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ओजस्विनी व्यूज

वे टल कर भी अटल हो गए

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संयुक्त मोर्चे के नेता एच.डी. देवेगौड़ा ने एक जून को अपराह्न साढ़े बारह बजे देश देश के अगले प्रधानमंत्राी के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने 28 मई की रात को श्री देवेगौड़ा को अगला प्रधानमंत्राी नियुक्त किया और उन्हें आगामी 12 जून तक संसद में अपना बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया। वाजपेयी सरकार के इस्तीफे के बाद श्री देवेगौड़ा ने 28 मई की शाम सात बजे राष्ट्रपति से भेंटकर मोर्चे की ओर से सरकार बनाने का दुबारा दावा पेश किया था, 190 सांसदों की सूची के साथ। इसके बाद डेढ़ घंटे बाद ही राष्ट्रपति ने उन्हें बुलाकर केन्द्र में नई सरकार बनाने का निमंत्राण दिया। श्री देवेगौड़ा के शपथ लेने तक राष्ट्रपति ने श्री वाजपेयी को कार्यवाहक प्रधानमंत्राी बने रहने को कहा था। इसके पूर्व केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार सत्ता संभालने के 13वें दिन 28 मई को लोकसभा में शक्ति परीक्षण से पहले ही गिर गईं प्रधानमंत्राी अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा में विश्वास मत प्रस्ताव पर दो दिन चली चर्चा के जवाब में अपने इस्तीफे की घोषणा की। उन्होंने कहा हम संख्या बल के सामने सिर झुकाते हैं और मैं राष्ट्रपति के पास अपना इस्तीफा देने जा रहा हूँ। श्री वाजपेयी की इस घोषणा से सदन में मत विभाजन की आवश्यकता नहीं पड़ी।
देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि अधिकांश देशवासियों को इतना अधिक दर्द हुआ और क्रिकेट और रैप म्यूजिक छोड़ किसी राजनीतिक मुद्दे पर जनता टीवी से चिपकी बैठी रही। इस आशा में कि कोई चमत्कार हो जाए और भाजपा सरकार बच जाए। कुर्सी पाने को आतुर इन 140 सांसदों तथा व्यक्तिगत रंजिश रखते लोगों को छोड़ देश का बच्चा-बच्चा इस स्थिति के लिए प्रस्तुत नहीं था। यह स्थिति बनना और इतनी विशाल मात्रा में सहानुभूति अर्जित करना अपने आप में भाजपा और उसके नेतृत्व की कम उपलब्धि नहीं है। किन्तु यह किसी भी मृत्यु से उपजी सहानुभूति से भिन्न, एक विशाल व्यक्तित्व की वर्षों की साधना के प्रति सम्मान की सहानुभूति थी, आम सहमति बनाने के सकारात्मक प्रयासों को विफल करने की इन चोरों की बारात की कोशिश से उपजी थी। जिन्हें देखकर आम जनता के मन में वितृष्णा पैदा होती है, ऐसे लोगों के हाथ में सत्ता की बातडोर जाते देख और सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी सत्ता से बाहर जाने से पैदा सहानुभूति थी। चिन्ता के साथ।
पूरा देश प्रार्थना कर रहा था कि भाजपा सरकार न जाए, अटलजी ही इस देश के प्रधानमंत्राी हों। मौन प्रार्थना के ये स्वर हृदय में कहीं कठोर सत्य को जानते हुए भी, अकारण और अचानक आकाश में नहीं गूँजे। सारा देश कोई स्पष्ट, कोई छिपे रूप में इस प्रार्थना में शामिल था। यहाँ तक कि अखिल भारतीय मिल्ली परिषद के संयोजक अबुल बरकत नाजमी ने भी कहा कि भाजपा सरकार बनाने के बाद जो नाटक-बाजियाँ हुईं वह एक महान व्यक्ति हो हटाने की अभद्र चालें थीं। जबकि वह सही मायने में धर्मनिरपेक्ष था। उनकी फजीहत से केवल हिन्दुओं की नहीं, मुस्लिम नेताओं की आँखें भी नम हुईं। अल्पसंख्यक समुदाय ने ठीक कहा कि देवेगौड़ा को प्रधानमंत्राी बनाना लोकतांत्रिक संरचना में राजनीतिक बाध्यता से ज्यादा और कुछ नहीं है।
संयुक्त मोर्चा की सरकार जरूर बनी है पर प्रत्येक देशवासी के हृदय में चिन्ता उत्पन्न करके। आज हर व्यक्ति चिंतित है, देश का क्या होगा। इन लोगों को जिनके विचारों में साम्य नहीं, कोई सिद्धान्त नहीं, कानून से जिनका कोई वास्ता नहीं, संविधान से जिन्हे कुछ लेना-देना नहीं और लोकतंत्रा की जिन्हें परवाह नहीं, वे क्या देश को चलायेंगे।
सम्पूर्ण देश ने खुली आँखों से देखा है निवर्तमान प्रधानमंत्राी सहित उसके दल तथा सत्ता में आने को लार टपकाते संयुक्त मोर्चा को सदन में सुचारू रूप से सरकार चलाते रहने में मदद देने का। दूसरी ओर थी संयुक्त मोर्चा के जिम्मेदार व्यक्तियों-सोमनाथ चटर्जी, रामविलास पासवान, मुलायम सिंह आदि की अशोभनीय टिप्पणियाँ और ‘आप कुर्सी छोड़ दीजिए’, ‘आप त्यागपत्रा दे दीजिए’, ‘राजनीति से संन्यास ले लीजिए’, आदि के माध्यम से उभरी पहले दर्जे की अशोभनीयता।
