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ओजस्विनी व्यूज

राजनीति का अतुलनीय यात्राी केसरिया कृष्ण

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जिज्ञासु मस्तिष्क और खोजी मन लिए, सारे ब्रह्माण्ड को महासागर के तल तक जानने की उत्सुकता और प्रकृति के रहस्यों को जानने के कौतूहल के कारण मनुष्य चलता रहता है। यायावर बनकर। अनन्त पथ, अपरिचित गंतव्य होेते हुए भीं अनजाने मार्गों पर और अनचीन्हें रास्तों पर।
समाज, देश तथा मानव मन के कल्याण हेतु चिंतित सेवाभावी मनुष्य यह यात्रा ज्ञान की खोज करते रहे हैं। ज्ञानार्जन के लिए और अर्जित करके उसे दुनिया में बाँटने। अनुभवों से स्वयं को समृद्ध करने और अनुभवों का खजाना सारे जहान को लुटाने। स्वयं चेतन होने और समाज में चेतना के संचार के लिए। जागृत होने और जगत को जागरुक करने के लिए। सजग प्रहरी के समान। अनीति और कुरीति के विरुद्ध अन्याय व अत्याचार के विरोध में, अव्यवस्था व कुशासन को मिटाने।
इस परम्परा का पालन भारत में हजारों वर्षों से निरन्तर होता रहा है। देश की अखण्डता की सुरक्षा और सांस्कृतिक एकता को बनाए रखने में। यात्राओं के माध्यम से ही धर्माचार्य धर्म प्रचार करने और समाज सुधारक समाज में चेतना की अलख जगाने और राष्ट्रपे्रमी राष्ट्रवाद की लौ प्रज्वलित करने, बार-बार देश का ओर-छोर नापते रहे हैं नंगे पाँव या सवारी पर। लोगों से जीवन्त सम्पर्क करते हुए। धरती की धड़कनें आत्मसात करते हुए। फिर वे महावीर, बुद्ध या नानक रहे हों या शंकराचार्य अथवा समर्थ रामदास, राजा राममोहन राय और गांधी।
इस दृष्टि से इस सदी की दो महत्वपूर्ण पदयात्राओं-‘डांडी यात्रा’ (1930) तथा चन्द्रशेखर की पदयात्रा (1983) को छोड़कर राष्ट्रपे्रम से ओतप्रोत भाजपा द्वारा आयोजित यात्राओं का विशेष महत्व है, और स्वतंत्राता प्रापित के पचासवें वर्ष में ‘स्वर्ण जयंती रथयात्रा’ का आयोजन सर्वथा उचित तथा समयानुकूल है।
जब देश के सम्मुख समस्याओं का अम्बार लगा हो, संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का खुला माहौल उड़ाया जा रहा हो, जातिवादी विद्वेष का जहर पूरे देश में फैल चुका हो, अलगाववादी ताकतें सिर उठाए खड़ी हो, सीमाएं असुरक्षित हों और आम आदमी का जीवन अस्त-व्यस्त तथा खतरे में हो, जीवन मूल्यों में चैतरफा गिरावट हो, आतंकवाद से पूरा देश आतंकित हो, छद्म धर्म-निरपेक्षतावाद के दानव ने राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का निगल लिया हो, तब किसी को तो जनजागरण का बीड़ा उठाना ही था। भाजपा ने यह दायित्व बखूबी सम्हाला है।
स्वतंत्राता प्राप्ति के समय स्वतंत्राता सेनानियों, राष्ट्र नेताओं तथा संविधान निर्माताओं ने एक स्वप्न देखा था। राम राज्य का, लोक कल्याणकारी लोकतंत्रा का। सोचा था, राजनीतिक स्वतंत्राता मिलने और एक होने से, हमारा देश महान हो जायेगा। प्राकृतिक संसाधनों तथा धन-धान्य से भरपूर इस शस्य श्यामला, उर्वर धरती में शान्ति व समृद्धि होगी। जिनके हाथों में सत्ता सौंपी थी, वे राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हो राष्ट्र के विकास रथ को आगे ले चलेंगे। साम्प्रदायिकता व पक्षपात से रहित होकर, संविधान की मूल भावना का आदर करते हुए। भारत माँ के दो टुकड़े होने की त्रासदी भुगत चुके देश में अलगाववादी प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। आदिवासी अपनी संस्कृति व सभ्यता की पहचान बनाए रखते हुए और महिलाएं परदा व कुरीतियों के जाल से निकलकर शिक्षा के प्रकाश में, राष्ट्र के निर्माण में सहभागी होंगीं। सामाजिक न्याय की स्थापना होगी। अनेकानेक प्रतिभाओं से युक्त हमारा देश विज्ञान व तकनीकी प्रगति की दौड़ में आगे होगा। राष्ट्र के जर्रे-जर्रे को पे्रम कर सकें, भारतीय मूल्यों पर आधारित ऐसी शिक्षा होगी। तालाब व नदियाँ भरपूर होंगी, खेत-खलिहान प्यासे न रहेंगे। कुटीर उद्योग का जाल होगा और प्रत्येक हाथ को काम होगा।
सर्वोपरि थी यह आशा कि वर्षों से गुलामी के जुएं में जुता हुआ और आक्रमणों की मार झेलता हुआ देश स्वाभिमान से सिर उठाकर खड़ा होगा। राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान आग्रह के साथ पुनस्र्थापित की जायेगी।
किन्तु हुआ क्या? न कोई स्वप्न साकार हुआ न वायदे पूरे। न राष्ट्रकवि टैगोर की अभिलाषा-‘भयमुक्त व ऊँचे मस्तक वाले स्वतंत्राता के स्वर्ग में देश जागे-पूरी हुई, न राष्ट्र की पददलित आत्मा के मुखरित’ होने की इच्छा, जो नेहरू जी ने 15 अगस्त 1947 को अभिव्यक्ति की थी, कहीं देखने मिली। न ही गांधी जी के अर्थों में ‘भारत के अन्तिम पुरुष की आँखों से अन्तिम आँसू’ पोंछ देने का, ‘स्वतंत्राता का प्रयोजन’ पूरा हो सका।
गांधी जी की इच्छा के विरुद्ध ‘गोरे साहबों’ का स्थान काले साहबों ने ले लिया। पूर्ण आर्थिक स्वतंत्राता व आत्मनिर्भर होना तो दूर, देश का बच्चा-बच्चा विदेशी कर्जे के बोझ से बिंध गया। न साधनों का सही उपयोग हुआ, न संसाधनों का दोहन देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हो सका। शिक्षा अनुपयोगी व अनुर्वर होकर रह गईं
परिणाम? करोड़ों लोग भूख से बिलबिलाते, निर्वस्त्रा, आज भी खुले आसमान के नीचे सो रहे हैं। आम आदमी का जीवन न सड़क में सुरखित है न घर में। कब आकाश से कोई कहर हथियारों की वर्षा के रूप में टूट पड़े और कब कोई बम विस्फोटों से चिथड़े उड़ा दे, किसी को नहीं मालूम। कहां और कैसे किसी भी माँ-बाप की इज्जत सड़कों पर नीलाम हो जाए, कोई नहीं जानता।
संवेदनहीन और भ्रष्ट शासकों और प्रशासकों ने जीना हराम कर दिया है और संज्ञाशून्य जनता विभक्त होकर दिशाविहीन की तरह आचरण कर रही है। जिन्हें देश के खजाने की रक्षा का भार सौंपा गया था, वे लुटेरे हो गए। कोई पशुओं का चारा चर गया, कोई शक्कर खा गया, किसी ने दवाइयां गड़प कर लीं, कोई संचार के माध्यम छीन ले गया, किसी ने लोगों की सुरक्षा प्रतिभूतियां लूट लीं।
