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ओजस्विनी व्यूज

आपातकाल के पश्चात, सरकार से जनता की अपेक्षाएँ

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1977, जनता पार्टी की विजय के पश्चात, लिखा लेख
हमें यह नहीं भूलना चाहिए इनके पीछे भारत की मूल जनता अपनी समस्त आवश्यकताओं व आकांक्षाओं व सुख और दुख ओर मुसीबतों तथा कमजोरियों व अनंत साहस के साथ खड़ी है। इस गीता की, बाइबिल की रचयिता जनता है। और जब हम पूछते हैं कि इन चुनावों का क्या तात्पर्य है, तो हमें यह जानना होगा कि इसके रचनाकारों के मन में इसे लिखते समय कौन सी आशाएं थीं। वे क्या चाहते हैं? और किस तरह से उनकी आकांक्षाओं की पूर्ति की जा सकती है?
यदि हम सोचते हैं कि यह कुछ दलीय नेताओं के हारने व जीतने का प्रश्न है तो चुनावों का संदेश हम गलत ढंग से पढ़ने लगते हैं। इस चुनाव को जीतने वाली भारतीय जनता थी और हारने वाले थे जनता के दुश्मन। जो नेता व दल उसकी जीत का कारण बने, वह केवल जनता के विचारों को जाहिर करने का एक माध्यम थे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए, यदि इन पिछड़े मतदाताओं ने श्रीमती गांधी व कांग्रेस का साथ दिया होता तो समाज के चिंतित एवं प्रबुद्ध वर्ग व बुद्धिजीवियों का विरोध कुछ मायने ना रखता। यह लड़ाई हमारे लिए उस गरीब, ग्रामीण, मजदूर, मध्यम वर्ग के गृहस्थ ने जीती है, जिसका नाम वो अक्सर लेते हैं पर जिसके प्रति अनेक बार उन्होंने विश्वासघात करके अपने निहित स्वार्थों को तरजीह दी है।
उदार नैतिक भारतीय जनवादी चिंतन के सबसे प्रतिष्ठित उत्तराधिकारी इस शताब्दी के सबसे बड़े क्रांतिकारी चिंतक गांधी जी, राजनैतिक सत्ता के बजाय सेवा, सम्मेलन व झूठ पर आधारित तिकड़म और आतंक के बजाय सत्ता के विकेन्द्रीकरण और साध्य तथा साधन की नैतिक एकता के पक्षधर थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जब भी कोई कार्यवाही करते समय तुम्हारे मन में किसी तरह का शक शुबहा हो, तुमको समाज के सबसे दबे कुचले आदमी का ख्याल करना चाहिए कि इससे उसे लाभ होता है या अहित। दूसरे जीवित गांधी जयप्रकाश ने भी अपनी सम्पूर्ण क्रांति का यही लक्ष्य बताया। यानि समाज की निचली से निचली सीढ़ी पर खड़ा हुआ जो सबसे पिछड़ा व्यक्ति है उसका उदय, उसका विकास। जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. दीनदयाल का भी यही लक्ष्य था। चुनाव अभियान के दौरान गांधी जी के आदर्शों और गांधीवादी मूल्यों का बार-बार उल्लेख हुआ है, अब समकालीन संदर्भ में उन पर अमल करने की बारी है। मूल्यहीन राजनीति के दलदल के बीच नैतिक मूल्यों की प्रेरणा जीवंत रहे और क्रांतिकारी परिवर्तनों का लक्ष्य हमें याद रहे, यही इन चुनावों का महती संदेश है। वस्तुतः इतिहास वर्तमान विजय के आधार पर नहीं, राष्ट्र निर्माण के महती कार्य की कसौटी पर खरे उतरने पर ही अपना अंतिम निर्णय देगा।
आपातकाल के दौरान हुए, सभी वर्गों पर समान रूप से हुए अत्चाचारों ने प्रथम बार देश के भीतर स्थित दो राष्ट्र अमीर व शहरी वर्ग तथा गरीब व ग्रामीण को करीब ला दिया। पहली बार उनके बीच भातृत्व व सहयोग की भावना परिलक्षित हुईं निरंकुशता के प्रति समान आक्रोश तथा इसे समूल नष्ट करने का सामूहिक निर्णय। निश्चित ही यह पिछले 18 महीने की उपलब्धि थी। किन्तु यह एकता स्थायी रहे इसके लिए आवश्यक है कि ग्रामीण व शहरी जनता को अमीर व गरीब का उद्देश्य एक हो जाए, दोनों के स्वार्थ एक हो जाए।
