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ओजस्विनी व्यूज

स्त्री विमर्श

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उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध मंे विश्व के अनेक देशों मंे महिलाआंें ने सत्ता मंे अपनी मंे अपनी भागीदारी को तमाम बाधाओं के बाद भी सिद्ध उन्होेंने लोकतंत्र मंे राजनैतिक उत्तराधिकार न केवल अर्जित किया, बल्कि अपनी योग्यता से शिखर तक का फासला तमाम बाधाओं के बाद तय किया। कुछ देशों मंे वंशवाद ने उन्हंे अवसर अवश्य दिया, लेकिन लोकतंत्र के संघर्ष को उन्होंने खुद झेला है। भारत की इंदिरा गांधी, सिरीमाओं भंडारनायके, तथा चंद्रिका कुमारतुंग,पाकिस्तान की, बंगला देश की खालिदा जिया, शेख हसीना, म्पामार की आंग सान सूची कनाडा की किम केन्पबेल इंग्लैड की माग्रेट थैचर, इसरायल की गोल्डा नायर ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने संसद के शिखर पर स्वयं को स्थापित किया है। यूरोप और अमेरिका मंे तो महिलाओं को मतधिकार पाने के लिये लम्बा संघर्ष करना पड़ा, लेकिन दक्षिण एशिया मंे यह हक महिलाओं को पुरूषांे के साथ ही मिल गया था।
भारत मंे भी स्वतंत्रता के पूर्व अनेक कुप्रथाओं से जुझते हुए भी जिस ओज से इस लड़ाई मंे महिला कूद पड़ी थीं, स्वतंत्रता के बाद न जाने वह तेज कहां खो गया।हर क्षेत्र मंे सफलता के शीर्ष बिन्दुओं को छूने पर भी राजनीतिक क्षेत्र मंे अधिक पिछड़ गई। समाज ने और स्वयं महिलाआंे ने महिलाआंे के लिये राजनीति को निषिद्ध क्षेत्र मान लिया,और संसद तक की दौड़ उनके लिये कठिन सिद्ध हुई है।वर्तमान समय में भी प्रायः सभी देशों के संविधान मंे स्त्रियों को बराबरी से अधिकार दिये जाने के बावजूद क्या कारण है कि संसद मंे महिलाओं कि संसद मंे महिलाओं का प्रवेश नगण्य है और देश के लिये बनाये जाने वाले कानूनों मंे भागीदारी। इसके कारण अनेक हैं और विविध हैं मुद्दे। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ तथा भारतीय संविधान लागू होने के बाद 1952 से मताधिकार लाने के बावजूद, भारत मंे राजनीति मंे महिलाओं की भागीेदारी लगभग शून्य रही है। सामाजिक मान्यताएं, पुरूष प्रधान समाज, नारी की दोयम राजनीतिक स्थिति महिलाओं को योग्य न मानना, आदि इसके प्रमुख कारण रहे हैं।
धार्मिक रूढ़ियों ने जकड़ी हैं बेड़िया
धर्म और सांस्कृतिक रूढ़ियों ने भी महिलाओं के पैरों को बेड़ियों की तरह जकड़ा है, जिससे वह संसद मंे पहुंचने के पहले ही ठिठक कर बैठ जाती है। ईरान, बांग्लादेश तथा दूसरे इस्लामिक देशों मंे बांग्लादेश तथा दूसरे इस्लामिक देशों मंे पर्दादारी मजहब का बुनियादी उसूल है। इंग्लैड जैसे विकसित देश में महिलाओं को चर्च की पादरी होने पर रोक है।कुछ अफ्रीेकी समाजों में रहने वाली ससुराल मंे पति के साथ महिलाओं रहती हैं, खुले तौर पर दफ्तरों मंे नौकरीे करने का अधिकार नहीं है। इस्लामिक मलेशिया समाज मंे महिलाओं को पुरूषों से वरिष्ठ पदों पर काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। सिंगापुर मंे आज भी महिलाओं का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी के भीतर ही है। उनकी राजनीति मंे सक्रियता को अच्छा नहीं माना जाता।
शारीरिक क्षमताओं ने बनाया है ‘वीकर सेक्स’
महिलाओं को ‘वीकर सेक्स’ कहकर विपरित सिद्ध करने से, उन्हंे शारीरिक दृष्टि से पुरूषों की अपेक्षा कमजोर मान कर उनके बढ़ते कदम रोके गये हैं। उसके स्वास्थ्य पर उचित ध्यान नहीं है। घर परिवार मंे पुरूषों को भरपेट खाना खिलाने के बाद-खुचा भोजन खाकर संतोष करना ही महिलाओं का धर्म है।देश मंे लड़कीे का जन्म आज भी अभिशाप है। प्रथमतः गर्भपात से लेकर अनेक उपायों से जन्म के पहले या बाद में उसकी हत्या कर दी जाती है और यदि ऐसा नहीं हो पाता, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण की सुविधाओं से वंचित रख कर उसे सभी प्रकार से असमर्थ बनाने के षड़यंत्र जारी हैं।
मां बनना कमजोरी क्योंकर है?
