षों के लिए कार्यकारी दल बनाया गया, जिसकी रिपोर्ट पर, जनसंघ के अतिवादी हिन्दू दृष्टिकोण को, कम तीव्रता के साथ दीनदयाल जी के समग्र मानवतावाद के साथ सम्मिलित करके अपनाया गया।
इस समय धर्मनिरपेक्षता की धुंध देश पर छायी हुई थी। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली कांग्रेस के तत्कालीन सर्वेसर्वा राजीव गांधी ने शाहबानो प्रकरण में अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के कारण हाथ से फिसल गये बहुसंख्यकों को अपनी ओर करने के लिए राम मंदिर के ताले खुलवाकर, वहां भव्य मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास किया था। किन्तु इससे पहले कि राजीव गांधी समझ पाते, विश्व हिन्दू परिषद् ने घर-घर से राम शिलाओं को लेकर राम मंदिर मुद्दे को देश के हिन्दुओं का मुद्दा बना दिया और हिन्दुत्व का कार्ड चला गया भाजपा की झोली में। कांग्रेस मुसलमानों को ही रिझाती रह गईं। आहत हिन्दुओं को लगा भाजपा ही उसके स्वाभिमान को सहला सकती है और राष्ट्र के गौरव को लौटा सकती है।
1989 के लोकसभा चुनाव में जब पत्राकार व राजनैतिक पर्यवेक्षक मुश्किल से 25 सीटें भाजपा को देने की घोषणा कर रहे थे, आडवाणी जी अति आत्मविश्वास से जनता दल से 200 सीट की मांग कर रहे थे। तब पालमपुर, हिमाचल प्रदेश अधिवेशन, 1989 में आडवाणी जी ने उस समय भी अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्राी के रूप में प्रस्तुत करके, कुर्सी की दौड़ से अपने को अलग सिद्ध किया। साथ ही विश्व हिन्दू परिषद् तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रयासों से जागे हिन्दुओं का राजनैतिक नेतृत्व करने का संकल्प उन्होंने लिया कि जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप भाजपा भारतीय राजनीति में सत्ता के बीच में एक स्थिर केन्द्र बिन्दु के रूप में प्रभावी भूमिका अदा करेगी।
ऐसा ही आडवाणी ने किया भी। रामशिलाएं भाजपा का सुदृढ़ आधार स्तम्भ बनीं। आडवाणी का विश्वास सच निकला। 1989 के लोकसभा चुनावों में 86 सीटें मिलीं तथा 4 राज्यों में भाजपा सरकारें बनीं। मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा हिमाचल प्रदेश में पहले तथा एक साल बाद उत्तरप्रदेश में। यद्यपि रामो-वामो के दलों ने साथ में चुनाव लड़ने से इंकार किया था तथापि जनकांक्षाओं के अनुरूप अपनी प्रभावी भूमिका का वायदा निभाते हुए, भाजपा ने सत्ता से बाहर रहकर, वी.पी. सिंह की सरकार को खुले दिल से समर्थन दिया।
किन्तु यह तो आडवाणी के विजय अभियान का प्रथम चरण था। विजय यात्रा प्रारम्भ होना तो शेष थी। इसके लिए की गयी अनूठी कल्पना। राम जन्मभूमि के नाम पर हिन्दुत्व की भावना जगाने व राष्ट्र को संगठित करने के लिए, देशवासियों से जीवंत संपर्क करने की। यात्राओं के माध्यम से। पारम्परिक ढंग से। जैसे करते थे देश की अखंडता को सुरक्षित रखने, सांस्कृतिक एकता को बनाये रखने तथा धर्म के प्रचार के लिए राष्ट्र प्रेमी, समाज सुधारक तथा धर्माचार्य। प्राचीन कल्पना, रामरथ यात्रा के माध्यम से साकार की गई।
