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ओजस्विनी व्यूज

आत्म मन्थन की आवश्यकता

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‘ओजस्विनी’ आप तक असाधारण विलम्ब से पहुंचने के कई कारण हैं। गत दिनों प्रदेश में हुई उथल-पुथल के दूरगामी परिणाम हुए। आत्म चिन्तन, आत्म मन्थन पर विवश होना पड़ा। ओजस्विनी को भी अपनी स्थिति के आंकलन की आवश्यकता पड़ी। सहयोग के आश्वासनों को टटोलने में, साधनों को जुटाने में, देर से ही सही, ठोस निर्णयों की जरूरत थी। इसी सब में समय लगा।
पिछली बार हमने ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की बात की थी। इन चुनावों में यह निर्णय तो नहीं हो पाया। क्योंकि चैहान चूका भी और नहीं भी। आजूबाजू तो बिंधे पर हृदय स्थल नहीं बिंध पाया। ये परिणाम अपेक्षित थे या अप्रत्याशित? प्रदेश के विकास की गति अब क्या है? देश का भविष्य क्या है? नारी के विकास के अवसरों में बढ़ोत्तरी हुई या घटोतरी? ये सारे प्रश्न मथते हैं। झकझोरते हैं। आशा-निराशा जगाते हैं। न कोई लहर आयीं, न कोई हवाएँ चलीं पर फिजा बदल गयी। क्यों? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं था कि तुरूप के जिस इक्के को हाथ में रखकर छह दिसम्बर को भाजपा ने ब्लाइण्ड चला था, चार सरकारें कुर्बान कीं, उसे ऐन मौके पर चलाना ही वह भूल गयी या सविचारित नीति के अन्तर्गत भुला दिया गया। अयोध्या में राम मन्दिर था यह समझाने को, केसरिया ध्वज के वाहक वर्षों प्राणपण प्रयास करते रहे। इसी पर उन्होंने चार सरकारें बनायी। पर अब ढाँचे के मलबे से मिले स्वयं प्रामाणिक अकाट्य साक्ष्यों द्वारा यह प्रमाणित हो गया कि वहां राम मन्दिर ही था, तो इस सच्चाई को जनता तक पहुंचाने तथा दोहराने में राम मन्दिर निर्माण का आधार लेकर राष्ट्र निर्माण का स्वप्न देने वाले नेता झिझक क्यों गये? ढाँचा टूटने के धमाके की आवाज विश्व भर में सुनी गयी। उसे रोकना उनके बस में नहीं था। पर देश की संसद को राम मन्दिर साक्ष्यों से गुंजाना और चुनाव प्रचार के दौरान जनता को भलीभांति इस सत्य से अवगत कराना उनके हाथ की बात थी। न सही दूसरे पर अपने प्रचार साधनों का और अपने मुख का उपयोग तो किया ही जा सकता था। परिणाम!!! विश्व तो क्या समझता, वे स्वयं समझ न सके उनके हाथ कौन सी बटेर लगी थी। जो प्रचार माध्यम उनके थे उन पर ध्यान नहीं दिया जो विकसित होने की प्रक्रिया में थे, उन्हें सहयोग देने की आवश्यकता नहीं समझी। अन्य सम्भावनाओं को टटोला नहीं। यह अकारण नहीं है कि न तो भाजपा अपनी चार बेकसूर संवैधानिक सरकारों के गैर लोकतांत्रिक ढंग से भंग किए जाने का राजनीतिक लाभ ले पाई, और न अपनी महती उपलब्धियों को जनता तक पहुंचा पाईं
कारण और भी हैं। जनता ने सन्देश ग्रहण किया कि संगठित व अनुशासित होने का भाजपा का दावा खोखला था। एक ओर कार्यकर्ताओं की उपेक्षा दूसरी ओर उनकी अनियंत्रित अपेक्षाएं, मंत्रियों व विधायकों का गर्वीला व्यवहार, टिकट वितरण में असन्तुष्ट नेताओं की मनमानी, ने सिद्ध किया वह कांगे्रस से बेहतर नहीं है। परिणाम निश्चित रूप से अप्रत्याशित थे पर नितान्त अनपेक्षित भी नहीं। इतिहास साक्षी है बहुसंख्यक जनता की इच्छायें सदैव जयचन्दों तथा मीर जाफरों के व्यक्तिगत स्वार्थों तक तथा असीमित महत्वाकांक्षाओं की बेदी पर बलि चढ़ती रही हैं। भीतरघात नहीं खुलाघात हुआ, अपने यहां के प्रत्याशी को हराओ। ‘यह इस बार तो बारम्बार’, यह भावना चुनावों की विशेषता थी। अत्यधिक आत्ममुग्धता तथा अति आत्मविश्वास