संतान की जन्मदात्री होना नारी की कमजोरी का सबूत मान कर संतान को जन्म देने के बहाने ही पुरूषों ने नारी को सक्रिय राजनीति मंे हिस्सा लेकर संसद तक पहुंचने से रोक दिया है.नारी को बच्चों की देखभाल, पालन-पोषण के लिये कई महीने तक घर के भीतर ही गुजार देना पड़ते हैं और इसी बहाने उन्हें राजनीति से ही नहीं, अन्य कार्यक्षेत्रों से भी प्रायः दूर ही रखा जाता है।
कम शिक्षा ने रोके हैं पैर
परम्परागत रूढ़ियों से जकड़े हुये समाजों मंे लड़कियों की शिक्षा पर व्यय करना अनावश्यक समझा जाता है और लड़कों की शिक्षा पर भविष्य के लिये राशि का समुचित विनियोजन। एक ओर सभी देशों मंे संसद सदस्यों के बहुपठित, आधुनिकतम तकनीक मंे प्रशिक्षित और राजनीतिक, आर्थिक दृष्टि से सुशिक्षित होने की आशा की जाती है और दूसरी ओर लड़कियों को उच्च शिक्षा से वंचित रखा जाता है। यह स्थिति स्वयं ही महिलाओं को संसद मंे प्रवेश करने से रोक देती है। अधिकांशः वही लोग आगे बढ़ पाते हैं जो उद्योग, व्यापार अथवा अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठानों से जुड़े होते हैं। चूंकि महिलाएं तकनीकी शिक्षा की कमी के कारण इन क्षेत्रों से दूर ही रहती हैं, अतएव उन्हंे संसद मंे प्रवेश के योग्य ही नहीं माना जाता। प्रशासन और प्रबन्धन के काम से जुड़ी महिलाओं की संख्या 25 प्रतिशत से अधिक नहीं होती। उन्हंे उच्च प्रशासनिक पदों का दायित्ववहन करने के योग्य ही नहीं माना-जाता। अतएव दो-चार महिलाओं ही उप-सचिव जैसे पद तक पहुंच पाती हैं। भारत तो ठीक है ग्रेट ब्रिटेन मंे भी महिलाओं की स्थिति इससे अच्छी नहीं है।
आर्थिक निर्भरता ने डाले है बंधन
अधिकांश महिलायें काम के लिये घर से बाहर ही नहीं निकलतीं। घरों पर ही छोटा-मोटा काम करने के कारण उन्हंे सार्वजनिक क्षेत्र मंे आने का न अवसर ही नहीं मिलता है न राजनीति मंे काम करने का माद्दा ही उनमंे पैदा होता है। इस प्रकर कीे महिेलायें आर्थिक दृष्टि से कभी स्वावलम्बी नहीं बन पातीं। उन्हंे हमेशा पुरूषों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस हालत मंे वे आमदनी का छोटा-मोटा जरिया छोड़कर, राजनीति मंे आने की बात सोच भी नहीं पातीं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय महिलायेें सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दृष्टि से यह मानकर चलती हैं कि केवल सम्पन्न घरों की महिलाआंे ही राजनीति मंे प्रवेश कर सकती हैं।
राजनीति मंे यौन शोषण का डर रोकता है
जिस बात ने महिलाओं की राजनैतिक भागीदारी को सार्वाधिक प्रभावित किया है वह है राजनीतिक क्षेत्र को गंदा क्षेत्र मानकर महिलाओं के लिए एक प्रकार से वर्जित अथवा निषिद्ध कर देने का राजनैतिक षड्यंत्र । यही कारण है कि प्रथम, द्वितीय व तृतीय लोकसभा मंे महिला सांसदों के नाम पर भी केवल वही चेहरे लोकसभा में थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम मंे सक्रिय भागीदारी कीे थी अथवा जो स्वतंत्रता सेनानियों की पत्नी/बहन/बेटी/बहू आदि थीं। नये चेहरे अपवाद स्वरूप ही थे। कारण था कि जो महिलाएं स्वतंत्रता पूर्व घरों से निकलने लगी थीं, वे तो राजनीति मंे स्वतंत्रता