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ओजस्विनी व्यूज

राष्ट्रीय चरित्रा निर्माण में

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नारी का योगदान
पुलिस टेªनिंग सेन्टर, सागर, 1975
1975 का वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष है। यह वर्ष विश्व भर की नारियों के लिए जागरण का संदेश लेकर आया है। प्रत्येक प्रांत, नगर व ग्राम में महिला सम्मेलन हो रहे हैं। महिला गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है और शताब्दियों से चले आ रहे, ‘नारी की महिमा’, ‘राष्ट्रीय चरित्रा निर्माण में नारी का योगदान’ जैसे प्रश्नों का फिर से मंथन करके नारी को नई दृष्टि से देखने और उनमें जागरूकता उत्पन्न करने का सतत् प्रयत्न किया जा रहा हैं।
वह प्रत्येक राष्ट्र जो भी आज महान् है, सशक्त है, उन्नत है या जो कभी महान् रहा है उसकी पृष्ठभूमि में नारी का सतत् योगदान रहा है। जितने भी महापुरूषों को इस वसुन्धरा ने जन्म दिया है उन सबकी प्रेरणा स्त्रोत नारी रही है। तब क्या कारण है कि, प्रत्येक काल में हमें नारी की महानता का मूल्यांकन करने पर पुनः पुनः विवश होना पड़ता है।
कारण है कि सदैव से पुरूष ने नारी को अपनी क्रीतदासी बनाने की कुचेष्टा की है। और जब भी वह विजय के उन्माद से गर्वित हो, नारी के पैरों में बेड़िया डालने में सफल हुआ है, तब-तब नारी की महानता, उसकी श्रेष्ठता तथा उसकी पवित्राता, हीनता व पराधीनता के आवरण में आच्छादित हो गयी है। यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि इसमें नारी का पूर्ण सहयोग रहा। उसने स्वयं को इतना अशक्त बना लिया कि अपने सतीत्व एवं अस्तित्व की सुरक्षा हेतु उसने अपने स्वतंत्राता एवं अधिकारों को पुरूष के पास धरोहर रख दिया और स्वयं ने घर की चारदीवारी में शरण ले ली।
इसी का दुष्परिणाम हुआ कि आज राष्ट्र पतन के गर्त में जा रहा है। सर्वत्रा त्राहि-त्राहि है। अवनति के रसातल में जाते इस राष्ट्र को उत्थान की ओर यदि कोई ले जा सकता है तो केवल नारी। जब तक वह पुरूष की तरह समाज राष्ट्र एवं विश्व की नागरिक बनकर सहयोग नहीं देगी तब तक राष्ट्रीय चरित्रानिर्माण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
कहने को जीवन के कई क्षेत्रों में आज नारी केवल पुरूष सहयोगिनी ही नहीं, वरन् उसे पीछे छोड़ पुरूष के समान ही धरातल पर खड़ी हो गयी है। इसलिए उसे संविधान में समान अधिकार भी दिये गये हैं। किन्तु, यह अधिकार भारतीय नारी को अनायास, सहज ही प्राप्त हुआ है, इसके लिए उसे प्रयत्न नहीं करना पड़ा है। जबकि दूसरे देशों में स्त्रिायों ने अधिकारों को लड़कर प्राप्त किया है, इसीलिए उनकी सामाजिक स्थिति भी सुदृढ़ है। किन्तु भारत में उन्हें भले ही स्वतंत्राता के साथ मतदान का अधिकार मिल गया हो, पर कितनी स्त्रिायां है, जो इस अधिकार का उपयोग जानती हैं। बहुत सी स्त्रिायां पति से पूछकर वोट देती हैं। सहज मिले अधिकारों को कोई नहीं स्वीकारता। इसे माँगना पड़ता है। जब स्त्रिायों को यह भास होगा कि यह मेरा अधिकार है, मैं इससे कुछ कर सकती हूँ तभी उसका उद्धार संभव है और तभी मानवता का तथा राष्ट्र के नैतिक चरित्रा का उद्धार संभव है।
राष्ट्रनिर्माण में नारी का योगदान अकथनीय है। प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप माँ के रूप में योग्य एवं सबल नागरिक का निर्माण, पति की प्रेरणा बन देशहित कार्यों के लिए उत्साहित करना और सामाजिक क्षेत्रा में, सांस्कृतिक व कला आदि के क्षेत्रा में इसका योगदान रहता है।
भारत में नारी की श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति इसके मातृत्व रूप में की गई है। क्योंकि मातृत्व में महानता, स्वार्थ, शून्यता, कष्ट, सहिष्णुता और क्षमाशीलता का भाव निहित है। इसीलिए आचार्यों ने कहा-