ने-‘हम तो जीत ही रहे हैं,’ ने अनेक को चारों खाने चित्त कर दिया। लम्हें ने खता की सदियों ने सजा पाईं राष्ट्र के नवनिर्माण का खोये आत्मगौरव को पाने का, भूले स्वाभिमान को अर्जित करने का महती उद्देश्य तथा संगठित अखण्ड वृहत्तर भारत का स्वप्न चन्द लोगों के स्वार्थों, कुछ के अहं और किन्हीं की गल्तियों को भेंट चढ़ गया। कई लोग कहते हैं कि मन्दिर व हिन्दुत्व हार गया। हिन्दुत्व नहीं हारा। आज भी अधिकांश जनता आश्चर्यचकित है, किंकत्र्तव्यविमूढ़ है, यह हो कैसे गया? स्वप्न भंग हुआ। आत्ममुग्धता के भ्रमजाल से मुक्त हुए जनता को भी अब अन्य दलों को उनकी 40 सालों की नाकामियों के तथा भाजपा की ढाई साल उपलब्धियों के परिपे्रक्ष्य परखने का अवसर मिला। 1980 में ढाई साल के प्रारम्भ हुए कार्यों की जो गति ठहर गयी थी वह 1990 में पुनः प्राप्त की गईं तब एक दशक लगा गांव-गांव सरकार को पहुँचने में। अब यह जनता को देखना है कि इस बार वह कितनी प्रतीक्षा करना चाहती है।
इन चुनावों में महिलाओं की राजनैतिक आकांक्षाएँ भी परवान चढ़ीं। किन्तु सभी दलों के चुनावी घोषणा-पत्रों में बावजूद महिलाओं के उद्धार और विकास की बड़ी-बड़ी बातों के, टिकिट देते समय उन्हें ‘पुरुषों की तुलना में जीतने योग्य है या नहीं’ की कसौटी पर रखकर नगण्य प्रतिनिधित्व दिया गया। फिर भी जितनों ने टिकिट की मांग की उनमें से कितनों को मिले और जिनको मिले उनमें से कितनी विजयी हुईं महत्व इस बात का नहीं है। महत्वपूर्ण तो है महिलाओं की राजनैतिक चेतना में वृद्धि। किन्तु राजनैतिक क्षेत्रा में कार्यरत महिलाओं द्वारा अपनी सीमाओं की पहचान तथा क्षमताओं का आंकलन आवश्यक है। अति महत्वाकांक्षा में नारीयोचित सीमाएँ टूटती हैं, तो एक पर नहीं समाज की शंकालु निगाहें सारी सहयोगीनियों को सन्देह के दायरे में ला देती है। और कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में, नारी विकास पर इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। साथ ही जरूरी है कि महत्वाकांक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीयता का समावेश भी हो। उतना ही आवश्यक है नारी की समस्याओं, पीड़ाओं, व्यथाओं को समझने योग्य मन में सच्ची करुणा व सहानुभूति, तभी तो वे पीड़ित नारी की पीड़ा में कमी करने के लिए जोर से आवाजें उठा सकेंगे, संसद में भी और विधानसभा में भी।
करुणा का नितानत अभाव ही होता है जब कोई नारी दूसरी नारी के साथ बलात्कार होने पर निर्ममता से कह दे-‘वहाँ गई क्यों थी?’ या ‘बड़ी बन ठन कर रहती थी।’ या किसी का तलाक हो जाने पर जज के समान क्षण भर की देर किए बिना जब कोई प्रबुद्ध नारी निर्णय देती है कि ‘भारतीय महिला के ये लक्षण नहीं हैं, कितनी तेज थी निभा नहीं पाई, पति तो बेचारा सीधा सा है।’ चमड़े की अभ्यस्त उन पुरुषों की, जिनको वो सहजता से उपलब्ध हुई और जिनके बढ़े हाथों को झटक दिया गया, व्यंग्यात्मक व अर्थपूर्ण दृष्टि का सामना करना ही क्या कम कठिन है कि तथाकथित जागरुक नारियाँ भी अपने अविवेकपूर्ण उपालम्भों से व्यक्ति हृदयों को और छेडे़ं या ऐसी चर्चा में साथ दें। स्त्राी समस्याओं की अभिवृद्धि का कारण यह भी है। नारी द्वारा दूसरी नारी की सक्रिय निन्दा या गहरी उदासीनता। द्वापन युग में द्रौपदी के चीर हरण की कोशिश हुई तो महाभारत हो गया। वर्तमान युग में सारे गांव में महिलाओं को निर्वस्त्रा घुमाया जाता है पर समाज के भीष्म और द्रोणाचार्य आज भी चुप हैं। राष्ट्र धृतराष्ट्र के समान व्यवहार कर रहा है और गांधारियों