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ओजस्विनी व्यूज

आत्महत्या पाप है

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चैतन्य स्वरूप तत्व को आत्मा कहते हैं! आत्मा अपने मानसिक परिणामों की उलझन से संसार में परिभ्रमण करने लगती है तो उसे संसारी आत्मा कहा जाता है और जब वही आत्मा अपने कार्माण परिणमनों से छुटकारा पा लेती है तो उसे मुक्त आत्मा कहा जाता है।
यहाँ पर विषय संसारी आत्मा की ओर संकेत कर रहा है। हम सभी संसारी आत्मा हैं। संसारी आत्मा संसार के असंख्य प्रकार के वातावरण में उलझी रहती है। उसके सामने पे्रम, त्याग, मोह, द्वेष, परिग्रह, छलकपट, पाप, भूख-प्यास, तृष्णा, लोभ, दया, धर्म, समाज और सम्प्रदाय, आदि रहते हैं।
संसारी आत्मा का एक अपना परिवार होता है और होती है परिवार की परिस्थिति। यो सभी के बीच यह संसारी आत्मा रहती है। अब सवाल यह पैदा होता है कि आत्महत्या है क्या?
कलुषित विचारों के साथ अपने आपको किसी भी साधन से मौत के हवाले कर देना आत्महत्या है। आत्महत्या प्राणी जभी करता है जबकि वह सांसारिक परिस्थितियों से घबरा जा चुका है। भूख, धन, समाज, परिवार, मान-मर्यादा आदि की लताड़ों को न सह सकने के कारण वह प्राणी ऐसा कार्य कर बैठता है।
तो मन आत्महत्या पाप है?
जी हाँ! आत्महत्या ही तो है क्योंकि पाप उसे कहते हैं जो कलुषित विचारों से उत्पन्न हो; जिसके करने पर डर ने, हृदय पर घर बना लिया हो और आत्महत्या बिना कलुषित विचारों को अपनाए हो नहीं सकती।
उदाहरण के तौर पर मैं आपको बताऊँ कि जैसे कोई प्राणी अपने परिवार अथवा अपनी भूख की ज्वाला से इतना तड़प उठा है कि वह किसी भी प्रकार उस ज्वाला को शान्त करने में समर्थ नहीं है। तब वह अपना आत्मबल खोकर विचार कर बैठता है कि इस झंझट से तो मर जाना अच्छा है, और वह नदी में डूबकर, पहाड़ से गिरकर, अपने आपको आग में प्रवेश करा कर, अथवा अस्त्रा-शस्त्रा से अपने आप प्राण गँवाने को आतुर हो उठता है।
अब मैं आपसे पूछती हूँ कि क्या इस वक्त उसके विचार शुद्ध हैं? क्या वह अपने पुरुषार्थ का उपयोग कर रहा है? क्या उसने विवेक का सहारा लिया है और क्या उसने एक मानवीय कार्य अपनाया है? मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप सभी यह कहेंगे कि नहीं! नही! यह तो सरासर पाप है। अपने आपके प्रति अत्याचार है।
दर्शनकारों ने यह भी कहा है कि आत्मा भिन्न है और शरीर भिन्न है। अतः आत्मा कभी भी नहीं करती, वह तो अजर-अमर होती है। ना वह जलती है, ना वह मरती है और न वह कट सकती है। यह सब क्रियाएँ तो मात्रा शरीर की होती हैं। अतः शरीर तो वैसे भी एक न एक दिन नष्ट होगा ही-तब क्यों न आज की विकट परिस्थितियों से शरीर को आज ही नष्ट करके छुटकारा पा लिया जाय। शरीर तो एक वस्त्रा की तरह है-जैसे यदि वस्त्रा पुराना हो गया हो अथवा अशोभित लगने लगा हो तथा अपने लिए एक संकट मालूम होने लगा हो तो उस वक्त को तुरन्त छोड़कर नया वस्त्रा धारण कर लेना चाहिए। वैसे ही शायद आप कहेंगे कि जब इस नाशवान शरीर के रहते महान संकट, आफतें, विपत्तियों का सामना करना पड़ रहा हो तो क्यों न शरीर का उत्सर्ग करके इन विषमताओं से छुटकारा पा लिया जाय-और शायद इस प्रकार सोचकर प्राण त्याग देना जिसे आत्महत्या भी कहा जा सकता है, आप उसे पाप नहीं कह सकतीं।
तो इस प्रकार सोचना व कहना मात्रा अविवेकता या अनविज्ञता कहलाती है। देखिए मैं आपको बताऊँ भगवान कृष्ण-महान् नीतिकार, महान् उपदेशक और महापुरुष हो चुके हैं। उन्होंने पुण्य व पाप क्रिया को मन से सम्बन्धित किया है-गीता में उन्होंने स्पष्ट कहा है कि ‘मन ही मनुष्याणां एव पाप बन्ध कारणम्’ अर्थात् मन ही पाप और पुण्य बन्ध कराने में कारण है और अविवेकी प्राणी मन से ही अपने शरीर को नष्ट करने अर्थात आत्महत्या जैसा अनुचित कार्य करने की सोचता है।
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