विपक्ष के एक-एक वार का जवाब अटलजी ने अपनी सधी वाणी में, सन्तुलित व संयमित शब्दों में दिया। शुरुआत में ही उन्होंने कहा, वे संयमित व संतुलित चर्चा चाहते हैं। बिना चर्चा के ही सत्ता पाने की उतावली दिखाना लोकतंत्रा के हित में नहीं है, कहते हुए अटलजी पर सत्ता का लोभ न संवरण करने वालों का आरोप लगाने वालों को अटलजी ने अच्छे से खींचा। सिद्धांतों की राजनीति का दावा करने वालों के घोषणा-पत्रा जिस कांगे्रस को साम्प्रदायिक तथा महाघोटालाबाज बता रहे थे, वे कांगे्रस के समर्थन से सरकार बनाने को उत्सुक हैं। भाजपा को रा.स्व.सं. से सम्बद्धता के कारण खराब बता रहे हैं और रा.स्व.सं. को बेदाग व राष्ट्र निर्माण की महान् संस्था बताने वाले देवेगौड़ा को प्रधानमंत्राी बना रहे हैं।
भाजपा को साम्प्रदायिक बताने वाले शरद पवार, जिन्होंने 1982 से 1986 तक भाजपा के सहयोग से अपनी पार्टी तोड़कर सरकार चलाई, अटलजी को अल्पमत कारण सरकार बनाने की नैतिक सलाह देने वाले चन्द्रशेखर, जिन्होंने 1990 में अपनी पार्टी तोड़कर केवल 959 सांसदों के बूते सरकार बनाई और समता पार्टी की प्रतिबद्धता से वादाखिलाफी दर्शायी, जैसों की निजी व सार्वजनिक ईमानदारी का अन्तर भलीभांति समझाया। भाजपा को साम्प्रदायिक बताकर अछूत सिद्ध करने वालों के लिए 1989 में भाजपा क्यों कर पवित्रा हो गई थी, यह पूछा? भाजपा ने अपनी प्रमुखताएँ धारा 370, समान नागरिक संहिता, राम जन्मभूमि के मुद्दे आम सहमति बनाने के लिए छोड़े, राष्ट्र के हित में साझा सरकार की सम्भावनाओं को बल देने के लिए। किन्तु राष्ट्रहित में संयुक्त मोर्चा क्या-क्या छोड़ेगा व क्या-क्या अपनायेगा यह प्रश्न है। अल्पमत में होने के बावजूद सरकार बनाना अनैतिक कदम होने के निराधार आरोप का खण्डन करते हुए उन्होंने सीधी सपाट भाषा में कहा राष्ट्रपति के सरकार बनाने के आमंत्राण को स्वीकार करना जनादेश की अवहेलना होती है और आम सहमति की तलाश का प्रयास जरूरी था। बिना सरकार बनाए इस सहमति की तलाश भी दूसरे दलों के साथ नहीं हो सकती थी। यद्यपि पार्टी के अन्दर और बाहर कुछ लोगों का यह मानना था कि आमंत्राण से पहले व उन्हें दूसरे दलों से बातचीत करके सम्भावनाएँ टटोल लेनी चाहिए थी।
यह सत्य है कि तेरह दिनों की इस चाँदनी में भाजपा खरी उतरी। लोग कितना कुछ भी कहें। राजनीतिज्ञ, पत्राकार दुनिया भर का विश्लेषण करें कि बहुमत न होते हुए भी सरकार बनाने का आमंत्राण स्वीकारना था अथवा नहीं, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि भाजपा को इससे नुकसान जरा भी नहीं हुआ। हालांकि फायदे अनेक हुए। भाजपा के नेताओं का कथन कि ‘उसके दोनों हाथ में लड्डू है’ सही निकला। भारतीय जनता पार्टी समझ गई कि भाजपा को केन्द्र में विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने के लिए उसके पास क्षमतावान व कुशल लोग भी हैं और देशहित के ठोस कार्यक्रम भी। देश ने जाना कि भाजपा के हर क्षेत्रा के लिए हर विवादास्पद और प्रत्येक सहज मुद्दे पर अपनी दृष्टि है, जो सुदृढ़ नीति पर आधारित है। भाजपा कार्यकर्ता के इस विश्वास में आशातीत वृद्धि हुई कि पार्टी एक दिन अपने बलबूते पर सरकार बना सकेगी।
विश्वासमत पर दो दिन चली सदन में बहस के दूरदर्शन पर सीधे प्रसारण का अपना लाभ व सार्थकता थी। अन्य राजनीतिक दलों के चेहरे बेनकाब करने का इतना सुन्दर अवसर और प्रचार का ऐसा मौका कभी न मिलता। इस लम्बी सार्थक बहस के जरिए ही तो आम जनता अपने नेताओं के कद को नाप सकी। जान सकी। उनके विचारों व तर्कों को। यह बहुत जरूरी था। आवश्यक था यह दिखाना कि विशाल हृदय अटलजी की विशालता की सीमा क्या है। अटलजी ने अपने व्यवहार से विरोधियों को भी अपनी प्रशंसा करने पर विवश कर दिया। यह अटलजी की सवयं के लिए तथा पार्टी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि रही। वे सत्ता से चले गए किन्तु देश की जनता के हृदय में अटल हो गए। भाजपा को आने वाले समय में सहानुभूति से इसका पूरा भरपूर लाभ मिलेगा।

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