ने आँखों में पट्टी बाँध ली है। क्यों? पुरुष के चाहे जाने अथवा तिरष्कृत किये जाने पर जब तक दूसरी नारी की प्रतिष्ठा का आंकलन करने को, जब तक नारी स्वयं समर्थन देती रहेगी तब तक यही होगा। तस्लीमा के ‘लज्जा’ भी तो इस, इसी को लेकर है। भीड़ के ठेकेदारों ने तस्लीमा के खिलाफ फतवा जारी किया हुआ है और दुनिया चुप है। यह और भी बड़ी लज्जा की बात है। लज्जा, किन्तु आँख वालों का गुण है, धृतराष्ट्रों और गांधारियों को इससे क्या लेना देना। कभी मजहबी किताबों की दुहाई है कभी मूलभूत मानवीय अधिकारों की। कहीं बेचारगी है घिनौने स्वार्थों की।
‘स्त्राी’ समाज को एकजुट होकर खुद खड़ा होना होगा और तोड़ना होगा वह सामाजिक पाखण्ड जो भीड़ को समाज का दर्जा देता है और कठमुल्लों को अन्याय करने के अधिकार। नारी को उसकी सुरक्षा के नाम पर उसके चारों ओर रचे गये छल छद्म के सारे जंजाल स्वयं तोड़ने होंगे। ‘औरत जात’ को अब ध्यानपूर्वक अपनी अस्मिता पहचाननी होगी। तभी बिखर सकेंगे खुशियों के रंग और मनेगी सच्ची होली।
आज एक और मोर्चे पर चिन्तन आवश्यक है। हमें हमारे ही खिलाफ मोर्चे पर अड़ा देने की हत्यारी चाल जो राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पटल पर चली जा रही है, उनसे सावधान रहना है। भारत सरकार पर इतना दबाव निर्मित करना है कि जिसके रहते आर्थर डण्कल आर्थिक डाकू के रूप में इस देश की स्वतंत्राता, सार्वभौमता पर ही डंक न मार दे। ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने व्यापार के बहाने से अनुमति लेकर धीरे-धीरे भारत को गुलाम बनाया था। कैसी विडम्बना है आज स्वतंत्रा भारत में लोकतंत्रा के रक्षकों द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया के द्वारा आमंत्राण देकर गुलामी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये जायेंगे। खून भी होगा अपनों के ही हाथों। इस पर गम्भीरता से पूरे राष्ट्र को आत्म-मंथन की आवश्यकता है। हमारी राष्ट्रीय ऊर्जा का अधिकतम हमारी सामुदायिक, आर्थिक समृद्धि के सम्यक् विकास में काम आये यह हमारी सोच हो या विदेशी व्यापार यहां फले फूले।
और अन्त में ‘ओजस्विनी’ के पाठकों, लेखकों, साहित्यकारों, शुभचिन्तकों व समर्थकों से क्षमायाचना सहित। वर्तमान युग में पत्रिका का प्रकाशन एक दुष्कर कार्य है। जिनसे आर्थिक सहयोग की अपेक्षा थी वे निराधार सिद्ध हुए। जो पे्ररणा स्त्रोत थे वे आज हमारे बीच में नहीं हैं। जिन पर जिम्मेदारी है उनकी प्राथमिकतायें बदल गयी हैं या कहें यह सोच ही विकसित नहीं हो पा रही है कि प्रचार साधनों में पत्रिकाओं का आज भी कितना बड़ा योगदान हो सकता है। सहयोगियों ने हाथ खींच लिये हैं। ओजस्विनी का उद्देश्य व्यापारिक लाभ कमाना न होकर नारी की ओजस्विता को राष्ट्रीयता के सन्दर्भों में रेखांकित करना था और है। हमारी तीव्र इच्छा है कि ‘ओजस्विनी’ की निरन्तरता बनी रहे। पर अब हमें आप सबके सहयोग की आवश्यकता है। समय देकर तन से, रचनाएं भेजकर मन से और अधिकाधिक संख्या में सदस्यता अभियान में सहयोग देकर वार्षिक सदस्यता नवीनीकरण करके तथा विज्ञापनों एवं दान देकर धन से। केवल कुछ भामाशाहों की और चन्द कलम से प्यार करने वालों की, ओर कुछ सेवाभावियों की आवश्यकता है। जिस प्रकार धड़ल्ले से स्थापित अच्छी पत्रिकाएं भी बन्द होती जा रही हैं, उससे व्याप्त चिन्ता में भागीदारी सभी की होगी, तभी तो ऐसे अनुष्ठान पूर्ण हो सकेंगे। थोड़ी-थोड़ी आहूति सबकी ओर से।

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