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ओजस्विनी व्यूज

भाग्यशाली है वह

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इन्सान जिसने भारत में जन्म लिया। अध्यक्ष महोदया, जब तक मैं यथार्थ के ठोस धरातल पर जीवन के कठोर सत्य से परिचित नहीं थी, या जीवन के मर्म से जब तक मैंने पुस्तकों, दूसरों के अनुभवों द्वारा साक्षात्कार नहीं किया था, तब तक मेरा भी यही विचार था कि वास्तव में कितनी भाग्यशाली हूँ मैं कि मैंने राम, गौतम, गांधी, महावीर जैसे अमूल्य रत्नों की जन्मदात्राी, उस महान धरती पर जन्म लिया जिसके ऋषि-मुनियों, महान पुरुषों ने सृष्टि के प्रारम्भ में विश्व का अज्ञान रूपी अन्धकार दूर कर के संसार को अपने शील, शक्ति, सौन्दर्य, प्रतिमा व ज्ञान के आलोक से प्रकाशित किया। उस देव भूमि भारत में जन्म लेकर मैं उस असीम अदृश्य दृष्टा, सर्वशक्तिमान परम पिता की शत-शत बार कृतज्ञ थी। पर जैसे ही जीवन के प्रत्येक पहलू को आँख भर कर गौर से देखा, जैसे ही जीवन की वास्तविक गहराईयों में उतर कर देखा तो सब एक ही बार में स्पष्ट हो गया कि मैं क्या हूँ और मेरा देश क्या है।
महोदय मेरी सबसे बड़ी अभाग्यशीलता तो यह रही कि जिस भूमि पर जन्म लेने के लिये देवता तरस गये, आज उसकी इतनी दयनीय व दुखमय स्थिति हो गई कि हमें सोचना पड़ा कि हम भाग्यशाली हैं या नहीं।
क्या रह गया है आज इस देश में। मेरे विपक्षी वक्ता इतिहास में कौन से स्वर्णकाल की बात करके गर्वित होते हैं। प्राचीनकाल क्या इसलिये स्वर्णकाल था कि इस युग में अवतारों की कल्पनाएँ की गईं और जो भी प्रभावशाली व्यक्तित्व हमारे समाज में उत्पन्न हुआ उनसे पे्ररणा लेने के बजाय उन्हें मन्दिर में प्रतिष्ठित कर दिया गया और हम आज वही गांधी को महामानव बना कर कर रहे हैं। क्या इसलिये कि देवताओं के पेचीदा क्रियाकलापों और व्रत उपवासों तथा तपों के गोरखधन्धे शुरू किये गये थे या इसलिये कि इस युग में संसार की क्षणभंगुरता, पुनर्जन्म आत्मा और शरीर की पृथकता आदि दर्शनों का जन्म हो चुका था और उन वेदों की सृष्टि हुई जिसमें व्यक्ति को व्यक्ति न कह कर हमेशा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र ही कहा गया, जिसमें शूद्रों व स्त्रिायों पर भयंकर अत्याचार की पे्ररणा देने वाले धर्मग्रन्थ रचे गये तथा जिसमें निहित जाति के सिद्धान्त ने हिन्दुओं के बीच में हजारों दीवारें खड़ी करके एक हिन्दू को दूसरे हिन्दू का दुश्मन बना दिया क्या इसीलिये आज आप अपने धर्म पर गर्व करते हैं कि पश्चिम-पूरब की ओर आकर्षित हो रहा है। वह आध्यात्मिक व शान्ति की खोज भारत में करता है पर शायद आप भूल जाते हैं कि तथाकथित पश्चिमीयों का केवल चरस-गाँजे में धुत्त होकर हरे रामा हरे कृष्णा करते रहना ही धर्म है तो उस पर आप गर्व कर सकते होंगे, मैं नहीं। फिर एक बार को आर्य व द्रविणों की उच्च संस्कृति, सभ्यता पर गर्व किया भी जाये तो मैं कहूँगी वो अवश्य भाग्यशाली होंगे जो उस स्वर्णकाल में जन्में पर यही हमारी भाग्यशालिता का कारण नहीं बन सकता। जिस व्यक्ति का वर्तमान उज्जवल नहीं होता वह अतीत के गुण गाकर सन्तुष्ट हो जाता है। आज स्थिति यह है कि हजारों वर्षों की गुलामी और बार-बार की पराजय ने हमें इतना पस्त कर दिया है कि हम अपने हर प्रश्न का उत्तर, हर समस्या का समाधान और हर मर्ज की दवा भूतकाल में खोजने लगते हैं। विचारों की संकीर्णता इस हद तक हमारे चरित्रा की अंग बन चुकी है कि हमारा जीवन दर्शन ही भ्रामक हो गया है। हमारी यह धारणा रही कि आज भी कुछ अंश हमारे जैसा देश, हमारे जैसी जाति, धर्म, ज्ञान और विज्ञान, संचार में कहीं नहीं आज भी यथार्थ से आँखें मूँद, कोरे आदर्श में मस्त है।