यह अभियान प्रयोग था। अनेक मायनों में। पूर्व में आजादी के पहले गांधीजी ने अपनी प्रसिद्ध डांडी यात्रा में तथा स्वतंत्राता पश्चात् चन्द्रशेखर ने पद यात्रा में इस पद्धति को अपनाया था, किन्तु वे यात्राएं पैदल थीं। आडवाणी जी ने प्राचीन के साथ, अर्वाचीन का प्रयोग किया था। आधुनिक वाहन को पुरातन रथ का रूप देकर। प्रयोग आशा से अधिक सफल रहा। रथ जहां-जहां गया, जन सैलाब रथ देखने और आडवाणी को सुनने उमड़ पड़ा। कौतूहल के कारण भी और राम के प्रति भक्ति भाव से प्रेरित होकर भी। भाजपा के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता तथा मतदाता के अतिरिक्त अन्य लोग भी इस ओर आकर्षित हुए।
लोग भी पहली बार भाजपा की रीति-नीतियों से व्यापक रूप से परिचित हुए और रामजन्मभूमि मुद्दे पर हिन्दु एक हो गया। भावनात्मक रूप से आजादी के बाद सिवाय चीन व पाकिस्तान आक्रमण को छोड़कर, अधिकांश देशवासी किसी एक मुद्दे पर इस प्रकार नहीं जुड़े थे। यह जुड़ाव अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा से भी था। भाजपा के लिए यह वरदान सिद्ध हुआ।
रामरथ यात्रा की सफलता के अन्य कारण भी थे। जनतंत्रा का विकास व सफलता, जहां नेताओं व जनता के बीच घनिष्ठ संबंध व आत्मीय संवाद पर निर्भर करता है, वहां कांग्रेसी नेताओं ने पहला काम जनता से नाता तोड़ लेने का किया था। एक डेढ़ दशक में ही उनके जनता से इतने खराब संबंध हो गये थे कि बगैर बुलेटप्रूफ जैकेट पहने व मशीनगनों से लैस सुरक्षाकर्मियों से घिरे, जब नेताओं का घर से बाहर पैर रखना कठिन हो गया, ऐसे समय में आडवाणी खुले तौर पर जनता से संपर्क करने निकल पड़े थे जनता की अपेक्षाओं को समझने तथा अपनी बात कहने, बावजूद जान पर खतरे के भी।
स्वर्णजयंती रथ यात्रा के दौरान साक्षात्कार में मैंने उनसे रामरथ यात्रा के बारे में पूछा था तो उन्होंने इस खतरे के बारे में बताया भी था कि ‘‘लालू यादव ने निहित अर्थों में चेतावनी दी भी थी। यह कहकर कि मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूँ, बड़े भाई के समान। ऐसा न हो कि आप बिहार आयें और आपके साथ कोई इत्तेफाक (दुर्घटना) हो जाये।’’ आडवाणी जी ने हंसते हुए ‘देखेंगे’ कह कर टाल दिया था। किन्तु इस हंसी के पीछे छिपा साहस ही तो आडवाणी जी का सम्बल और भाजपा की सफलता का कारण था और है।
दूसरे, किसी ने इतना लम्बा फासला पहले कभी तय नहीं किया था। इसके अतिरिक्त लोगों के मन में केवल राम मंदिर निर्माण की वर्षों से दबी लालसा ही नहीं थी, अपितु खोये स्वाभिमान को जागृत करने खोये गौरव को लौटाने की बात भी थी। तो लड़ाई छद्म धर्मनिरपेक्षता तथा तुष्टिकरण के विरूद्ध भी उतनी ही थी, जितनी वह राष्ट्रवाद की स्थापना व देश को संगठित करने के लिए थी। स्वतंत्रा भारत का यह विशालतम जन आंदोलन था। बर्बर बाबर को, राम के समकक्ष खड़ा करने की हिमाकत के विरूद्ध।
पूरे देश को रामलहर ने अपनी लपेट में ले लिया था। समस्तीपुर बिहार में लालू की जिद से आडवाणी का रथ रोक दिया गया। फलस्वरूप भाजपा के समर्थन से चलता हुआ, विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार का सत्ता रथ भी उसी क्षण रूक गया। लोकसभा भंग करनी पड़ी। विजयश्री कृष्ण के हाथ में थी। इस यात्रा में कृष्ण व अर्जुन दोनों ही आडवाणी थे। प्रभाव व परिणाम दोनों ही अद्भुत थे। 1989 के लोकसभा चुनावों में प्राप्त 86 सीटें 1991 के लोकसभा चुनावों में बढ़कर 120 हो गईं यद्यपि यह आँकड़ा 160 को पार करता, यदि राजीव गांधी की असमय मृत्यु न हो जाती तो।