के बाद भी सक्रिय रही। किन्तु साधारण महिलाओं की भागीदारी के लिए आम जनमानस नहीं बन पाने के कारणांे मंे शुरूआती दिनों से ही बन पाने के कारणांे मंे शुरूआती दिनों से ही महिलाआंे के शोषण की घटनाएं व चरित्र-हनन के किस्सों का प्रचलित होना रहा। वही धारणा चलते आज पुख्ता हो गई है। कि आने वाली महिलाओं का बहुत अधिक यौन शोषण होता है। अनेक परिवार इसीलिये महिलाओं के लिए राजनीति मंे प्रवेश का खुला विरोध करते है। कांग्रेस की अनेक महिलाओं के साथ घटी ऐसी घटनाआंे के उदाहरण कम नहीं है।
चरित्रहनन से डरती हैं महिलाएं
महिलाओं को राजनीति मंे प्रवेश से दूर रखने के लिए, स्पर्धा मंे भाग लेने से ही पीछे करने के लिए इससे अच्छा हथियार पुरूष के पास नहीं है। चुने हुए जन प्रतिनिधि भी राजनीतिक महिलाओं के बारे मंे ओछे दर्जे की छींटाकशी करते हैं और छुपे अर्थों वाले शब्दों का विधानसभा और संसद मंे जिस तरह प्रयोग करते रहे हैं, वह शर्मनाक है। विधानसभा या संसद मंे महिलाओं की कार्यकुशलता और मेहनत का सिक्का जमा नहीं, प्रतिभा का लोहा मना नहीं कि पुरूष सहयोगियों को लगने लगता है कि यह महिला बहुत तेज है। उसे गिराने की तरह-तरह से चेष्टाएं होने लगती हैं और किसी के साथ भी जोड़कर अनेक प्रकार के लांछन लगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही चरित्रहनन का यह सिलसिला प्रारम्भ हो जाता है। किसी भी महिला का नैतिक बल कमजोर करना हो तो उसके चरित्र के बारे में चार शब्दों का कसीदा पढ़ने मात्र से ही पुरूष प्रतियोगी आधा चुनाव जीत लेता है। यही नहीं, पहले जहां प्रत्याशी एक दूसरे के व्यक्तिगत जीवन को अपना चुनावी आधार नहीं बनाते थे, अब तो शुरूआत ही उसकी जन्मपत्री बांचने से होती हैं जब विरोधी प्रत्याशी की शान मंे कह सकने के लिए कुछ नहीं पाया जाता तो उनके घर महिलाओं को ही लपेट लिया जाता है। ऐसी घटनाओं से राजनीति का जो घिनौना रूप उभर रहा है, उससे युवतियां राजनीति मंे आने से कतरातीे हैं।
राजनीति मंे अपराधीकरण से बढ़ती असुरक्षा
मध्यप्रदेश की मंडला जिले से निर्वाचित महिला सरपंच का पति के सामने बलात्कार एवं सामूहिक बलात्कार राजगढ़ की थाना कसडोल की विदिशा की सरपंच द्रोपदी बाई का निर्वस्त्र करने की कोशिश महिलाओं की राजनीति मंे भागीदारों के साथ जुड़ी असुरक्षा कीे विसंगति उजागर करता हैं।बारहवीं लोकसभा के चुनावों से पहले, विचारकों की चिंता राजनीति के अपराधीकरण को लेकर है। वर्तमान मंे पुलिस थानों मंे दर्ज मामलों के अपराधियों को टिकट न देने का निश्चय सभी दल करते हैं। क्या कारण है कि और आज सभी दलों को जनता के सामने आने के पहले नैतिकता की दुहाई देते हेै? बढ़ते अपराधीकरण ने महिलाओं की राजनैतिक प्रगति का अवरूद्ध किया है। इसके अनेकानेक उदाहरण हैं।