उपाध्यायान् दशाचार्यः आचार्याणां शतं पिता।
सहस्त्रां तुपितृन् माता गौरवेणा तिरिच्यते।।
अर्थात दस उपाध्यायों के बराबर एक शिक्षक, सौ शिक्षकों के बराबर एक पिता और हजार पिताओं से भी बढ़कर माता का गौरव है। शिशु पर गर्भ से ही माँ के संस्कार पड़ते हैं। गर्भस्थ शिशु माँ के आचार विचार ग्रहण करता है। इसी से पोषण पाता है, इसीलिए पहला ज्ञान जननी से ही प्राप्त होता हैं। शास्त्रों में पहले ‘‘मातृदेवो भव’’ ही कहा गया है उसके बाद ‘‘पितृदेवो भव’’ कहा गया है।
ज्ञानदेव का अभंग प्रसिद्ध ही है। शिशु के झूला झूलते-झुलते ही उसे वेदान्त सिखा दिया गया था। शिवाजी, साने गुरूजी को बचपन में माता से ही बोध मिला और उसी समय वह इनके हृदय में घर कर गया। ‘श्रुति’ को शंकराचार्य ने माता कहा है। ज्ञानेश्वर को ज्ञानोबा महाली कहा ही जाता है। माँ रात दिन सेवा करके बच्चों का पालन-पोषण करती है, किन्तु फिर भी वह कहती है मैंने कुछ नहीं किया। जब तक उसके सब बच्चों का पेट नहीं भर जाता है, तब तक भूखी रहती है। स्वयं कष्ट उठाकर अपनी सन्तान की सुख-सुविधा का प्रबंध करती है, ऐसा सेवा भाव और कहां मिलेगा।
जैसे-जैसे बालक बड़ा होता है माँ के आचार-विचारों का, उसके संस्कारों का उस पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। इस सृष्टा की योजना ही ऐसी बनी है। बच्चे को भूख लगी तो माँ के स्तनों को दूध से भर दिया। बच्चों को मातृभाषा सिखाने के लिए सरकार कितनी धनराशि व्यय करती हैं, किन्तु माँ स्तनपान कराते-कराते बच्चे को मातृभाषा सिखा देती है। माँ बच्चे से कहती है वह देखो, जो शिशु श्रवण करता है। फिर बच्चे से पूछने पर वह अंगुली से बताता है, फिर उसे बोलने लगता है। यह जो भाषा सीखने का ज्ञान है, क्या विद्यालय की शिक्षा से कम है। दो-ढाई साल में शून्य में से ज्ञान पैदा किया जाता है और माता ही यह सब करती हैं।
शिक्षण शास्त्राी अनुभव और निरीक्षण से कहते है कि बच्चे को शुरू के दो साल में जितना ज्ञान मिलता है उतना ज्ञान उसे आगे के सारे जीवन में नहीं मिलता। इसीलिए विश्वभर में विद्वानों ने एकमत होकर माना है कि यदि माताएँ संस्कारवान बनी तो दुनिया बचेगी। इसीलिए सबसे प्रथम और सबसे श्रेष्ठतम गुरू ‘माँ’ है। यह जानते हुए ही विश्वविजयी नेपोलियन को कहना पड़ा है ‘‘यदि मुझे योग्य माताएं मिलें तो मैं महान् राष्ट्र का निर्माण कर सकता हूँ।
स्त्रिायाँ अपने बच्चों को सच्चरित्रा बनायेंगी तो देश को अच्छे नागरिक प्राप्त होंगे। किसी भी देश के भावी कर्णधार तो इसके बालक ही हैं। इसके लिए आवश्यक है कि माताओं का स्तर उन्नत किया जाये तथा बच्चों की उचित शिक्षा व विकास के लिए प्राथमिक शालाओं को भी केवल स्त्रिायों को चलाना चाहिए।
मातृत्व के बाद स्त्राी का पत्नीत्व रूप आता है। यह कहना अनुचित न होगा कि नारी की प्रेरणा के बगैर पुरूष का समुचित विकास असंभव है। विश्व में जितने भी महापुरूष हुए हैं वह किसी न किसी रूप में नारी से प्रेरणा पा कर महान हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी जगत की एक अमर विभूति कदापि न बन पाते यदि रत्नावली से उन्हें प्रेरणा न मिली होती। कस्तूरबा ने यदि गांधीजी का पग-पग पर, कभी मौन रहकर, कभी विरोध कर सहयोग न किया होता तो शायद आज वे विश्व पिता के रूप में पूज्य न होते। और इस बात को गाँधीजी ने मुक्त हृदय से स्वीकारा है। भारतीय परम्परा ही कुछ ऐसी रही है कि पुरूष आद्योपान्त नारी की शक्ति से परिचालित होता है। उसी के योग से वह संग्रहवृत्तिधारी बनता है उसी के आग्रह से अर्जन करता है एवं उससे विच्छिन्न होते ही वह सहज ही निवृत्तिनुगामी बनता है। अनेक महान सम्राटों व कुबेरों को नारीविहीन होते ही अविरल योगी सन्यासी और फकीर होते देखा गया है।