दिल्ली अभी बहुत दूर थी। 1991 में जयपुर के राष्ट्रीय अधिवेशन में भाजपा का नेतृत्व डाॅ. मुरली मनोहर जोशी को सौंप दिया गया। यद्यपि यह भाजपा की सफलता का श्रेष्ठतम काल था। चार राज्यों में भाजपा सरकारें थीं और केन्द्र में उसके समर्थन से सरकार चल रही थी। किन्तु देश तो अस्थिर था। हिन्दुओं के साथ देश के एक हिस्से में खुली आँखों अन्याय अत्याचार हो रहा था। धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने के साथ साथ जम्मू-कश्मीर से लाखों हिन्दू निकाल बाहर कर दिए गये थे। आतंकवाद से गरजती घाटी और अलगाववाद के दावानल में झुलसते जम्मू-कश्मीर को, भारत से अलग होने से बचने के लिए आडवाणी ने पुनः संकल्प लिया। मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक की एकता यात्रा 11 दिसंबर 1991 प्रारंभ की गई, श्रीनगर के लाल चैक में 26 जनवरी को झंडा फहराने तथा खंड-खंड देश को एकजुट करने के लिए।
भारतीय सेना का मनोबल इससे बढ़ा। पहली बार कश्मीर समस्या पर देश में जागरूकता आयी थी। कश्मीर की स्थिति की भयावहता का अनुमान ही लोगों को नहीं था। एकता यात्रा में 2 लाख से अधिक लोग जम्मू पहुंचे। देश पर मर मिटने की यह भावना आजादी के बाद पहली बार जनता में देखी गईं लोग लाल चैक में झंडा फहराने को ऐसे आतुर थे कि घरों से तिलक लगवाकर, विदा लेकर गये थे कि ‘न लौटें तो कोई बात नहीं, समझना देश के काम आ गये’। देशभक्ति का यह अद्भुत जज्वा था। जहां-जहां यात्रा गई वहां-वहां लोग भाजपा के साथ जुड़ते चले गये। भाजपा का दायरा विस्तृत हुआ था। इस यात्रा के मूल प्रेरक आडवाणी जी ही थे।
भाजपा की विजय यात्रा का यह मात्रा दूसरा चरण था। किन्तु यह दूसरे दलों को चिन्तित कर देने के लिए पर्याप्त था। भाजपा का बढ़ता प्रभाव कहीं उन्हें लील ही न ले। यह सोच-सोच कर गैर भाजपाई दलों की नींद उड़ गई थी। कांग्रेसी सरकार इसके उपाय ढूंढ़ ही रही थी कि 6 दिसंबर 1992 को उसके भागों छींका फूट गया। इस घटना की आड़ लेकर न केवल उत्तर प्रदेश सरकार अपितु शेष तीनों भाजपा सरकारों को भी भंग कर दिया गया।
आडवाणी अविचलित रहे। उन्होंने कहा हम माफी नहीं मांगेगे। कांग्रेस का डर स्वाभाविक व सहज था। उसके अस्तित्व की लड़ाई थी। साम्प्रदायिकता का आरोप लगाकर सरकारें तो भंग कर दी गई थीं, किन्तु प्रभाव कैसे समाप्त किया जोय, इसका इन्तजाम जरूरी था।
1993 नवम्बर में 4 राज्य सरकारों के चुनाव भी होने थे। इसलिए फैलाया गया धर्म विधेयक का जाल, जिसकी आड़ में भाजपा की चुनाव लड़ने की पात्राता अथवा भाजपा प्रत्याशियों की अयोग्य ठहराने की पूरी साजिश थी। बड़ौदा अधिवेशन, 1993 में आडवाणी जी को पुनः अध्यक्ष बनाया गया था। इसी समय से विधेयक पारित होना थे। विधेयकों के खिलाफ जनमत तैयार करने के लिए, आडवाणी ने चारों दिशाओं से चार नेताओं के नेतृत्व में ‘जनादेश यात्राएं’ प्रारंभ कीं। विश्व के इतिहास में सही अर्थ में ‘जनादेश’ लेने की यह एकमात्रा घटना थी, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्राी राव के जनविरोधी कुचक्र को विफल कर दिया।