वर्ष 95 जुलाई मंे दिल्ली प्रवेश युवक कांगेस के अध्यक्ष सुशील चंद्र शर्मा पर अपनी पत्नी नयना साहनी (जो प्रदेश युवा कांगेस की महासचिव थी) के हाथ पैर काटकर उसकी लाश को तंदूर मंे जलाने का आरोप लगा। इस निमर्म हत्याकांड से प्रथम बार महिला, अपराध व राजनीति का त्रिकोण, चर्चा का केन्द्र बना और अब एक प्रश्न उभरा कि राजनीति मंे महिलायें कितनी सुरक्षित हैं? क्योंकि नयना साहनी की हत्या की घटना न पहली थी और न अंतिम। 1986 मंे मध्यप्रदेश के विधायक रामपति सिंह धुर्वे पर विधायक विश्राम गृह मंे एक महिला से बलात्कार, 1980 मंे पंजाब के पूर्व मंत्री बलवीर सिंह एवं तत्कालिक सांसद देवेन्द्र सिंह गास्पा पर पूर्णिमा सिंह नामक महिला की हत्या कर फ्लैट से नीचे फेंक देने का आरोप,वर्ष 95 मई महीन मंे जनता दल सांसद मोहम्मद अंसारी के दिल्ली आवास पर राजकुमारी नामक महिला की लाश मिलना, पटना का बहुचर्चित बाॅबी काण्ड, एक दशक पूर्व युवक कांग्रेस नेत्री बिलासपुर की कुसुम अवस्थी की जलने से मृत्यु , दिल्ली प्रदेश युवक कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष परिणिता आजाद का सुशील शर्मा द्वारा उसकी कारगुजरियों का मुखर विरोध करने के कारण उत्पीडन, निडर संतिदर कौर का युकां पदाधिकारियों का हवस का शिकार बनना, सागर की इंका नेता सुषमासिंह को पति महेन्द्र सिंह द्वारा मगरमच्छ को खिला देना, भोपाल की सरला मिश्रा को जला दिया जाना, आदि घटनाएं महिलाओं को राजनीति मंे आने के पूर्व सौ बार सोचने को विवश करती हैं। यह स्वाभाविक भी है। ऐसा नहीं है कि इंस स्थिति मंे मात्र पुरूषों का ही पूरा दोष है। अत्यधिक महत्वाकांक्षी महिेलाओं की कमी नहीं है, जिन्हंे कुर्सी और पद की चाह इस हद तक है कि भले ही कोई भी कीमत क्यों न चुकानीे पड़े वे तैयार हंै।
वास्तुस्थिति यह है कि आज राजनीति जिस विकृत संस्कृति का पोषण कर रही है। वहां भ्रष्टाचार अनाचार का बोलबाला है। महिलाएं अगर आज राजनीति मंे आती हैं तो उन्हें नयना साहनी की नियति झेलने के लिये तैयार रहना पड़ता है। यह विडम्बना है कि महिलाएं आज स्वतंत्र राजनीति नहीं कर सकती। दृष्टिकोण ऐसा बन गया है कि राजनीति मंे आगे बढ़ने वाली महिलाओं को किसीे न किसी पुरूष के कंधों पर थोप दिया जाता है। कृपावश जो महिलाएं राजनीति मंे आती हैं वे लम्बे समय तक नहीं टिकतीं। दूसरी और बौद्धिक रूप से सक्षम और सक्रिय महिलाओं को मौका नहीं मिलता।
राजनीतिक, संवैधानिक और कानूनी अवरोध
अधिकांश देशोें के संविधान और चुनाव सम्बन्धीे कायदे कानून ऐसी भाषा मंे लिखे गये हैं, जो महिलाओं की समझ के बाहर हैं। सर्वेक्षण से यह भी ज्ञात हुआ कि चुनाव स्वयं ही महिलाओं के संसद तक पहुंचने मंे रूकावट बन कर आड़े आते है। अनेक कारणों मंे पुरूषोें की तुलना मंे बहुत कम महिलायें सीधे तौर पर चुनाव मंे हिस्सा लेती हैं। नागरिकों को इसके लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि वे महिलाओं के पक्ष मंे मतदान नहीं करते। इसके लिये जरूरी है आरक्षण।
एक अतिरिक्त विडम्बना यह भी है कि संसद के अधिवेशनों मंे पुरूष सांसद अभद्रभाषा का प्रयोगकर महिला सांसदों को प्रायः चुप रहने के लिये मजबूर करते है। कनाडा मंे एक महिला सांसद को वित्तमंत्रीे जान क्रासबी ने शैला काप्स को यह कहते हुये चुप रहने को बाध्य कर दिया था ‘अरे बेबी चुप रहो।’बीस वर्ष तक संसद सदस्य रही आस्टेªलिया की एक अन्य सांसद कैथी मर्टिन सुलीवान ने अपने अनुभवों मंे लिखा है ‘अधिकांश पुरूष सांसद मुझको हमेशा ही ऐसे घूर कर देखते रहे, मानों मैं अजनबी होऊं। यदि कभी संसद मंे मैंने महिेलाओं से संबंधित मामला उठाया, तो पुरूष सांसदो ने मुझको चुप कर दिया। महिलाओं की बात की ध्यानपूर्वक सुनने की कभी परवाह नहीं की।’