बेशुमार धन-दौलत लुटाकर और प्राण न्यौछावर कर जिन्होंने हमारे लिए स्वतंत्राता प्राप्त की, उन्हें सुविधापूर्वक भुला दिया गया। ‘कौम’ की खातिर ‘कौम’ पर सब कुछ लुटा देने वाले इतिहास के अंधेरे में खो गए। विभाजन की त्रासदी में खो गया आजादी का महोत्सव। वोट बैंक की खातिर ‘तुष्टीकरण’ के चक्कर में धूमिल हो गई ‘सर्वपंथ समभाव’ की सारी संभावनाएं। सामाजिक अन्याय में बदल गया सामाजिक न्याय। गलत हो गई प्राथमिकताएं और छद्म धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ गया राष्ट्रवाद! जिसे देश की प्राणवायु होना था उसे साम्प्रदायिकता का पर्याय मान लिया।
निराशा और उन्माद की ऐसी अंधकारपूर्ण घड़ियों में जब केवल ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान’ की पुनस्र्थापना ही सारी समस्याओं का निदान हो सकता था और है, संकल्प को लेकर भाजपा ने पुनः पुनः राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान पुनर्जीवित रखने का कार्य किया है और इसी महती उद्देश्य के चलते भाजपा के नेताओं ने की है अनेक यात्राएं।
पुनर्जीवित राष्ट्र के करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के केन्द्र बिन्दु बारम्बार मुस्लिम आक्रमणों के बावजूद मिट-मिट कर बनने वाले सोमनाथ से प्रारम्भ और दासता के पीड़ादायक प्रतीक अयोध्या पर समाप्त होने वाली ‘रामरथ यात्रा’ (25 सितम्बर, 1990) केवल राम मन्दिर निर्माण के लिए ही नहीं थी, अपितु छद्म धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध भी थी, जिसमें राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान खो गई थी। इसलिए वह यात्रा न होकर स्वतंत्रा भारत का विशालतम जनआन्दोलन था बर्बर बाबर के समकक्ष राम को खड़ा करने की हिमाकत के विरुद्ध। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर तुष्टीकरण और अल्पसंख्यकवाद को शह देने की जुर्रत के विरोध में। रामरथ यात्रा के परिणाम और प्रभाव के बारे में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं। उसे सारे देश ने देखा और अनुभव किया। फिर जब धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर से लाखों हिन्दू निकाल बाहर कर दिए गए। तब आतंकवा से गरजती घाटी और अलगाववाद के दावानल में झुलसते जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग होने से बचाने के लिए भाजपा ही आगे आई और कन्याकुमारी से कश्मीर तक की ‘एकता यात्रा’ (11 दिसम्बर 1991) प्रारम्भ की गई, मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में। खण्ड-खण्ड देश को एकजुट करने के आह्वान् के साथ। भले ही सरकार प्रचार तंत्रा ने उसके बारे में कुछ न कहने और कुछ न दिखाने की कसम खाई थी, किन्तु देश की जनता ने इसे खूब देखा और सराहा और 1993 में जब धर्मनिरपेक्षतावादियों ने 80वें संशोधन विधेयक तथा लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक के माध्यम से धर्म को ही राजनीति तथा जनजीवन से बाहर निकालने की तैयारी की, तो भाजपा निकल पड़ी, जनता को उनसे होने वाले भीषण परिणामों की बात बताने। मैसूर, जम्मू, पोरबन्दर, कलकत्ता से ‘जनादेश यात्राओं’ (11 दिसम्बर, 1983) पर ‘लोकतंत्रा रक्षणाय, धर्मचक्र प्रवर्तनाय’ हेतु।