जनादेश यात्राओं को आशातीत समर्थन मिला। इस बार कौतूहल तत्व का प्रतिशत कम होकर, समर्थन में बदल गया था। जनादेश यात्राओं का प्रभाव पड़ा। धर्म विधेयक पारित नहीं हो सके जो यात्राओं का उद्देश्य था। किन्तु 1993 में तीन पूर्व भाजपा शासित सरकारें हाथ से निकल गईं। शायद आत्ममुग्धता और अतिविश्वास के कारण। फिर भी भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ में वृद्धि हुई थी। भाजपा कांग्रेस का सशक्त विकल्प बनने के रास्ते पर तेजी से दौड़ने लगी थी। नरसिंहराव को यह अहसास था।
झूठ, बेईमानी, घिनौने षड्यंत्रा, रिश्वतखोरी के सहारे नरसिंहराव का पांच वर्ष का कार्यकाल देश में भ्रष्टाचार अव्वल आने का काल है। शीर्षस्थ नेता भ्रष्टाचार की दलदल में फंसे नजर आने लगे तो सर्वश्रेष्ठ उपाय था कि निर्दोष कमल पर कीचड़ उछाली जाये। इसलिए आडवाणी पर झूठे आरोप मढ़ कर उनका राजनीतिक जीवन खत्म करने का षड्यंत्रा रचा गया और हवाला में उन्हें भी अकारण लपेटने की कोशिश की गईं
स्थितप्रज्ञ कृष्ण फिर मुस्कुरा उठे थे। संसद की सदस्यता से उन्होंने त्यागपत्रा दे दिया। और किया शंखनाद फिर एक यात्रा (9 मार्च 1996) का। इस दहाड़ के साथ कि ‘जब तक आरोपमुक्त नहीं होऊंगा, संसद के गलियारे में पैर नहीं रखूंगा।’ त्यागपत्रा रूपी सुदर्शन चक्र कइयों पर भारी पड़ा। अनेक कांग्रेसी मंत्रियों के इस्तीफे आ गये। जनजागरण अभी जरूरी था। इसलिए यात्रा के माध्यम से जनता की अदालत में जा पहुंचे।
इस यात्रा में न कौतूहल बचा था, न कोई अनोखी बात थी। लेकिन अब लोग आडवाणी जी को देखने-सुनने, जुटने लगे थे। देखें आडवाणी जी क्या कहते हैं। संसद से एक झटके में त्यागपत्रा देने वाले व्यक्ति, जिसके कारण अनेक कांग्रेसी मंत्रियों को इस्तीफे देने पड़े, का क्या कहना है। इसलिए यात्रा में जुटने वालों की भीड़ का प्रतिशत उतना ही रहा।
यह सुराज यात्रा का ही परिणाम था कि जनता भाजपा को राजसत्ता सौंपने को उत्सुक हो उठी। सभी दल भाजपा के खिलाफ एकजुट हुए और जनता भाजपा को गद्दी पर देखने की तैयारी में लग गईं
आडवाणी जी भाजपा के क्षितिज के सर्वस्वीकृत, सर्वमान्य नेता बन चुके थे। किन्तु ऐसे समय में आडवाणी जी ने दिया सत्ता से निर्लिप्तता का अनूठा परिचय। नवम्बर 1995 के मुंबई महाधिवेशन में अचानक ही उन्होंने घोषणा की कि भाजपा व सहयोगी दलों की सरकार बनने पर भी वाजपेयी ही प्रधानमंत्राी होंगे। यह निर्णय नितांत उनका अपना था, जो उन्होंने पार्टी अध्यक्ष होने के नाते लिया था। उस घोषणा से वाजपेयी जी भी भौचक्के रह गये थे और आपत्ति उठाई थी कि उनसे पूछ लिया होता। किन्तु, भाजपा को केन्द्र में देखने और उसके जरिये राष्ट्र निर्माण करने का स्वप्न ही सदैव आडवाणी को प्रेरणा देने वाले तत्व रहे। उन्हीं से संचालित रहे वे स्वयं और उनकी यात्राएं। अन्य सब बात उनके लिए गौण रहीं।