हमें उन कारणों पर विचार करना होगा कि स्वर्णकाल की तथाकथित समृद्धि और शक्ति उपमहाद्वीप की न तो बाहरी हमलों से रक्षा कर सकी और न जनसाधारण में कोई जिज्ञासा और चेतना उत्पन्न कर पाई। कितने आश्चर्य की बात है जिन दिनों हमारे देश की सीमा पर शकों व हूणों की घुसपैठ हो रही थी व विदेशी लुटेरे भारत की निरीह जनता का कत्लेआम कर रहे थे, हमारे धार्मिक व सांस्कृतिक नेता ब्रह्म व जीव की सीमा निर्धारित करने तथा पुराणों की रचना करने में लगे थे।
क्या मेरे विपक्षी वक्ता उस बात पर भाग्यशाली समझते हैं कि हमारे देश पर ढाई हजार वर्षों से जिस किसी विदेशी महत्वाकांक्षी योद्धा ने इच्छा की आक्रमण कर लिया और मन में विजय का उन्माद लिये यहाँ का वैभव लादकर चलता बना। क्या इनकी गर्दन इस ज्वलन्त सत्य से साक्षात्कार न कर पाने की असमर्थता से झुक नहीं जाती। कोई विदेशी इंगित कर देता है कि अरे तुम हो क्या, तुम तो कुछ अपवादों को छोड़कर तभी तक स्वतंत्रा रहे हो जब तक किसी आक्रमणकारी ने तुम पर आक्रमण नहीं किया और तब तक गुलाम रहे हो जब तक विदेशी शासक खुद इस देश का निवासी नहीं बन गया या यहाँ से खुद अपने देश वापिस नहीं चला गया।

यूनानी, शक, हूण, अरब, मंगोल, तुर्क, पठान, अंगे्रज आदि विश्व की युद्धप्रिय जातियों के खूनी पंजों में तड़पती, छटपटाती पूरब की सोने की चिड़िया के सुनहले पंख एक-एक करके नुचते रहे और हम मौन बने देखते रहे। संसार में शायद ही कोई देश ऐसा हो जिसकी प्रभुसत्ता पर इतनी चोटें की गई हों और फिर भी जिस देश के नागरिक अपनी स्वतंत्राता और देश की सुरक्षा के प्रति इतने उदासीन रहे हो। इतिहास के जिन पृष्ठों में हमारे संस्कृति सभ्यता के चरमोत्कर्ष की गाथाएँ हैं उन्हीं में हमारी पतन, पराजय, देशद्रोह की करुण कहानी अंकित है।
महोदया, कौन सा ऐसा देश है जिसमें शत्राु को शत्राु कहने की बात कौन-कौन करे, उनकी जय-जयकार करने वाले लोगों की संख्या कुछ कम नहीं, कौन से लोकतांत्रिक देश में राजनैतिक चेतना का इतना अभाव है कि मंथरावाद: ”कोऊ नृप होए हमहि का हानि“ का भाव बढ़ता जा रहा है और दूसरी ओर शासक वर्ग दुर्दिन के लिये आत्मनिर्भर बनने के बदले नीली छतरी या उधार की पराई छतरी प्राप्त करने विशेष लालायित हैं। कौन से देश में प्रान्तीयता, क्षेत्राीयता, भाषावाद, सम्प्रदायवाद आदि इतने अधिक विघटनकारी तत्व हैं, कौन से देश में इतना अधिक भ्रष्टाचार है, कौन से देशवासियों का चरित्रा इतना गिर गया है, कौन से देश में इतना अधिक तनाव-बैचेनी है। भाग्यशालिता की बात तो इन बेबस कन्याओं के हृदय से पूछिये जिन्हें माँ-बाप के दहेज न दे सकने की असमर्थता से आत्महत्या करने को विवश होना पड़ता है। उन विधवाओं से पूछिये जिन्हें भरी जवानी में सारे शृंगार तज कर सफेद मोटे वस्त्रा पहनने को मजबूर कर दिया जाता है। भारत की विद्रोह की ज्वाला में धधकती तथा आग की लपटों में झुलसती तरुणाई से पूछिये, उन प्रतिभाशाली, ज्ञानवान कार्यशील युवकों से पूछिये जिन्हें अपनी कार्यक्षमता, प्रतिभा प्रदर्शन का भी अवसर यहां नहीं मिलता और जिन्हें 200-300 रूपये की नौकरी के लिये जूते चटकाने पड़ते हैं और विवश होकर अपनी मातृभूमि (जन्मभूमि) और परिवार से अलग होकर विदेशों में बस जाना पड़ता है। सभी के हृदय देशभक्ति की भावना से वंचित हैं, ऐसा समझना यथार्थ से पलायन करके आत्म प्रवंचना में लीन होना है। नोबल पुरस्कार विजेता खुराना को किसने विदेशी नागरिकता स्वीकार करने को बाध्य किया। स्वयं हमारे देश में प्रचलित भ्रष्टाचार, नौकरशाही तथा सिफारिशी प्रवृत्ति ने।