और जब भ्रष्टाचार की दलदल में फँसे लोगों ने कीचड़ में उग्र निर्मल ‘कमल’ पर कीचड़ उछालने की कोशिश की और हवाला में झूठे आरोप-पत्रा दायर किए, तो आडवाणी निकले ‘सुराज यात्रा’ (9 मार्च, 1999) पर। इस दहाड़ के साथ कि ‘जब तक आरोप मुक्त नहीं होऊंगा, संसद के गलियारे में पैर नहीं रखूंगा।’ राजनीति में शुचिता रखने, सामाजिक समरसता स्थापित करने तथा स्वदेशी अपनाने का आह्वान् करते हुए। झूठ और सच की लड़ाई का निर्णय जनता से कराने के लिए। जनता की ओर कानून की दोनों अदालतों में जीत सच की हुईं
और अब केसरिया कृष्ण निकाल हुआ है ‘स्वर्ण जयंती रथ यात्रा’ (18 मई से 11 जुलाई 1997) पर। जिससे जनता कर सके आजादी के पचास वर्षों की उपलब्धियों और नाकामियों का लेखा-जोखा। और स्मरण करे कृतज्ञ भाव से उन शहीदों को जिनके अमर बलिदान के कारण हम स्वतंत्रा देश में साँस ले रहे हैं।
जिससे जाने बच्चा-बच्चा कि देश की ज्वलन्त समस्याएं क्या है, और क्यों हैं, किसने खड़ी की हैं और उनका निदान क्या है। निकला है इसलिए चिलचिलाती धूप में 15 हजार किलोमीटर का सफर तय करते हुए यह अथक, 70 वर्ष का युवा यात्राी। देश के कोने-कोने को नापता हुआ। हृदय में देश के लिए मर मिटने की आग लिए और उगलती वाणी लिए, लालकृष्ण आडवाणी। आह्वान् करने देश की जनता से कि ‘तुम मुझे अपना विश्वास और प्यार दो, तुम्हारे लिए लड़ाई लड़ने का बल दो, मैं ‘स्वराज को सुराज’ में बदलूंगा।’ ठीक वैसे ही जैसा किया था सुभाष चन्द्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ उचित ही राजनैतिक लाभ के लिए। राजनैतिक दल यदि राजनैतिक लाभ का नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा, ओर यह कार्य राजनैतिक दलों का ही तो है कि वे जनता को देश की परिस्थितियों से अवगत करायें, जागरुकता उत्पन्न करें। किन्तु सवाल है शुद्ध भावना और स्पष्ट उद्देश्यों का।
और प्रश्न तो साहस का भी है। है किसी अन्य राजनैतिक दल या उसके नेता में यह दमखम, यह दीवानगी कि राष्ट्र भावना का दीप जलाने इस उम्र में इतनी लम्बी यात्रा करने का साहस करे? जो लोग यदि अखबारों में फोटो न छपने हों, तो समाधि स्थलों पर जाकर भी न झाँकें, है उनमें वह नैतिक बल कि आडवाणी जी के समान कह सकें, ‘जब भी भाजपा सत्ता में आयेगी अटलजी ही इस देश के नैसर्गिक प्रधानमंत्राी होंगे।’ बेलाग और दो टूक, सीधा, सरल, सहज उत्तर, जब हवाला से छूटने पर उनसे यह पूछा गया कि क्या अब आप भाजपा के प्रधानमंत्राी होंगे? कुर्सी की आपाधापी और भागमभाग में है कोई माई का लाल, जो भाजपा को इस ‘लाल’ की साफगोई के सामने टिक सके। स्वतंत्रा भारत की राजनीति में इसका कोई समानान्तर उदाहरण नहीं। देश की जनता को आने वाले खतरों से आगाह करते हुए अलगाववादी ताकतों से सावधान करने के साथ राष्ट्रवाद की बुझ गई लौ को प्रज्ज्वलित करते हुए, चला है वह अनोखा रथयात्राी। राजनीति का शंकराचार्य, बार-बार। हिमालय से हिन्दी महासागर तक, कच्छ के रण से गंगासागर तक। संस्कृति की रक्षा के लिए और धर्म की आरक्षार्थं चरेवेति-चरेवेति से संचालित होकर।

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