1996 के चुनावों में 161 सीटें लेकर भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। सरकार बनी, किन्तु 13 दिनों में दिल्ली निकट आकर भी हाथ से निकल गईं जनादेश को नकारते हुए यद्यपि भाजपा का प्रभाव जनता में बढ़ा ही, घटा नहीं। आडवाणी जी ने पुनः जनता से संपर्क करने का मन बनाया। अदालत से हवाला प्रकरण में निर्दोष करार कर दिये जाने पर तथा स्वर्ण जयंती वर्ष में केसरिया कृष्ण निकला, स्वर्ण जयंती रथ यात्रा पर, 18 मई से 11 जुलाई 1997. 15 हजार किमी. का सफर तय करते हुए। अथक, 70 वर्ष का युवा यात्राी, आह्नान करने देश की जनता से कि ‘तुम मुझे अपना विश्वास, प्यार दो, मैं स्वराज को सुराज में बदलूंगा।’
लोगों ने टिप्पणियां की कि स्वर्णजयंती की आड़ में आगामी चुनावों की तैयारी है। यात्रा राजनैतिक लाभ के लिए है। किन्तु उनकी स्पष्ट मान्यता थी ‘कोई भी श्रम किया जाये उसका लाभ तो मिलेगा ही।’
प्रश्न फिर से हवा में उछाला गया था, ‘अब आप हवाला से आरोपमुक्त हो गये हैं, क्या अब आप प्रधानमंत्राी बनेंगे? उनका बेलाग दो टूक उत्तर था, ‘अटलजी के साथ मंत्राी बनने को तैयार हूँ।’
राष्ट्रवाद की बुझा दी गई लौ को प्रज्ज्वलित करने निकला है यह अनोखा रथयात्राी बार-बार। बिना थके, बिना रूके। बरसते पानी में। चिलचिलाती धूप में। कड़ाके की सर्दी में। और लोगों ने भी उन्हें सुनने के लिए न तपती दोपहर की परवाह की और न रातों की सर्दी की। खड़े रहे हैं लोग प्रतीक्षारत रात भर, धैर्य से उनकी प्रतीक्षा में। आरती के थाल संजो के। मंगलगीत गाते हुए। ढोल-बताशों के साथ। उड़ीसा और बंगाल में भी। गुजरात, राजस्थान में भी, केरल में भी और पंजाब में भी। क्योंकि इन सभी को प्रतीक्षा है सुंदर, सुरक्षित, स्वस्थ, आत्म-निर्भर भारत की।
अब समय है कि महारथी का रथ आगे बढ़े, ताकि देश आगे बढ़े। वह होगा सबके सहयोग से। पार्थसारथी तो निकल पड़ा है। इस चुनावी कुरूक्षेत्रा में पुनः एक बार। जयघोष लेकर ‘सबको परखा बारी-बारी, अबकी बारी अटलबिहारी’ का। देश के एक कोने से दूसरे कोने तक। अर्जुन को विजयी बनाने। अटल आडवाणी के बीच तथाकथित वैचारिक मतभेद को हवा देने की कोशिश को बेमानी सिद्ध करते हुए। आडवाणी जी कहा करते हैं ‘बीजेपी इज ए पार्टी विद ए डिफरेंस’। मैं कहती हूँ ‘आडवाणी इज ए मेन विद कपििमतमदबम’ भिन्न व्यक्ति हैं वो, राष्ट्रनिष्ठा से अभिन्न। सुषमा स्वराज जब स्वर्णजयंती रथयात्रा में भाषणों में कहती थीं आडवाणी जी राजनैतिक संत हैं, तो उसमें किंचित अतिश्योक्ति नहीं थी।’ स्वतंत्रा भारत की राजनीति में जब सारे आदर्श व सिद्धान्त कुसी के चारों ओर सिमट गये हों, भ्रष्टाचार के दलदल में अधिकांश राजनैतिक दल आकंठ डूबे हों, ऐसे में सत्ता से निरपेक्ष रहकर संसद की सदस्यता से त्यागपत्रा देना, देश के सर्वोच्च पद के निकट खड़े रहकर, उसे अपने अग्रज को सौंप देना, कोई भरत-सा निरंहकारी व सेवाभावी तथा कृष्ण-सा स्थितप्रज्ञ ही कर सकता है।
आडवाणी ने रथयात्राओं के माध्यम से जनता तक जो संदेश पहुंचाया, उसी का परिणाम है कि 1998 में भाजपा केन्द्र में सुराज स्थापित करने के जनता के चिर संचित स्वप्न को पूरा करने के कगार पर खड़ी है। पूरी तरह सत्ता संभालने को उत्सुक नये मित्रों के साथ। पुराने सिद्धांतों को अपनाते हुए नवीन दिशाएं खोजने को तत्पर। देश को नई दिशा देने को सन्नद्ध। स्थिर, ईमानदार तथा भ्रष्टाचार विहीन सरकार देने के वादे के साथ।

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