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ओजस्विनी व्यूज

ममता, करुणा और जनकल्याण

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सन्तत्व केवल पुरुषों का ही गुण नहीं है, बल्कि महिलाएँ सन्तत्व के शिखर पर विराजमान हैं। दैवीय गुणों को लेकर जन्मी इन महिलाओं ने दिशाहारा मानवता को नई दिशा दिखाई, लाखों पीड़ितजनों का कल्याण किया। अशक्तों को सशक्त बनाया और समाज में महिलाओं की दशा सुधारने में महती योगदान दिया। चाहे वह अमृतानंदमयी अम्मा हों, आनंदमूर्ति गुरु माँ हों, वेदभारती जी हों या मानसपुत्राी सन्तोषी माता हों या साध्वी ऋतम्बरा हों, साध्वी नैसर्गिका हों, साध्वी शिवा-सरस्वती हों, माँ जसजीत हों, मदर टेरेसा हों या जैन साध्वी कनक श्री हों। ऐसी ही कई विभूतियों ने अध्यात्म और धर्म की सही व्याख्या करते हुए समाज को नई चेतना प्रदान की है। स्त्रिायों में क्रांतिभाव जागृत किया और पीड़ित मानवता को कष्टों से उबारा है।
आमतौर पर सन्तों का जिक्र होता है तो ज्यादातर पुरुषों का नाम ही सामने आता है। निःसन्देह ये सारे पुरुष पहुँचे हुए ज्ञानी महात्मा थे और देवत्व को प्राप्त थे। किन्तु महिलाओं ने भी अपनी आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा 2000 वर्ष पूर्व से ही समाज आलोकित करना शुरू कर दिया था। भगवान महावीर की शिष्या चन्दनबाला सन्त ही तो थीं। इतिहास में ऐसे कई नाम मिल जायेंगे। कश्मीर की सन्त, ललदेव की डोगरी भाषा की कविताएँ आज भी उस घाटी में गूँजती हैं। सूफी सन्त ललदेव एक योगिनी थीं और भगवान शिव की परम भक्त भी थीं। उन्हें अवतार ही माना गया है। कश्मीरी हिन्दू और मुस्लिम उन्हें लाला योगेश्वरी के नाम से पुकारते हैं। कहा जाता है कि लाला योगेश्वरी जंगल में रहा करती थीं और अपने उपदेशों द्वारा जनता को सही मार्ग दिखाती थीं। हिन्दी साहित्य में जो स्थान कबीर का है वही स्थान कश्मीरी साहित्य में ललदेव का है।
मीराबाई के नाम को कौन नहीं जानता। मीरा ने उस समय परम्पराओं से विद्रोह किया जब किसी स्त्राी के विद्रोह को बर्दाश्त ही नहीं किया जाता था। अपने परिवार की इच्छा के विपरीत वे सन्तों के साथ उठने-बैठने लगीं। श्रीकृष्ण की भक्ति में उन्होंने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। तत्कालीन सामन्ती समाज मीरा के इस विद्रोह को पचा नहीं सका। उनका बहुत विरोध हुआ लेकिन वे अपने मार्ग पर डटी रहीं। हालांकि उनका कोई पन्थ नहीं था लेकिन मीरा का भक्तिभाव लाखों लोगों को दिशा दिखा गया।
ऐसी कई सन्त महिलाएँ भारत में हुई हैं और आज भी इनका कार्य केवल धर्म या आध्यात्म का प्रचार करना ही नहीं बल्कि वे समाज के लोगों को गरीबी, अशिक्षा जैसे अभिशाप से उबार रही हैं। तूफान पीड़ितों, भूकम्प पीड़ितों और अकाल पीड़ितों के लिए इन महिला सन्तों की सेवा अवर्णीय है।
तमिलनाडु के साहित्य में पाँचवी शताब्दी की एक महिला सन्त अन्दाल का जिक्र मिलता है जिन्होंने महिलाओं के लिए बहुत कार्य किया था। उस वक्त दक्षिण भारत में महिलाओं की स्थिति बहुत खराब थी। अन्दाल गाँव-गाँव घूमीं। अपने भक्तों के साथ उन मन्दिरों में भी गईं जहां महिलाओं को जाने नहीं दिया जाता था। विष्णु की भक्त अन्दाल का कहना था कि ईश्वर की तलाश अपने भीतर ही की जानी चाहिए। अन्दाल की कविताओं में भी यही भाव झलकता है।