भेदभाव ने कम की है भागीदारी
राजनीतिक पार्टियों मंे भी महिलाओं के साथ कम भेदभाव नहीं बरता जाता। नेता वर्षों से संसद मंे महिलाओं की संख्या बढ़ानपर जोर देते रहे हैं, किन्तु व्यावहारिक धरातल पर यह प्रयास रूक गये। 1984 तक कनाडा मंे अल्पसंख्यक दलों मंे ही महिला सदस्यों की संख्या कुछ अधिक रही। आस्टेªलिया मंे 1990 तक महिलाओं को चुनाव मंे कठिनाई से ही जन समर्थन मिलता था। 1990 तक किसी महिला को ऐसी सीट से टिकिट ही नहीं दिया गया, जहां से वह आसानी से जीत सके। अमेरिका, इंग्लैड और आस्टेªलिया मंे किये गये सर्वेक्षण के अनुसार, कोई भी पार्टी किसी महिला को अपना प्रत्याशी बनाकर खतरा मोल लेने के लिये तैयार नहीं होती। न्यूजीलैण्ड और आस्टेªलिया मंे खतरा मोल लेकर महिलाओं को प्रयाशी बनाया भी गया, किन्तु उनको पुरूष प्रत्याशी बनाया भी गया, किन्तु उनको पुरूष प्रत्याशियों से पराजित हो जाना पड़ा। इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी ने हाल ही मंे, अगले चुनाव में महिला सांसदों की संख्या वर्तमान से दुगुनी करने का विचार किया है।
नहीं जीतेंगी कहकर टिकट ना देना
महिलाओं को टिकिट देने मंे सबसे बड़ा अवरोध अथवा बहाना दलों के सामने रहता है जीतने की क्षमता। इसे भी विडम्बना ही कहा जाएगा कि महिलाओं को जितने टिकट दिये जाते हैं उसके अनुपात से उनके जीतने और पुरूषों के जीतने के प्रतिशत मंे भी अंतर है।उदाहारण के तौर पर एक दल ने किसी विधानसभा मंे 7 महिलाओं को टिकट दिया। वो सातों जीत गई। जबकि शेष दिये गये टिकिटों मंे से लगभग आधी सीटें मिलीं पुरूषों को। इसीलिए यह बात भी महिलाओं के विरोध मंे नहीं जाती। जीतने की संभावना महिलाआंे और पुरूषों दोनों के साथ होती है। किन्तु उसको जोड़ा जाता है केवल महिलाओं के जीतने की संभावना से। एक सर्वेक्षण के अनुसार 73 प्रतिशत नर-नारियों का मत है कि महिलाओं को राजनीति मंे सक्रिय हिस्सा लेना चाहिए
वोट बैंक के रूप मंे संगठित नहीं
50 प्रतिशत होने के बावजूद महिला मतदाता का कोई महत्व नहीं है? क्योंकि वह संगठित नहीं हैं। महिला शक्ति इसलिए वोट बैंक नहीं है जातिगत आधार पर चुनावों का निर्णय हो सकता है। किन्तु अभी तक ऐसा नहीं हुआ है कि महिलाओं ने सामूहिक रूप से किसी के पक्ष या विपक्ष मंे वोट डालने का निर्णय लिया हो। महिला मतदाता आधी होने पर भी, कोई संगठित आवाज न होने से केवल मोहरा भर है।
उपाय है केवल आरक्षण
तमाम तरह से विचार किये जाने के पश्चात् महिला सांसदों की संख्या बढ़ाने का केवल एक ही उपाय शेष रहता है ‘आरक्षण’। अनेक देशों मंे महिलाओं के लिये सीटें आरक्षित कर दी जाती हैं। एक बात और भी है देश की राजनीतिक पार्टियां यह मानती हैं कि सांसद चुने जाने के बाद भी महिलाओं का पार्टी के हित मंे पुरूष सांसदों जैसा योग नहीं होता।ऐसे और भी सैकड़ों मुद्दे हैं, जो महिलाओं को संसद के दरवाजे तक पहुंचने से पहले ही रोक देते हैं। भारतीय महिला सांसदों ने निश्चित रूप से राजनीति मंे और संसद मंे महत्वपूर्ण योग दिया है। अनेक महिला सांसद यद्यपि सत्ता की सदस्य नहीं रहीं, फिर भी उनके योग को भुलाया नहीं जा सकता। उदाहारण के लिये ‘मैरिड वुमैन प्रोटेक्शन आफ राइटस बिल,1990; प्रोटेक्शन आफ राइटस बिल1987 और प्रोमोशन आफ कास्टलैस एण्ड रिलीजन लैस सोसाइटी बिल, 1992’ महिला सांसदों द्वारा ही लाया गया था।
यही भी कम आश्चर्य का विषय नहीं है कि संसदों मंे महिला सदस्यों की संख्या मंे वृद्धि के लिये संघर्ष करती ‘राष्ट्रकुल संसद ऐसीसिएशन’ के अध्यक्ष पद पर आज तक एक भी महिला को नहीं चुना गया। यहां तक कि इस पद के लिये हुये चुनाव मंे 1993 मंे बैरल इवान्स को छोड़कर कर कभी कोई महिला प्रत्याशी खड़ी ही नहीं हुई। इस सबका आरक्षण के अतिरिक्त कोई उपाय है अभी नजर नहीं आता। कारण है कि एक दो को छोड़कर, सभी देशों के कायदे-कानून पुरूषों के हाथों मंे ही उनका क्रियान्वयन रहता है। महिलाओं से संबंधित नियम कानून भी पुरूषों द्वारा ही बनये जाते हैं।
यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि भारत में पंचायतों तथा नगर निकायों मंे 33 प्रतिशत आरक्षण से इस दृश्य मंे आशाजनक बदलाव आया है। पहले जो महिलाएं कभी-कभी अपने पति, भाई अथवा रिश्तेदार के चुनाव अभियान मंे भाग लेती थीं, और शेष समय मंे घर मंे रहती थीं, अब उस प्रकार की राजनीतिक सक्रियता में भी कहीं आगे हैं। सरपंच, पार्षद, महापौर और सांसद बनने की महत्वाकांक्षा ने महिलाओं को राजनीतिक रूप से सक्रिय किया है। पहले की दबी छुपी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब स्पष्ट और खुले रूप मंे उजागर होने लगी है।
महिला मंत्री के मंच भी पर महिला सरंपच द्वार घूंघट न उठाकर बैठना, भले ही महिलाआंे की पंचायती राज मंे भागीदारी पर अनगिनित प्रश्नचिन्ह लगता हो किंतु बिना इस आरक्षण के कोई बात बनती ही नहीं। यह बात उन्हंे समझानी होगी, जो महिलाओं के विधानसभा और लोकसभा मंे 33 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष मंे नही है। आरक्षण के बगैर इस पंच से सरपंच बनी नारी को, घर से बाहर, निकलने मंे ही कम से कम 50 वर्ष और लगते, यदि आरक्षण के चलते घर के पुरूष और राजनैतिक दल इस बात के लिये विवश न हो गये होते।
वर्तमान मंे कायदे-कानून बनाने और व्यवस्था निर्धारण का दायित्व देश की संसद द्वारा ही वहन किया जाता है। अनेक देशों ने संसद मंे महिलाओं के प्रवेश के मार्ग प्रशस्त किये हैं और उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करने के प्रयास भी किये गये हैं। आस्ट्रेलिया ने ‘अपर हाउस’ मंे महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिये आरक्षण का रास्ता निकाला है। कनाडा की संसद मंे महिला सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिये, इस उद्देश्य से गठित आयोग ने सुझाव दिया है कि प्रत्येक निर्वाचित क्षेत्र से एक पुरूष और एक महिला सांसद को चुना जाना अनिवार्य किया जाना चाहिये। किन्तु पुरूषों के साथ होड़ करती, संसद की ओर आगे बढ़ती महिलाओं के पैर संसद की देहरी पर जाकर ठिठक गये है।

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