नागरिक अधिकार व मूल अधिकारों को यदि हम जनाकांक्षाओं के साथ जोड़ेंगे नहीं तो वो मूल्यहीन रह जायेंगे। उदाहरणार्थ प्रेस की स्वतंत्राता। क्या पत्राकार या अखबार मालिक का यह केवल अधिकार है कि जो उसे अच्छा लगे वही छापे व लिखे या यह अधिकार इन लोगों की आकांक्षाओं व जरूरतों से भी कहीं जुड़ा है जो पढ़-लिख नहीं सकते? निश्चय ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता, जनता के दुखदर्द का, इन सब बातों का अभिव्यक्ति व उसके विकास व उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने का साधन होना चाहिए। जिससे जब कभी प्रेस की स्वतंत्राता पर आँच आए तो जनता को लगे कि उसकी अपनी मांगों व इच्छाओं पर कुठाराघात हुआ है। उसकी अपनी आजादी व स्वार्थ खतरे में पड़े हैं और वह इसे प्राप्त करने को प्रस्तुत हो जाए।
संसद में चुनकर भेजे प्रतिनिधियों को जनता ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि पांच साल में एक बार मतों को मांगने हेतु शक्ति दिखाने वाले, भविष्य में दुतकार दिए जायेंगे। प्रतिनिधि होने की सार्थकता, संसद में बैठकर वाद-विवाद, गाली-गलौच व विदेशों के चक्कर लगाने से नहीं, कुछ ठोस रचनात्मक कर दिखाने से होगी। और तभी वो मत पाने का अधिकारी होंगे।
चुनावों का विश्लेषण करते समय यहां पर एक बात कहना अनुचित न होगा कि जब हम आपातकाल की क्रूरताओं का लेखा-जोखा करने बैठते हैं तब स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है कि यह संभव कैसे हो गया? कैसे 60 करोड़ भारतीय बिना किसी प्रतिकार के 19 माह तक अत्याचारों की भट्टी में भुनते रहे? गांधी जी ने एक बार कहा या जुल्म और जालिम वहीं पनपते हैं जहां जुल्म सहने वाले होते हैं। जब लोकतंत्रा की विरासतें एक-एक करके नष्ट की जाने लगीं, तब क्यों लोग मन मसोस कर रह गए? दोष केवल श्रीमती गांधी की तानाशाही प्रवृत्ति का नहीं था, दोष चुपचाप अत्याचार सहने वाली हमारी दासत्व प्रवृत्ति का भी है।
फरवरी 6 को जयप्रकाश जी ने दिल्ली रामलीला मैदान में, उनको सुनने व उनका अभिनंदन करने हेतु एकत्रित हुए लाखों लोगों को लताड़ते हुए पूछा था-‘कहां थे आप लोग उस समय जब आपातकाल लगाया गया।’ यदि आप में से दो, तीन हजार लोग भी तानाशाही के विरुद्ध आवाज उठाते तो कोई ताकत नहीं थी जो आपको इनसे गुजरना पड़ता। यह कटु सत्य था।
यह देश का सौभाग्य था कि चुनावों ने हमें अपनी यह गलती सुधारने का यह मौका दे दिया। परंतु जरूरी है कि भविष्य में यह गलती ना दोहराएं, जिससे फिर उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का सामना न करना पड़े। आवश्यक है यह प्रश्न अपने से पूछना, जैसा कि जान एफ कैनेड़ी ने भी कहा था-”बार-बार देश या नेतृत्व की तरफ निहारने की अपेक्षा, कि देश उनके लिए क्या कर सकता है, स्वयं से पूछें कि वह देश के लिए क्या कर सकते हैं।“ धन्यवाद।

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