तमिलनाडु की ही साध्वी अव्यार माँ परम शिव भक्त मानी जाती हैं। छेरा राज्य के राजाओं ने अव्यार माँ के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया है। एक बार वे भगवान गणेश की पूजा कर रही थीं तभी उन्हें आन्तरिक चेतना हुई कि भगवान शंकर ऐरावत हाथी पर चढ़कर कैलाश जा रहे हैं। अव्यार माँ भी कैलाश जाना चाहती थीं, किन्तु गणेश ने उन्हें पूजा भंग न करने की सलाह दी और उन्होंने गणेश की आज्ञा मानते हुए उनकी प्रशंसा में एक गीत गाया। वह गीत आज भी तमिलनाडु में गाया जाता है। अव्यार माँ ने अपनी तपस्या से आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त कर लिया था और उन शक्तियों का उपयोग जनकल्याण में किया।
12वीं शताब्दी में कर्नाटक में जन्मी अक्का महादेवी का नाम भी महिला सन्तों में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। अक्का महादेवी ने महिलाओं के उत्थान के आन्दोलन की शुरुआत की। अक्का माँ का भक्तिभाव मोह पे्ररित नहीं था। वे मोह को सारी समस्याओं की जड़ मानती थीं। उनके विचार वसुधैव कुटुम्बकम् से पे्ररित थे। जिस समय समाज में चारों तरफ कुरीतियाँ और अंधविश्वास फैला हुआ था अक्का माँ ने अपनी नई दृष्टि से लोगों को राह दिखाई। इतिहासकार लिखते हैं कि इतिहास में बहुत सी रानियों, विचारकों, योद्धाओं और स्वतंत्राता सेनानियों का जिक्र मिलेगा किन्तु अक्का महादेवी जैसे महिला कोई और नहीं थी।
महाराष्ट्र की सन्त मुक्ता बा ने भी अपनी समाज सेवा और आध्यात्मिक दृष्टि से लाखों लोगों के जीवन को प्रकाशित किया। 18 वर्ष की उम्र में ही मुक्ता बा को आत्मज्ञान हो गया था। मुक्ता बा को मुक्ताबाई के नाम से भी महाराष्ट्र में पहचाना जाता है। महाराष्ट्र की ही एक दूसरी महिला सन्त जनबाई ने भी समाज उत्थान के लिए विशेष प्रयास किये हैं। यह दोनों विभूतियाँ आज से कई सौ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई थीं।
18वीं शताब्दी में विश्व के इतिहास में परिवर्तन आ रहा था। भारत में आध्यात्मिक पुनर्जागरण का दौर चल रहा था। इस दौर में कई सन्तों ने समाज को दिशा दिखाई। इनमें महिला सन्तों का भी विशेष योगदान रहा। श्री माँ आनन्दमयी ऐसी ही महिला सन्त थीं। 1896 में त्रिपुरा के एक गाँव में जन्मीं आनन्दमयी माँ का विवाह बारह वर्ष की आयु में रमणी मोहन चक्रवर्ती से कर दिया गया जिन्हें बाबा भोलानाथ कहा जाता था। बाबा भोलानाथ अपनी पत्नि की आध्यात्मिक शक्तियों को जानने के बाद उनके भक्त बन गए। आनन्दमयी माँ ने भी समाज सुधार के लिए कई कार्य किए। उस वक्त बंगाल में सामाजिक जागरण में माँ का विशेष योगदान रहा। माँ का कहना था कि भगवान को पाने के लिए उसमें विश्वास की अत्यन्त आवश्यकता है। आपको जो कार्य सौंपा जाए उसे पूरे हृदय से और भक्ति से करें। कोई भी कार्य छोटा न समझें। 27 अगस्त 1982 को माताश्री ने देह त्याग कर दिया किन्तु उनकी शिक्षाएँ आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रही हैं। गुरू अरविन्द के सान्निध्य में आध्यात्मिक ऊँचाईयाँ प्राप्त करने वाली माता मारिया जिन्हें प्यार से मीरा कहा जाता था, भी एक महान आत्मा थीं। 1878 में जन्मीं माता मारिया स्वपे्ररणा से अपना जन्म स्थान फ्रांस छोड़कर पाॅण्डिचेरी में गुरुदेव अरविन्द के आश्रम में आ गईं और उनकी शिष्या बन गईं। गुरुदेव के देहावसान के बाद उन्होंने विश्व शान्ति और भाई चारे के लिए अपना सारा जीवन लगा दिया। माता मारिया का देहान्त 1973 में हुआ।
महान सन्तों के जीवन को भी महिालाओं ने ही प्रभावित किया है। रामकृष्ण परमहंस जैसे महात्मा को सच्ची पे्ररणा उनकी पत्नी माता शारदा देवी से मिली। माता शारदा देवी में वे अपनी माँ का ही रूप देखते थे। इसलिए दोनों के बीच दैहिक सम्बन्ध न होकर माँ-बेटे के समान रिश्ता था। आज बंगाल में जितनी श्रद्धा से रामकृष्ण परमहंस का नाम लिया जाता है उतनी ही श्रद्धा माता शारदा देवी के प्रति लोगों में है।
प्रायः सभी धर्मों में महिला विभूतियों ने मानव सेवा और करुणा द्वारा अपना अलग ही स्थान बनाया। ममतामयी माँ मदर टेरेसा को भला कौन नहीं जानता। विश्व के शीर्ष सम्मान नोबल प्राइज से सम्मानित मदर टेरेसा ने कुष्ठ रोग पीड़ितों, बच्चों और अनाथों के लिए बहुत कार्य किया। उनकी जन्मभूमि भले ही यूगोस्लाविया थी किन्तु उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और 1997 में अपनी मृत्यु तक लगातार पीड़ित मानवता की सेवा करती रहीं। 1910 में केरल में जन्मी सिस्टर अल्फोंजा का नाम भी बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। सिस्टर अल्फोंजा केवल 36 वर्ष तक ही जीवित रहीं। किन्तु उन्होंने अपने कार्यों द्वारा अलग ही स्थान बनाया। सिस्टर अल्फोंजा को भी सन्त की उपाधि दी गई।
अफगानिस्तान में जन्मीं हजरत बाबा जान का नाम महिला सन्तों में सम्मान से लिया जाता है। एक मुस्लिम पठान परिवार में 1807 में जन्मी हजरत बाबा जान का घर का नाम गुलरुख था। गुलरुख का अर्थ होता है फूलों को देखने वाला। बाबा जान के चेहरे से जो नूर टपकता था वह किसी खिले हुए फूल के समान था। उनके चेहरे की मासूमियत किसी देवता का एहसास कराती थी। बाबा जान घुमक्कड़ प्रवृत्ति की थीं। पठान परिवार में रहते हुए उन्होंने परिवार से विद्रोह कर भारत का रुख किया। उस समय भारत में स्वतंत्राता आन्दोलन की शुरुआत हो चुकी थी। एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त जाना अत्यन्त कठिन था। बाबा जान रावलपिण्डी पहुँचीं। उन्हें पवित्रा कुरान का अद्भुत ज्ञान था। अपने इस ज्ञान के बल पर उन्होंने लाखों लोगों को प्रभावित किया। घर वाले उनकी शादी करना चाहते थे लेकिन वे शादी के खिलाफ थीं। 37 वर्ष की आयु में बाबा जान का एक मुस्लिम सन्त माजूब से परिचय हुआ जिन्होंने उन्हें आध्यात्म का ज्ञान दिया। सन्त माजूब से मिली शिक्षा और आध्यात्म के प्रचार के लिए बाबा जान सारे भारत में घूमने लगीं। वे कुछ समय के लिए मुम्बई में भी रहीं किन्तु पुनः पंजाब लौट गईं। पंजाब के अलावा राजस्थान और उत्तरी भारत के कई क्षेत्रों में उन्होंने भ्रमण किया। बाबा जान का कहना था कि ईश्वर की प्राप्ति निर्मल मन से ही की जा सकती है। वे अपने हाथों के स्पर्श से रोगियों का इलाज करती थीं। जो कोई भी उनके पास इलाज के लिए आता था उसके प्रभावित हिस्से को उंगलियों के बीच रखकर वे कुछ मंत्रों का उच्चारण करती थीं और कुछ ही क्षण में रोगी रोगमुक्त हो जाता। ऐसा माना जाता है कि बाबा जान ने कई अन्धों को अपनी अदभुत शक्ति से दृष्टि प्रदान की थी।
ऐसी कई साध्वी इस पृथ्वी पर अवतरित हुईं हैं जिन्होंने मानवता को नई दिशा दिखाई। महिलाओं में अद्भुत और अनन्त ऊर्जा छिपी रहती है। वे मातृत्व की शक्ति से युक्त रहती हैं। उनमें कोमलता, करुणा और प्यार का भण्डार छिपा रहता है। उनकी यही शक्ति उन्हें पूज्य बनाती है। जिन महिलाओं ने अपनी इस आन्तरिक शक्ति को पहचाना वे सन्तत्व के शिखर पर पहुँचने में कामयाब रहीं और आज भी सारी मानवता को अपने ज्ञान के प्रकाश से अलौकित कर रही हैं।

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