LOADING

Type to search

ओजस्विनी व्यूज

छात्रों को विद्यालय प्रशासन में भाग लेना चाहिए

Share

अध्यक्ष महोदय, मैं सदन के इस विचार से पूर्णतया सहमत हूँ कि छात्रों को विद्यालय प्रशासन में भाग लेना चाहिये। आखिर जिस वृक्ष की छाया में हम पुष्पित व पल्लवित होते हैं, जिसकी सघन छाया में हमें जीवन का मार्ग चुनना है, जो हमारा जीवन निर्माण करता है, इसके बारे में हमें यह तो पता ही है कि उसका और हमारा क्या सम्बन्ध है। वो कैसे पनपा। इसको सही प्रकाश, पानी, भोजन आदि मिल भी रहा है या कैसे मिल रहा है, तभी तो हमें अपनी छाया दे सकेगा। जब हमें पता नहीं कि विद्यालय में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है तो हम उसे अपना कैसे समझेंगे।
हमारे लिये जो नियम बने और हमें पता न हो। यदि छात्रों का प्रतिनिधि प्रशासन समिति में हो तो वो कम से कम समिति को बता तो सकेगा हमारी समस्याएँ क्या हैं? क्या नियम होने चाहिए। मैं मानती हूँ कि गुरुजनों के अनुभव के समक्ष हमारा अनुभव तुच्छ के समान भी नहीं, पर क्या पता कब कौन छात्रा कौन-से मौलिक विचार से विद्यालय में क्रान्ति ला दे और हमें और अधिक सुविधापूर्णग् शिक्षा की प्राप्ति हो। अध्यक्ष महोदय जी, मेरे विपक्षी कहते हैं कि हम छात्रों को प्रशासन में भाग नहीं लेना चाहिये तथा उन्हें अपना समस्त ध्यान शिक्षा में लगाना चाहिये। मैं इनसे पूछना चाहती हूँ कि तब तो विद्यालय केवल किताबी शिक्षा देने का माध्यम होना चाहिये, फिर क्यों विद्यालय में अन्य गतिविधियाँ सांस्कृतिक, खेलकूद आदि होते हैं। उनमें भी तो समय नष्ट होता है वो वैसे भी पढ़ लेते हैं, जिनको नहीं पढ़ना होता है कितना भी समय क्यों न मिले वो तब भी नहीं पढ़ेंगे।
अध्यक्ष महोदय, मेरे विपक्षी वक्ता यह क्यों भूल जाते हैं कि केवल विद्यालय एक ऐसी संस्था है जहाँ छात्रा का चतुर्मुखी विकास हो सकता है, वही एक ऐसा स्थान है जो देश के भावी नागरिक, भावी नेता व मंत्राी उत्पन्न करता है तथा उनका सर्वतमुखी विकास करके इन्हें जीवन संग्राम में कूदने की शिक्षा देता है। वहीं हमें अपने जीवन के लक्ष्य का पता चलता है। वहीं हमें अपनी ध्येय सिद्धि की पे्ररणा मिलती है। यदि उन्हें अभी से प्रशासन कार्यों का अनुभव होगा तभी तो वो भविष्य में जीवन की कठोर समस्याओं का सामना करते हुए उचित रूप से प्रशासन कार्य कर सकेंगे।
इस अर्थहीन तर्क में तो कोई सार नहीं है कि इन्हें अनुभव नहीं, तो मानसिक रूप से पूर्णरूपेण विकसित नहीं। तो इन्हें मैं बताना चाहती हूँ कि मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों से सिद्ध हो चुका है कि मनुष्य की बुद्धि का विकास 15-16 वर्ष की आयु के बाद नहीं होता। जो विकास होता है वो वास्तव में अनुभव से होता है और अनुभव तो छात्रों को तभी होगा जब उसे स्वयं प्राप्त करेंगे और आयु के साथ होगा। दो असमान चीजों की तुलना करके हम उस तर्क को नहीं काट सकते। यदि वो प्रशासन में भाग ले सकने लायक पर्याप्त रूप से विकसित नहीं तब क्यों इनके ऊपर अन्य इतनी जिम्मेदारियाँ डाल दी जाती हैं। छात्रा संघ के अध्यक्ष भी विश्वविद्यालय में क्या नहीं करते, तब तो मेरे विपक्षी वक्ता छात्रा संघों की अनिवार्यता भी अनुभव नहीं करते होंगे।
अध्यक्ष महोदय, आज हमारी शिक्षा प्रणाली अत्यन्त दूषित है, उसके दोष दूर करने का प्रयास केवल छात्रों के सहयोग से ही पूर्ण हो सकता है। पुराने पीढ़ी वाले छात्रों को अपने मूल्यों के बीच चलने की सलाह देते हैं। छात्रा-छात्राएँ कभी अकारण जलते आक्रोश का शिकार नहीं बनते।
जब छात्रों के प्रतिनिधि विद्यालय प्रशासन में होंगे तो वो अपनी समस्याएँ अधिक भलीभांति उनके द्वारा प्राचाय तथा उपकुलपति तक पहुँचा सकते हैं तभी शिक्षा को जीवनोपयोगी व रचनात्मक बनाया जा सकेगा। केवल छात्रा ही अपने सहयोगी छात्रों को मानसिक रूप से विद्यालय के साथ सहयोग करने पर तैयार कर सकेगा।
जीवन की वास्तविकता के लिये ये संस्थाएँ कुछ नहीं कर पातीं और न ही उनके व्यक्तित्व के बहुविध विकास की दिशा में कोई कदम उठा पाती हैं। असल में जीवन से इनका सम्बन्ध बहुत कम रह गया है। छात्रों के असन्तोष का कारण यही है कि उन्हें सन्तुष्ट करने वाले मूल्य हमारे स्वयं के पास नहीं हैं। एक हद तक पुरानी और नयी पीढ़ी की इस खाई का कारण भी यही है। दोनों पक्ष के लोग अगर एक सही दृष्टिकोण से देखें तो बहुत कुछ समाधान हो जायेगा।