अपने आपको अभाग्यशाली समझने को तो मैं मजबूर हो जाती हूँ जब देखती हूँ यही मेरे विपक्षी वक्तागण दुकानदार से जाकर इम्पोर्टेड वस्तु की मांग करते हैं और भारतीय वस्तु को देखकर नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं। तब कहाँ चली जाती है इसकी भाग्यशालिता। उसी वस्तु को यदि विदेशी कह कर बेच दिया जाये तो झट खरीद लेते हैं। इससे देशवासियों द्वारा भारत को इतना अधिक अपमानित देखकर रोना आता है। खद्दर का चोंगा पहनकर बात-बात में गांधी जी की दुहाई देना, सत्य और अहिंसा की बातें करने और दिन-रात हिंसा व झूठ में गोते लगाना, गंगा की घाटी में रहकर माक्र्स और लेनिन की बातें करना और वक्त आने पर गिरगिट की तरह रंग बदल लेना, यह सब क्या हमारी प्रगति का सूचक है। रोना आता है जब हमे आये दिन विदेशों में भारतीयों के अपमान की करुण कहानी सुनने को मिलती है, रोना आता है जब हम देखते हैं कि भारत की जनता की सेवक पुलिस विदेश सम्भ्रान्त विद्वानों का अपमान कर डालती है। विद्वान पे्रजो के साथ अगस्त माह में हुआ काण्ड इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक स्थिति थी कि बर्मा, थाईलैण्ड आदि में यदि भारतीय जाकर कोई गवाही दे दे तो वो सत्य मान लिया जाता था क्योंकि भारतीय कह रहा है और आत्मग्लानि होती है यह सोचकर कि आज यह स्थिति है कि यदि वह सत्य भी बोल रहा होगा तो भी उसे झूठ समझा जाता है क्योंकि वह भारतीय है।
मेरे विपक्षी वक्ता कहते हैं कि यह सब बुराई हमारे द्वारा ही लाई गयी है और हम दूर करने की असमर्थता से अपने आपको अभाग्यशाली कहते हैं तो उनसे कहना चाहती हूँ कि तभी तो कोई भारतीय अपने आपको अभाग्यशाली कहते है जब वह चाहकर भी इन बुराइयों को दूर नहीं कर पाता और अभाग्यशाली समझने को मजबूर हो जाता है। जब देखता है कि हमारे चरित्रा नायकों ने यहाँ तक कि राम, बुद्ध, कृष्ण ने जो कुछ किया अपनी व्यक्तिगत छवि निर्माण या मोक्ष या स्वर्ग प्राप्ति के लिये किया। समाज या देश के प्रति बिना कुछ बदले में चाहते हुए हमारा क्या कर्तव्य है इसकी पे्ररणा कहीं नहीं मिलती। कोई तर्क महानपुरुष के नाम तथा उसमें बनी हुई श्रद्धा से नहीं टूटता किन्तु वस्तुस्थिति का हवाला देने से टूटता है।
महोदया, अन्त में मैं यही कहना चाहूँगी कि मेरे विपक्षी वक्ता यह न समझें कि मैं देशभक्त नहीं, जहाँ तक देशभक्ति का प्रश्न है वह मेरा कर्तव्य है। प्रत्येक मनुष्य का जन्मभूमि के प्रति सबसे बड़ा कर्तव्य है, धर्म। यही है कि देश के लिये निष्ठावान व पूर्ण देशभक्त रहे। किन्तु जब सदन ने इस प्रश्न को उठा ही दिया है कि भाग्यशाली हैं या नहीं, तब मुझे विवश होकर कहना पड़ता है कि थोथी आत्मप्रशंसा द्वारा अपने आपको जगद्गुरू व आध्यात्मिक नेता कहकर अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बन सकते हैं पर इससे दूसरों को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। सच्चे अर्थों में भाग्यशाली तो तभी होते जब आज भी उस प्राचीन गौरव को प्राप्त कर लिया गया होता।
रोना आता है जब देखती हूँ कि भारतीय माता-पिता अभी भी स्वस्थ विचारधारा से पूर्ण वंचित हैं। वो अपने उस परम कर्तव्य को भूल चुके कि सबसे पहले उन्हें बच्चे का चतुर्मुखी विकास करके उसे देश का श्रेष्ठ नागरिक बनाना है। किन्तु श्रेष्ठ नागरिक बनाना तो दूर वो देश के भावी कर्णधारों को उसकी रुचि के अनुकूल जीवनयापन का साधन भी नहीं अपनाने देते और अपनी इच्छाओं को बलात् उन पर लादने की कोशिश करते हैं। यदि वो ऐसा करते हैं तो उन्हें उनमें बिगड़ने के लक्षण प्रतीत होने लगते हैं। जिस देश में ऐसी विचारधारा हो उसका भविष्य क्या होगा? क्या वह उन बच्चों के मन में यह भावना उत्पन्न कर सकेगा कि वह भाग्यशाली है क्योंकि उसने ऐसे देश में जन्म लिया है।

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