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ओजस्विनी व्यूज

डाॅ. जोशी का भाषण

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5 सितम्बर 1991 शिक्षक दिवस समारोह के अवसर पर समय 6 बजे रवीन्द्रनाथ टैगोर भवन में आयोजित शिक्षक सम्मेलन के आयोजन पर बोलते हुए आज माननीय मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि शुभ अवसर मध्यप्रदेश विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने जो शिक्षकों के सम्मान की नवीन परम्परा का शुभारम्भ किया है, उसके लिये मैं भाजपा की सरकार को और आयोग को बधाई देता हूँ और उससे भी पहले जिन शिक्षकों का आज सम्मान किया गया है उन सबको अपनी हार्दिक शुभकामना देता हूँ। किन्तु फिर भी शोध में आने वाली कठिनाईयों से किये जाने वाले परिश्रम आदि में लगने वाले समय व परिश्रम को समय पर एवं देखते हुए शिक्षकों की इस सम्मान की राशि में वृद्धि की जानी चाहिये। (जोशी जी के इस निर्देश को स्वीकार करते हुए 5 हजार की सम्मान राशि बढ़ाकर 50 हजार की सम्मान राशि पटवा जी ने कर दी)। आज मैं चाहता हूँ कि उस परम्परा के बारे में आपको बताऊँ जैसी कि इस राष्ट्र की रही है। यह सम्भव है कि मेरे विषयान्तर होने से शिक्षण से राजनीति में प्रवेश के कारण में आपको उन शोधकार्यों के सही सन्दर्भों व उनकी सही पृष्ठांकन संख्या के साथ उद्धृत न कर पाऊँ, उदाहरण न दे पाऊँ, कोशिश करुंगा कि उनके निकट रहूँ।
आज जो यह धारणा बन गई है कि जितने भी शोध कार्य होते हैं वे पश्चिम में होते हैं और पश्चिम के विद्वान ही करते हैं, इस धारणा को मैं दूर करना चाहता हूँ। जैसे नागपाल जी इस धारणा को दूर करना चाहते हैं कि भारत के आर्य बाहर से आये। मैं आपको आज से बहुत पीछे ले जाना चाहता हूँ। पश्चिम में राॅयल एसोसियेशन आॅफ रिसर्च की स्थापना 1661 में हुई। प्रयोगों के लिये ……….. का मजाक उड़ाया जाता था, जबकि हमारे यहां शोध की परम्परा को और ज्यादा प्राचीन न भी मानें तो भी ढाई हजार वर्ष प्राचीन निश्चित रूप से माना जा सकता है। इस सोसायटी में किस प्रकार के शोध शुरू हुए थे यह भी सुन लीजिये। कई दिनों तक इस बात पर बहस हुई थी कि जिन्दा मछली का वजन ज्यादा होता है या मरी मछली का। यह बात काफी दिनों तक चली। उन लोगों को इतना समझ नहीं आया कि यदि दोनों का वजन कर लिया जाए तो उसका सही वजन का पता चल जायगा। यह बात केवल ……… वर्ष पुरानी है। अपने यहां 14वीं-15वीं शती में चलें। जिसके लेखक रामचन्द्र व यशोधर कहते हैं कि जो प्रयोग मैंने इसमें लिखे हैं वे मेरे स्वयं के उपयोग करके देखे गये हैं। सुनकर नहीं लिखा है। अनुभूत तथ्यों का ही वर्णन इसमें है। रामचन्द्र व यशोधर ने लिखा जो प्रयोग करके दिखा सके वह शिक्षक है और जो प्रयोग को देख सके वे विद्यार्थी हैं और बाकी तो सब मंच के अभिनेता हैं और अपना अभिनय करके चले जाते हैं। 14वीं-15वीं शती में इन प्रयोगों को किया जाता था और भारत में अनेक प्रयोगशालाएँ हैं इसका उल्लेख अलवेरू (मुस्लिम) ने किया है। अलबेरूनी ने भी अपने वर्णन में यही उल्लेख किया है तथा तिब्बती देशों के साहित्य में भी यही वर्णन नजर आता है। आज आप जिस भवन में बैठे हैं, रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाम पर है। वायदे से यहा केवल नाट्य कार्यक्रमों का प्रदर्शन किया जाना चाहिये। यह निवेदन करने के लिये है किसी विवाद के लिये नहीं कि इसका नाम भरत नाट्यशाला भी हो सकता था।
2000 वर्ष पूर्व भरत मुनि ने नाट्यशास्त्रा की रचना की थी। अनेक नाट्यशालाओं के निर्माण व अस्तित्व की बात की थी। इस सिद्धान्त विश्व को भारत की अनोखी देन है। भरतमुनि ने चतुर्विध वाद्यों की कल्पना बहुत पहले ही कर ली थी। लोग कहते हैं अरब/फारस से तबला आया। ऐसा वाद्य भारत में पहले ही मौजूद था। स्वाति मुनि को रचना करते-करते एक बार प्यास लगी। जंगल में जाते-जाते एक मधुर ध्वनि सुनाई दी। उन्होंने उसे ध्यान से सुना और देखा एक जगह पानी की बूँद धीरे-धीरे क्रम से पत्तों के ऊपर गिर रही थी और उनसे यह मधुर ध्वनि उत्पन्न हुई थी जिसमें से ही मुनि को यह वाद्य यंत्रा का निर्माण नहीं कर लूंगा तब तक चैन नहीं लूंगा और मृदंग का निर्माण हुआ। आप जानते हैं उसमें ऐसी प्राकृतिक ध्वनि उत्पन्न होती है। शोध करने की लगन प्राचीनकाल में किस प्रकार थी उसका यह एक स्वरूप है। आपने सुना होगा इसी तरह की ध्वनि मृदंग की आवाज में आती है। यह सब कहने का अर्थ यह है कि जैसे पश्चिम के लोग ही शोध कर सकते हैं, भारत में तो शोध होते ही नहीं थे, वैज्ञानिक सोच ही नहीं थी, भारत तो केवल भिखारियों, जादूगरों का देश है, यह गलत है। भारत विद्वानों का देश है, भारत वैज्ञानिकों का देश है। इस सभा भवन में सबकी तस्वीर लगायी जाए तो भारत में हमारे इतने वैज्ञानिक हैं कि पूरे भारत वर्ष के सभा भवन भर जायेंगे और तस्वीरें शेष रह जायेंगी और भवन कम पड़ जायेंगे। अब वर्तमान स्वरग्राम को लें। पश्चिम में फिर 18वीं सदी में इसकी खोज की बात की गई है जबकि भारतवर्ष में यह 2000 वर्ष पुरानी है। वनस्पति शास्त्राी की दृष्टि से पाराशर मुनि ने जिनका समय लगभग 1000 वर्ष तो माना जा सकता है, इससे उन्हें लगा प्रकाश में कोई क्रिया होती है जिसे आज प्रकाश संश्लेषण ( ) कहते हैं।
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