वैदिक युग में स्त्रिायों को पुरूष के समान अधिकार थे, किन्तु एक युग ऐसा आया जब उसे पुरूष से हीन माना गया। आज उसका स्वतंत्रा व्यक्तित्व ही नहीं रह गया है। किसी की पत्नी, किसी की बहन के नाते ही उसका परिचय दिया जाता है। स्त्रिायों को मोक्ष तथा वेदों के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। इस आध्यात्मिक अपात्राता से स्त्रिायों में स्थायी हीन भावना आ गयी है।
किन्तु शास्त्रों के अनुसार ही स्त्राी और पुरूष दोनों को मोक्ष का समान अधिकार है। दोनों की आध्यात्मिक योग्यता समान है। हम सीता-राम, राधेश्याम, गौरीशंकर इसीलिए कहते हैं कि, स्त्राी पुरूष की समता को मानते हैं और इसमें भी पहले सीता कहते हैं। शक्ति रूप में भी अपने यहाँ स्त्राी मूर्ति ही मान्य हुई है, पुरूष मूर्ति नहीं। गाँधीजी ने शराब की दुकानों पर पिकेटिंग करने के लिए स्त्रिायों को भेजा था। उनका कथन था ‘जो सबसे गिरे लोग हैं उनके खिलाफ हमारे पास जो ऊँची से ऊँची नौतिक शक्ति है, वही भेजी जानी चाहिए। और वहां स्त्रिायों ने जो काम किया उसे सारे देश ने देखा।
स्त्राी अधिक बुद्धिवाली होती है। पुरूषों से उदार होती है, क्योंकि पुरूष परमेश्वर की आराधना, भक्ति और मातृत्व में कम पड़ता है। स्त्राी माता होती है। वह पुरूष का दुख जानती हैं। किसी को प्यास लगती है तो, वह जानती है। किसी को पीड़ा होती है तो, वह जानती है। और अपना मन हमेशा भगवान की शक्ति में लगाये रखती है। ‘‘महिला’’ जैसा शब्द ही महानता का सूचक है। भारत में चरित्रा भंजन का कितना आयोजन हो रहा है। उसका विरोध और प्रतिकार बहनों को ही करना होगा और यह करने के लिए नारियों में स्वरक्षा की भावना होनी चाहिए। यह शारीरिक शक्ति द्वारा नहीं वरन् आत्मशक्ति द्वारा होगा। उन्हें आत्मनिष्ठ बनना होगा। आत्मनिर्भर व्यक्ति के नेत्रों से झरते निर्भयता के तेज से कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
स्त्रिायां स्वरक्षित हैं। वनसाम्राज्ञी शेरनी अपनी रक्षा स्वयं करती है इसलिए भय फैलाया गया है, ताकि पुरूषप्रधान समाज बना रहे।
जहां तक संभव हुआ, हमने स्त्राी को सुरक्षित बनाया उसे स्वरक्षित नहीं बनाया। अनेक लोगों का कथन है कि स्त्राी पुरूष से श्रेष्ठ है। इसमें दया भाव सहज ही अधिक होता है। बालकों की शिक्षा और समाज का शासन स्त्राी के हाथ में दिया जाये तो अहिंसक समाज की रचना सुलभता से सिद्ध हो सकती है।
आज दो बड़े सामाजिक अनर्थ भारत की प्रगति में रोड़ा अटका रहे हैं। ये दो कुत्सित अनाचार है-स्त्राीजाति के पैरों में पराधीनता की बेड़ी डाल रखना और निर्धन जनता को जातीय बंधनों के नाम पर समस्त मानवीय अधिकारों से वंचित रखना। आज भारत के करोड़ों अभागे लाल इसी कारण से धनहीन, बुद्धिहीन व अशिक्षित हैं।
शक्ति का सच्चा उपासक कौन है? सच्चा शक्ति का उपासक वह पुरूष है जो सर्वशक्तिमान परमात्मा की शक्ति का सर्वत्रा अनुभव करता है और प्रत्येक स्त्राी में उस शक्ति का व्यक्त रूप देखता है। पाश्चात्य देशों के पुरूष सामान्यतः स्त्रिायों के साथ अत्यंत सम्मानपूर्वक व्यवहार करते हैं और परिणाम उन्नतिशील, विकसित, स्वतंत्रा व बलवान राष्ट्रों के रूप में सामने है। क्या कारण है कि हमारे देशवासी आज तक अपने को श्रेष्ठ व स्त्राी को हीन समझाने की मानसिक दासता से मुक्त नहीं हो पाये हैं।
भारतवर्ष तभी जागृत व सशक्त हो सकता है, जब इस देश की सहस्त्रों नारियों का शक्ति जागरण होगा, जब उन्हें शक्तिबोध होगा। जब नव युवतियाँ उदात्त भावनाओं से परिपूर्ण होकर, हृदय में शक्ति का संचय करेंगी। राष्ट्र निर्माण की सद्भावना का शुभ संकल्प लेंगी।

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