इतने लम्बे-चैड़े पाठ्यक्रम और पुस्तक भार के बावजूद भारतीय संस्कृति, परम्परा और आचार संहिता, शील, सौजन्य और कर्तव्यज्ञान के लिहाज से छात्रा शून्य ही नजर आता है। आज के शिक्षकगण को भी अपने महान दायित्व का अहसास तक नहीं होता कि पाठशाला में ही राम, कृष्ण, चाणक्य, चन्द्रगुप्त, बुद्ध, अशोक, प्रताप, शिवाजी, गांधी, पटेल जैसे मानव रत्नों की कटाई-छटाई का संस्कार हुआ था। आज कोई भी शिक्षा संस्थान दिखाई दे जिसमें भारत की आत्मा नजर आ सके।
जब तक विद्यार्थी और शिक्षक मिलकर फैसला नहीं करेंगे प्रशासन की गड़बड़ी दूर नहीं हो सकती। उपकुलपति अपने आप में कुछ नहीं कर सकता। लेकिन असल बात तो यह है कि किसी विषय पर व्यवस्थित रूप से विचार करना और फैसला लेना मुश्किल। और मुश्किल से जूझना कौन पसन्द करेगा? इसका सबसे आसान और अचूक उपाय है कि विद्यार्थी और शिक्षक को आमने-सामने बिठा दिया जाये और समस्याओं का हल निकालने की जिम्मेदारी सौंप दी जाये। यहाँ भी लोग फैसला लेने से डरे हैं कि बात अपने सिर पर न आये, अतः वो स्वयं ही सोच समझकर उचित निर्णय लेंगे। जब विद्यार्थी के प्रमुख उद्देश्य की उपेक्षा होती है तो विद्यार्थी अपने आक्रोश जाहिर करने पर मजबूर हो जाता है। इसके आक्रोश को जन्म देने वाली व्यवस्था होती है और वर्तमान समूची व्यवस्था बेतरतीवी के बेहूदे ढाँचे पर आधारित है। इस व्यवस्था को बदलने की शक्ति भी विद्यार्थी में ही है। वह अपनी विध्वंसकारी प्रवृत्तियों के प्रभाव में भूल जाता है कि उसके द्वारा नष्ट वस्तुएँ न केवल उसकी अपनी ही बल्कि सार्वजनिक सम्पत्ति है जिस पर सबका सामूहिक अधिकार है। यह बातें उसे कौन समझाएगा। प्रशासन में एक सीमा तक इसका स्थान होना ही चाहिये तभी वह अपनी जिम्मेदारी के प्रति जागरुक हो सकता है और इसकी विध्वंसकारी प्रवृत्तियाँ सृजननात्मक कार्यों में लग सकती है।
वास्तव में अब समय आ गया है जबकि वर्तमान युग के नवीन आदर्शों, उदात्त भावनाओं, व्यापक विचारों की पृष्ठभूमि में इस प्रश्न पर गम्भीरता और वास्तविकता से विचार किया जाये और यह अनुभव किया जाय कि विश्वविद्यालय के प्रबन्ध में छात्रों के भाग लेने से अधिक सफलता मिल सकेगी।
अध्यापक-छात्रा के सम्बन्ध सुधरेंगे, आए दिन की हड़ताल और लाठी चार्ज से छुटकारा मिल सकेगा, विश्वविद्यालय एक सच्चे अर्थ में सुसंश्लिष्ठ संस्था बनकर समाज और राष्ट्रीय संस्कार की अधिक सेवा कर सकेगा तो निश्चय ही उच्च स्वर में यह कहा जाना चाहिये कि विश्वविद्यालय के प्रबन्ध में विद्यार्थी पूर्णरूपेण भाग लें।
विद्यालय का प्रबन्ध विद्यार्थी, अध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी, समाज और सरकार, इन्हीं छः अंगों से संचालित होता है। ये अंग ही विश्वविद्यालय संस्था रूपी शरीर के सारे अंग हैं, जब तक प्रत्येक अंग व्यक्तिगत रूप से पूर्ण स्वस्थ नहीं होगा और सामूहिक रूप से शरीर के संचालन में शेष अंगों को पूर्ण सहयोग नहीं देता, तब तक शरीर का संचालन सुचारू रूप से सम्भव नहीं है।
यदि प्रजातंत्रा में स्वस्थ प्रशासन के लिये हम प्रत्येक बालक को समझदार बनाने के समर्थक हैं, यदि परिवार की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में माता-पिता, पुत्रा-पुत्राी को सहयोगी बना सकते हैं, यदि एक मिल, कारखाने, कार्यशाला में मिल मालिक, मैनेजर के साथ मजदूर का प्रतिनिधित्व मानने को तैयार हो, यदि बैंक व्यवस्था में अधिकारियों के साथ कर्मचारियों के प्रतिनिधि साझेदार हो सकते हैं तो विश्वविद्यालय की प्रशासन व्यवस्था में छात्रों को साझीदार बनाने में संकोच और सन्देह क्यों है? हाँ छात्रों से भी मेरा अनुरोध है कि कर्तव्य और अधिकार, ये अधिकाधिक सन्तुलन करते हुए इस प्रकार उत्तरदायित्व पूर्ण ढंग से कार्य करें, जिससे छात्रों का विश्वविद्यालय का, समाज का और राष्ट्र का कल्याण हो सके।
ृ ्

gdhfghfghfghfghfbfghgh

admin

gdhfghfghfghfghfbfghgh

  • 1

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *